Ādi-parva Adhyāya 3 — Janamejaya’s Rite, Dhaumya’s Parīkṣā, and Uttanka’s Kuṇḍala Quest (सर्पसत्रप्रस्तावना–गुरुपरीक्षा–उत्तङ्कोपाख्यान)
८-52 अर अं ४-4 ३. अधिक नीचा-ऊँचा होना, काँटेदार वृक्षोंसे व्याप्हहोना तथा कंकड़-पत्थरोंकी अधिकताका होना आदि भूमिसम्बन्धी दोष माने गये हैं। २, समन्त नामक क्षेत्रमें पाँच कुण्ड या सरोवर होनेसे उस क्षेत्र और उसके समीपवर्ती प्रदेशका भी समनन््तपंचक नाम हुआ। परंतु उसका समन्त नाम क्यों पड़ा, इसका कारण इस श्लोकमें बता रहे हैं--'समेतानाम् अन्तो यस्मिन् स समनन््त:'--समागत सेनाओंका अन्त हुआ हो जिस स्थानपर, उसे समनन््त कहते हैं। इसी व्युत्पत्तिके अनुसार वह क्षेत्र समनन््त कहलाता है। > घर छोड़कर निराहार रहते हुए, स्वेच्छासे मृत्युका वरण करनेके लिये निकल जाना और विभिन्न दिशाओंमें भ्रमण करते हुए अन्तमें उत्तर दिशा--हिमालयकी ओर जाना--महाप्रस्थान कहलाता है--पाण्डवोंने ऐसा ही किया। (पौष्यपर्व) तृतीयो<ध्याय: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण, आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना सौतिरुवाच जनमेजय: पारीक्षित: सह भ्रातृभि: कुरुक्षेत्रे दीर्घसत्रमुपास्ते | तस्य भ्रातरस्त्रय: श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति । तेषु तत्सत्रमुपासीनेष्वागच्छत् सारमेय:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--परीक्षितके पुत्र जनममेजय अपने भाइयोंके साथ कुरक्षेत्रमें दीर्घकालतक चलनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करते थे। उनके तीन भाई थे--श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन। वे तीनों उस यज्ञमें बैठे थे। इतनेमें ही देवताओंकी कुतिया सरमाका पुत्र सारमेय वहाँ आया
sautir uvāca | janamejayaḥ pārīkṣitaḥ saha bhrātṛbhiḥ kurukṣetre dīrghasatram upāste | tasya bhrātaras trayaḥ śrutasena ugrasenō bhīmasena iti | teṣu tat satram upāsīneṣv āgacchat sārameyaḥ |
Sauti said: Janamejaya, the son of Parikshit, was performing a long-duration sacrificial session at Kurukshetra together with his brothers. He had three brothers—Shrutasena, Ugrasena, and Bhimasena. While they were seated and engaged in that rite, Sārameya, the son of the divine bitch Saramā, arrived there.
राम उवाच