Droṇa’s sweeping assault and the Abhimanyu–Jayadratha close-quarters episode (द्रोणस्य भीषणव्यचरितम् / सौभद्र-जयद्रथ-संनिपातः)
न स्मराम्यनृतं तावन्न स्मरामि पराजयम् । न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किंचिदप्यनृतं कृतम्,आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् । संजय कहते हैं--राजन्! जब द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर राजा युधिष्ठछिरको कैद करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके सैनिकोंने युधिष्ठिरके पकड़े जानेका उद्योग सुनकर जोर-जोरसे सिंहनाद करना और भुजाओंपर ताल ठोंकना आरम्भ किया। भरतनन्दन! उस समय धर्मराज युधिष्छिरने शीघ्र ही अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यथायोग्य सारी बातें पूर्णरूपसे जान लीं कि द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं महाराज! मैं अपनी दूसरी भी निश्चल प्रतिज्ञा आपको सुनाता हूँ। मैंने कभी झूठ कहा हो, इसका स्मरण नहीं है। मेरी कहीं पराजय हुई हो, इसकी भी याद नहीं है और मैंने प्रतिज्ञा करके उसे तनिक भी झूठी कर दिया हो, इसका भी मुझे स्मरण नहीं है
na smarāmy anṛtaṃ tāvan na smarāmi parājayam | na smarāmi pratiśrutya kiṃcid apy anṛtaṃ kṛtam | āptair āśu parijñātaṃ bhāradvāja-cikīrṣitam |
Sañjaya said: “O King, I do not recall ever speaking falsehood; I do not recall defeat; nor do I recall that, having made a promise, I ever rendered it false even in the slightest. And what Bhāradvāja (Droṇa) intended was quickly and properly ascertained by trusted agents.”
संजय उवाच