Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
चाण्डालने कहा--ब्रह्मन! मैं तो आपका हितैषी सुहृद् बनकर ही यह धर्माचरणकी सलाह दे रहा हूँ; क्योंकि आपपर मुझे दया आ रही है। यह जो कल्याणकी बात बता रहा हूँ, इसे आप ग्रहण करें। लोभवश पाप न करें ।। विश्वामित्र उवाच सुहन्मे त्वं सुखेप्सुश्वेदापदो मां समुद्धर । जाने5हं धर्मतो55त्मानं शौनीमुत्सूज जाघनीम्,विश्वामित्र बोले--भैया! यदि तुम मेरे हितैषी सूह॒द् हो और मुझे सुख देना चाहते हो तो इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो। मैं अपने धर्मको जानता हूँ। तुम तो यह कुत्तेकी जाँघ मुझे दे दो
Viśvāmitra uvāca: su-hṛn me tvaṁ sukhepsuḥ ced āpado māṁ samuddhara | jāne 'haṁ dharmato 'tmānaṁ śaunīm utsṛja jāghanim ||
Viśvāmitra said: “If you are truly my well-wishing friend and desire my welfare, then rescue me from this distress. I know my own duty and what is right for me. So give up that dog’s thigh and hand it over.”
विश्वामित्र उवाच