Abhaya-Itihāsa: Karma, Indriyas, and the Non-sensory Brahman
Brāhmaṇī–Brāhmaṇa Saṃvāda
क॑ नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता । न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम्,एक ब्राह्मण, जो ज्ञान-विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली--'प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं। आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप-जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी”
ka nu lokaṁ gamiṣyāmi tvām ahaṁ patim āśritā | nyastakarmāṇam āsīnaṁ kīnāśam avicakṣaṇam ||
Vāyu said: “To what world shall I go, I who have taken refuge in you as my husband? You sit having laid aside all action—like an unthinking peasant—without discernment.”
वायुदेव उवाच