
Chapter Arc: कर्णपर्व के प्रवाह में, युद्ध-वृत्तांत के बीच एक विराम-सा आता है—पिछले अध्याय (96) के ‘युधिष्ठिर-हर्ष’ का समापन-सूत्र सुनाकर कथावाचक अध्याय-सीमा रेखांकित करता है। → यह अध्याय वस्तुतः एक संधि-क्षण है: रणभूमि की धूल, शंख-नाद और शोक के बीच पाठक को यह बोध कराया जाता है कि एक पर्व/अध्याय का पटाक्षेप स्वयं युद्ध की अनवरतता के सामने कितना क्षणभंगुर है। → चरम बिंदु कथा-घटना नहीं, बल्कि ‘समाप्ति-घोष’ है—‘कर्णपर्व सम्पूर्णम्’ का उद्घोष, जो समूचे पर्व को एक साथ बंद कर देता है और आगे के अनिवार्य परिणामों का भार बढ़ा देता है। → अध्याय का समाधान औपचारिक है: अध्याय-समाप्ति और पर्व-समाप्ति की घोषणा के साथ पाठ-परंपरा का द्वार बंद होता है। → कर्णपर्व के समापन के साथ ही अगली कथा-धारा (आगामी पर्व) की ओर अनकहा संकेत रह जाता है—युद्ध का अंत अभी नहीं, केवल एक पर्व का अंत है।