(कुर्वाणं कर्म समरे पाण्डवानर्थकाड्क्षिणम् । यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्म मित्रार्थे न व्यतिक्रम: ।। भीष्म पाण्डवोंके अनर्थकी इच्छा रखकर समरभूमिमें पराक्रम प्रकट कर रहे थे। उस समय अपने मित्रोंके हितके लिये शिखण्डीने जो उनका वध किया है, वह कोई दोष या अपराधकी बात नहीं है। स्वधर्म पृष्ठत: कृत्वा आचार्यस्त्वत्प्रियेप्सया । पार्षतेन हत: संख्ये वर्तमानो5सतां पथि ।। आचार्य द्रोण तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे अपने धर्मको पीछे करके असाधु पुरुषोंके मार्गपर चल रहे थे; अतः युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने उनका वध किया है। प्रतिज्ञामात्मन: सत्यां चिकीर्षन् समरे रिपुम् । हतवान् सात्वतो विद्वान् सौमदत्तिं महारथम् ।। विद्वान् सात्वतवंशी सात्यकिने अपनी सच्ची प्रतिज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे समरांगणमें अपने शत्रु महारथी भूरिश्रवाका वध किया था। अर्जुन: समरे राजन् युध्यमान: कदाचन । निन्दितं पुरुषव्यात्र: करोति न कथंचन ।। राजन्! समरभूमिमें युद्ध करते हुए पुरुषसिंह अर्जुन कभी किसी प्रकार भी कोई निन्दित कार्य नहीं करते हैं! लब्ध्वापि बहुशश्शछ्िद्रं वीरवृत्तमनुस्मरन् न जघान रणे कर्ण मैवं वोच: सुदुर्मते ।। दुर्मते! अर्जुनने वीरोचित सदाचारका विचार करके बहुत-से छिद्र (प्रहार करनेके अवसर) पाकर भी युद्धमें कर्णका वध नहीं किया है; अतः तुम उनके विषयमें ऐसी बात न कहो। देवानां मतमाज्ञाय तेषां प्रियहितेप्सया । नार्जुनस्य महानागं मया व्यंसितमस्त्रजम् ।। देवताओंका मत जानकर उनका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे मैंने अर्जुनपर महानागास्त्रका प्रहार नहीं होने दिया। उसे विफल कर दिया। त्वं च भीष्मश्न कर्णश्न द्रोणो द्रौणिस्तथा कृप: । विराटनगरे तस्य आनृशंस्याच्च जीविता: ।। तुम, भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य विराटनगरमें अर्जुनकी दयालुतासे ही जीवित बच गये। समर पार्थस्य विक्रान्तं गन्धर्वेषु कृतं तदा । अधर्म: कोअत्र गान्धारे पाण्डवैर्यत् कृतं त्वयि ।। याद करो, अर्जुनके उस पराक्रमको; जो उन्होंने तुम्हारे लिये उन दिनों गन्धर्वोंपर प्रकट किया था। गान्धारीनन्दन! पाण्डवोंने यहाँ तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, उसमें कौन-सा अधर्म है। स्वबाहुबलमास्थाय स्वधर्मेण परंतपा: । जितवन्तो रणे वीरा पापोडसि निधन गत: ।।) शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर पाण्डवोंने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर क्षत्रियधर्मके अनुसार विजय पायी है। तुम पापी हो, इसीलिये मारे गये हो। यान्यकार्याणि चास्माकं कृतानीति प्रभाषसे
yāny akāryāṇi cāsmākaṁ kṛtānīti prabhāṣase
You keep declaring, ‘These wrongful deeds were done by us.’
वायुदेव उवाच
The line challenges a blanket moral accusation: merely asserting that ‘we committed wrongs’ is not itself proof; ethical judgment must be grounded in context, intention, and dharma rather than rhetorical blame.
Vāyudeva addresses an opponent who is accusing the Pāṇḍavas of wrongdoing; this verse introduces that accusation in the opponent’s own words, setting up Vāyudeva’s rebuttal that their actions were dharmically justified in war.