Droṇa’s sweeping assault and the Abhimanyu–Jayadratha close-quarters episode (द्रोणस्य भीषणव्यचरितम् / सौभद्र-जयद्रथ-संनिपातः)
सिंहनादश्न संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् | धनुर्ज्यातलशब्दश्ष गगनस्पृक् सुभैरव:,आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् । संजय कहते हैं--राजन्! जब द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर राजा युधिष्ठछिरको कैद करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके सैनिकोंने युधिष्ठिरके पकड़े जानेका उद्योग सुनकर जोर-जोरसे सिंहनाद करना और भुजाओंपर ताल ठोंकना आरम्भ किया। भरतनन्दन! उस समय धर्मराज युधिष्छिरने शीघ्र ही अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यथायोग्य सारी बातें पूर्णरूपसे जान लीं कि द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं संजय कहते हैं--महाराज! तदनन्तर पाडवोंके शिविरमें शंख, भेरी, मृदंग और आनक आदि बाजे बजने लगे। महात्मा पाण्डवोंका सिंहनाद सहसा प्रकट हुआ। धनुषकी टंकारका भयंकर शब्द आकाशमें गूँजने लगा
saṁjaya uvāca | siṁhanādaś ca saṁjajñe pāṇḍavānāṁ mahātmanām | dhanurjyātalaśabdaś ca gaganaspr̥k subhairavaḥ | āptair āśu parijñātaṁ bhāradvājacikīrṣitam |
Sañjaya said: “A sudden lion-roar arose from the great-souled Pāṇḍavas, and the dreadful, sky-reaching sound of bowstrings being drawn and released resounded. And through their trusted agents, they quickly came to know what the son of Bharadvāja (Droṇa) intended to do.”
संजय उवाच