Bhīṣma’s Stuti of Keśava and Counsel on Nara–Nārāyaṇa (भीष्म-स्तवः; नरनारायण-प्रसङ्गः)
सुवर्णतारागणभूषितानि सूर्यपप्रभाभानि शरावराणि । विदार्यमाणानि परकश्रधैश्न प्रासैश्न खड्गैश्न निपेतुरुव्याम्,हाथी हाथीके आघातसे और पैदल पैदलकी चोटसे धराशायी होने लगे। श्रेष्ठ घोड़ोंके समूहपर उत्तम अश्वोंके समुदाय आक्रमण-प्रत्याक्रमण करते थे। ये सवारोंद्वारा किये हुए खड्ग और प्रासोंके आघातसे घायल होकर भयंकर और अद्भुत दिखायी देते थे। स्वर्णमय तारागणोंके चिह्लोंसे विभूषित सूर्यके समान चमकीले कवच फरसों, तलवारों और प्रासोंकी चोटसे विदीर्ण होकर धरतीपर गिर रहे थे तेन कीर्तिमता गुप्तमनीकं दृढ्धन्वना । संरब्धरथनागाश्चृं योत्स्यममानमशो भत सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले यशस्वी धृष्टद्युम्नसे सुरक्षित हुई वह सेना युद्धके लिये उद्यत हो बड़ी शोभा पाने लगी, उसके रथी, हाथीसवार और घुड़सवार सभी रोषावेशमें भरे हुए थे
sañjaya uvāca |
suvarṇa-tārā-gaṇa-bhūṣitāni sūrya-prabhābhāni śarāvarāṇi |
vidāryamāṇāni paraśvadhaiḥ prāsaiś ca khaḍgaiś ca nipetur uvyām ||
Sañjaya said: “Coats of mail, adorned with golden star-like bosses and blazing with a sun-like radiance, were being split apart by axes, spears, and swords; torn open in the press of battle, they fell upon the earth.” The scene underscores the ethical gravity of war: even the most splendid protections and the pride they symbolize are rendered fragile when violence is unleashed.
संजय उवाच