रुद्र-स्तवराजः (Rudra-Stavarāja) — Exempla of Śiva’s Boons and the Hymn’s Phalaśruti
तथैव च मनुष्येषु ये मनुष्या: प्रधानत: । आस्तिका: श्रद्दधानाश्न बहुभिर्जन्मभि: स्तवै:,इसी प्रकार मनुष्योंमें जो प्रधानतः आस्तिक और श्रद्धालु हैं तथा अनेक जन्मतक की हुई स्तुति एवं भक्तिके प्रभावसे मन, वाणी, क्रिया तथा प्रेमभावके द्वारा सोते-जागते, चलते-बैठते और आँखोंके खोलते-मीचते समय भी सदा अनन्यभावसे उन परम सनातनदेव जगदीश्वर शिवका बारंबार ध्यान करते हैं, वे अमित तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं तथा जो उन्हींके विषयमें सुनते-सुनाते एवं उन्हींकी महिमाका कथोपकथन करते हुए इस स्तोत्रद्वारा सदा उनकी स्तुति करते हैं, वे स्वयं भी स्तुत्य होकर सदा संतुष्ट होते हैं और रमण करते हैं
tathaiva ca manuṣyeṣu ye manuṣyāḥ pradhānataḥ | āstikāḥ śraddadhānāś ca bahubhir janmabhiḥ stavaiḥ ||
So too among human beings: those who are foremostly believers and full of faith—whose devotion has been strengthened by hymns offered across many births—become radiant with immeasurable spiritual power.
वायुदेव उवाच