ब्राह्मणेष्वनृणी भूत: पार्थिव: स्यात् पुरंदर | इतरेषां तु वर्णानां तारयेत् कृशदुर्बलान्,पुरंदर! राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंके प्रति उऋ्रण रहे अर्थात् उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट रखे तथा अन्य वर्णो्में भी जो लोग दीन-दुर्बल हों; उनका संकटसे उद्धार करे
Bhīṣma said: O Purandara, a king should be free of obligation toward the brāhmaṇas—by serving them and keeping them content—and among the other varṇas he should rescue the poor and the weak from distress.
भीष्म उवाच