उमोवाच (एषां यायावराणां तु धर्ममिच्छामि मानद । कृपया परया<<विष्टस्तन्मे ब्रूहि महेश्वर ।। उमादेवी बोलीं--सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान् अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ।। श्रीमहेश्वर उवाच धर्म यायावराणां त्वं शृणु भामिनि तत्परा ।। व्रतोपवासशुद्धाज्ञास्तीर्थस्नानपरायणा: । श्रीमहेश्वरने कहा--भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ।। धृतिमन्त: क्षमायुक्ता: सत्यव्रतपरायणा: ।। पक्षमासोपवासै क्ष कर्शिता धर्मदर्शिन: । उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ।। वर्ष: शीतातपैरेव कुर्वन्त: परमं तप: ।। कालयोगेन गच्छन्ति शक्रलोकं शुचिस्मिते | पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं |। तत्र ते भोगसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विता: ।। दिव्यभूषणसंयुक्ता विमानवरसंयुता: । विचरन्ति यथाकामं दिव्यस्त्रीगणसंयुता: ।। एतत् ते कथित देवि कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। उमोवाच तेषां चक्रचराणां च धर्ममिच्छामि वै प्रभो ।। उमाने कहा--प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच एतत् ते कथयिष्यामि शृणु शाकटिकं शुभे ।। श्रीमहेश्वरने कहा--शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ।। संवहन्तो धुरं दारै: शकटानां तु सर्वदा | प्रार्थयन्ते यथाकालं शकटैसभैंक्षचर्यया ।। तपोअ<र्जनपरा धीरास्तपसा क्षीणकल्मषा: । पर्यटन्तो दिश: सर्वा: कामक्रो धविवर्जिता: ।। वे अपनी स्त्रियोंक साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ।। तेनैव कालयोगेन त्रिदिवं यान्ति शो भने । तत्र प्रमुदिता भोगैर्विचरन्ति यथासुखम् ।। एतत् ते कथित देवि कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ।। उमोवाच वैखानसानां वै धर्म श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ।। उमाने कहा--प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्था: शुभेक्षणे । तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्त: स्वतेजसा ।। सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तप: । श्रीमहेश्वरने कहा--शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।। अभ्मकुद्टास्तथान्ये च दन््तोलूखलिनस्तथा । शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उज्छवृत्तास्तथा परे ।। कपोततवृत्तय श्चान्ये कापोतीं वृत्तिमास्थिता: । पशुप्रचारनिरता: फेनपाश्च तथा परे ।। मृगवन्मृगचर्यायां संचरन्ति तथा परे | उनमेंसे कुछ लोग अभश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं। दूसरे दाँतोंस ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे उज्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।। अब्भक्षा वायुभक्षाश्न निराहारास्तथैव च ।। केचिच्चरन्ति सद्विष्णो: पादपूजनमुत्तमम् | कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते हैं।। संचरन्ति तपो घोरें व्याधिमृत्युविवर्जिता: ।। स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यश: ।। इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचया: । अमरै: समतां यान्ति देववद्धोगसंयुता: ।। वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।। वराप्सरोभि: संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते | एतत् ते कथित देवि भूय: श्रीतुं किमिच्छसि ।। सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराजोंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।। उमोवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान् ।। उमाने कहा--भगवन्! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ ।। श्रीमहेश्वर उवाच धर्मचर्या तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ।। मृगनिर्मोकवसना निर्दन्द्धास्ते तपोधन: । अड्गुष्ठमात्रा: सुश्रोणि तेष्वेवाज्रेषु संयुता: ।। श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्*ोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं ।। उद्यन्तं सततं सूर्य स्तुवन्तो विविधै: स्तवै: । भास्करस्येव किरणै: सहसा यान्ति नित्यदा ।। द्योतयन्तो दिश: सर्वा धर्मज्ञा: सत्यवादिन: ।। वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।। तेष्वेव निर्मल सत्यं लोकार्थ तु प्रतिक्तितम् । लोको<थयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात् ।। महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते | क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदु: ।। उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत् टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।। प्रजार्थमपि लोकार्थ महद्ि: क्रियते तप: । तपसा प्राप्यते सर्व तपसा प्राप्पते फलम् ।। दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत् ।।) महान् पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।। उमोवाच आश्रमाभिरता देव तापसा ये तपोधना: । दीप्तिमन्तः कया चैव चर्ययाथ भवन्ति ते,उमाने पूछा--देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं?
śrīmaheśvara uvāca |
dharmaṃ yāyāvarāṇāṃ tvaṃ śṛṇu bhāmini tatparā ||
vratopavāsaśuddhāṅgās tīrthasnānaparāyaṇāḥ ||
dhṛtimantaḥ kṣamāyuktāḥ satyavrataparāyaṇāḥ ||
pakṣamāsopavāsaiś ca karśitā dharmadarśinaḥ ||
varṣāśītātapair eva kurvantaḥ paramaṃ tapaḥ ||
kālayogena gacchanti śakralokaṃ śucismite ||
Mahādeva said: “O passionate one, listen attentively to the dharma of the yāyāvaras (wandering ascetics). Their bodies are purified by vows and fasts, and they are devoted to bathing at sacred fords. Endowed with steadiness and patience, committed to vows of truth, they become emaciated through fortnight-long and month-long fasts, keeping their vision fixed on dharma. Bearing rain, cold, and heat, they undertake severe austerity; and when their time comes (by the ordinance of Time), they depart to Śakra’s heaven. The ethical emphasis is on self-restraint, truthfulness, endurance, and a life oriented toward sacred practice rather than possession.”
श्रीमहेश्वर उवाच
The dharma of wandering ascetics is defined by disciplined vows and fasting, devotion to sacred bathing, truthfulness, patience, and endurance of hardship; such sustained self-restraint is presented as a path to purified conduct and a meritorious afterlife.
Umā asks Maheśvara to explain the practices of different forest-ascetic groups; in this verse he begins describing the yāyāvaras, listing their austerities and virtues and stating that, when their destined time arrives, they attain Śakra’s heaven.