धर्मनिन्दा–धर्मोपासनाफलम् तथा साध्वाचारलक्षणम्
Fruits of Disparaging vs. Observing Dharma; Marks of Good Conduct
स्वस्थानात् स परिग्रष्टो वर्णसंकरतां गतः । ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्य: शूद्रत्वं याति तादृश:,महाभागे! धर्मचारिणि! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी अपने-अपने कर्मोको छोड़कर यदि शूद्रका काम करने लगता है तो वह अपनी जातिसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाता है और दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है
Cast down from his proper station, he falls into the condition of varṇa-mixture. A brāhmaṇa, a kshatriya, or a vaiśya—whoever is of such conduct comes to śūdra status.
श्रीमहेश्वर उवाच