Adhyāya 179 — Bharadvāja’s Reductionist Inquiry into Jīva and Pañcabhūta Dissolution
है अर ० छा | अ-क्रा् - एक ताड़के वृक्षके नीचे एक बटोही बैठा था। उसी वृक्षके ऊपर एक काक भी आ बैठा। काकके आते ही ताड़का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पककर आप-से-आप ही गिरा था, पर पथिक दोनों बातोंको साथ होते देख, यही समझ गया कि कौवेके आनेसे ही ताड़का फल गिरा है; अतः जहाँ संयोगवश अचानक कोई घटना घटित हो जाय, वहाँ उसे काकतालीयन्यायसे घटित हुई बताया जाता है। यहाँ बछड़ोंका आना और ऊँटका रास्तेमें बैठे रहना--ये बातें संयोगवश हो गयी थीं। अष्टस प्तत्याधेकशततमो< ध्याय: जनककी कक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके उत्तरमें बोध्यगीता भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गीत॑ विदेहराजेन जनकेन प्रशाम्यता,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! इसी विषयमें शान्तभावको प्राप्त हुए विदेहगाज जनकने जो उदगार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
bhīṣma uvāca | atrāpy udāharantīmam itihāsaṁ purātanam | gītaṁ videharājena janakena praśāmyatā ||
Bhishma said: “O King, in this very matter people also cite an ancient historical example—namely, the utterance sung by Janaka, the king of Videha, when he had attained inner calm.”
भीष्म उवाच