एका मूर्तिस्तपश्चर्या कुरुते मे भुवि स्थिता । अपरा पश्यति जगत् कुर्वाणं साध्वसाधुनी,“मेरी एक मूर्ति इस भूमण्डलपर (बदरिकाश्रममें नर-नारायणके रूपमें) स्थित हो तपश्चर्या करती है। दूसरी (परमात्मस्वरूपा) मूर्ति शुभाशुभकर्म करनेवाले जगत्को साक्षीरूपसे देखती रहती है
“One form of mine, established upon the earth, practices austerity (tapas). Another beholds the world as a witness, ever observing the deeds—virtuous and sinful—that are done.”
संजय उवाच