Marutta’s Sacrifice and Agni’s Embassy (मरुत्त-यज्ञे दूतत्वम्)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं) ऑपनआक्रा छा अकाल नवमो<्ध्याय: बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुन: लौटकर इन्द्रसे ब्रह्म बलकी श्रेष्ठठा बताना इन्द्र रवाच कच्चित्सुखं स्वपिषि त्वं बृहस्पते कच्चिन्मनोज्ञा: परिचारकास्ते | कच्चिद्देवानां सुखकामो<सि विप्र कच्चिद्देवास्त्वां परिपालयन्ति,इन्द्रने कहा--बृहस्पते! आप सुखसे सोते हैं न? आपको मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हैं न? विप्रवर! आप देवताओंके सुखकी कामना तो रखते हैं न? क्या देवता आपका पूर्णरूपसे पालन करते हैं?
indra uvāca | kaccit sukhaṁ svapiṣi tvaṁ bṛhaspate kaccin mano-jñāḥ paricārakās te | kaccid devānāṁ sukha-kāmo 'si vipra kaccid devās tvāṁ paripālayanti ||
Indra said: “Bṛhaspati, do you sleep in comfort? Have you attendants who please your mind? O brahmin, do you still desire the welfare of the gods? And do the gods, in turn, fully protect and support you?”
संवर्त उवाच