Phala of Vrata, Niyama, Svādhyāya, Dama, Satya, Brahmacarya, and Service (व्रत-नियम-स्वाध्याय-दम-सत्य-ब्रह्मचर्य-शुश्रूषा-फलप्रश्नः)
जो गौओंके प्रति क्षमाशील, उनकी रक्षा करनेमें समर्थ, कृतज्ञ और आजीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है। जो बूढ़ा हो, रोगी होनेके कारण पथ्य-भोजन चाहता हो, दुर्भिक्ष आदिके कारण घबराया हो, किसी महान् यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला हो या जिसके लिये खेतीकी आवश्यकता आ पड़ी हो, होमके लिये हविष्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो अथवा घरमें स्त्रीके बच्चा पैदा होनेवाला हो अथवा गुरुके लिये दक्षिणा देनी हो अथवा बालककी पुष्टिके लिये गोदुग्धकी आवश्यकता आ पड़ी हो, ऐसे व्यक्तियोंको ऐसे अवसरोंपर गोदानके लिये सामान्य देश-काल माना गया है (ऐसे समयमें देश-कालका विचार नहीं करना चाहिये)। जिन गौओंका विशेष भेद जाना हुआ हो, जो खरीदकर लायी गयी हों अथवा ज्ञानके पुरस्काररूपसे प्राप्त हुई हों अथवा प्राणियोंके अदला-बदलीसे खरीदी गयी हों या जीतकर लायी गयी हों अथवा दहेजमें मिली हों, ऐसी गौएँ दानके लिये उत्तम मानी गयी हैं” ।। नाचिकेत उवाच श्रुत्वा वैवस्वतवचस्तमहं पुनरब्रुवम् अभावे गोप्रदातृणां कथं लोकान् हि गच्छति
nāciketa uvāca | śrutvā vaivasvatavacas tad ahaṃ punar abruvam | abhāve gopradātṝṇāṃ kathaṃ lokān hi gacchati ||
Naciketas said: “Having heard the words of Vaivasvata (Yama), I spoke again: ‘If there are no donors of cows, how indeed does one attain the worlds (of merit)?’”
नाचिकेत उवाच