Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
मर्यादासु विनष्टास क्षुभिते धर्मनिश्चये । राजशि: पीडिते लोके परैर्वापि विशाम्पते,युधिष्ठिरने पूछा--प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जाया, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायूँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायूँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जाय, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जाय, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे?
yudhiṣṭhira uvāca | maryādāsu vinaṣṭāsu kṣubhite dharma-niścaye | rājaṛṣiḥ pīḍite loke parair vāpi viśāmpate ||
Yudhiṣṭhira said: When the established boundaries of conduct have collapsed, when certainty about dharma is thrown into confusion, when the people are oppressed—whether by the king-sage himself or by hostile powers—O lord of the subjects, what means of livelihood should a brāhmaṇa adopt in such a degraded time?
युधिछिर उवाच