अर्जुनस्य सैन्धवाभिमुखगमनम् तथा विन्दानुविन्दयोर्वधः
Arjuna’s advance toward Saindhava and the fall of Vinda–Anuvinda
या च वै बहुयाजिनां ब्राह्मणानां श्ववृत्तिनाम् । आस्यमैथुनिकानां च ये दिवा मैथुने रता:,जो ब्राह्मण होकर सर्दीसे और क्षत्रिय होकर युद्धसे डरते हैं, जिस गाँवमें एक ही कुएँका जल पीया जाता हो और जहाँ कभी वेदमन्त्रोंकी ध्वनि न हुई हो, ऐसे स्थानोंमें जो छः: महीनोंतक निवास करते हैं, जो शास्त्रकी निन्दामें तत्पर रहते, दिनमें मैथुन करते और सोते हैं, जो दूसरोंके घरोंमें आग लगाते और दूसरोंको जहर दे देते हैं, जो कभी अग्निहोत्र और अतिथि-सत्कार नहीं करते तथा गायोंके पानी पीनेमें विघ्न डालते हैं, जो रजस्वला सत्रीका सेवन करते और शुल्क लेकर कन्या देते हैं, जो बहुतोंकी पुरोहिती करते, ब्राह्मण होकर सेवा-वृत्तिसे जीविका चलाते, मुँहमें मैथुन करते अथवा दिनमें स्त्री-सहवास करते हैं, जो ब्राह्मणको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर लोभवश नहीं देते हैं, उन सबको जिन लोकों अथवा दुर्गतिकी प्राप्ति होती है, उन्हींको मैं भी प्राप्त होऊँ; यदि कलतक जयद्रथको न मार डालूँ
yā ca vai bahuyājināṃ brāhmaṇānāṃ śvavṛttinām | āsyamaithunikānāṃ ca ye divā maithune ratāḥ ||
Arjuna said: “May I attain the very same worlds—or the same ruin—that falls to those Brahmins who, though born to sacred duty, live like dogs; who commit perversions such as oral intercourse; and who are addicted to sexual indulgence even by day. If I do not slay Jayadratha by tomorrow, let that fate be mine.”
अजुन उवाच