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Shloka 1

समन्तपञ्चक-आख्यानम् तथा अक्षौहिणी-प्रमाणनिर्णयः

Samantapañcaka Narrative and the Measure of an Akṣauhiṇī

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल २८२ श्लोक हैं] ।। अनुक्रमणिकापर्व सम्पूर्ण ।। ३. जय शब्दका अर्थ महाभारत नामक इतिहास ही है। आगे चलकर कहा है--“जयो नामेतिहासो5यम्‌' इत्यादि। अथवा अठारहों पुराण, वाल्मीकिरामायण आदि सभी आर्ष-ग्रन्थोंकी संज्ञा जय” है। २. मंगलाचरणका श्लोक देखनेपर ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ नारायण शब्दका अर्थ है भगवान्‌ श्रीकृष्ण और नरोत्तम नरका अर्थ है नररत्न अर्जुन। महाभारतमें प्राय: सर्वत्र इन्हीं दोनोंका नर-नारायणके अवतारके रूपमें उल्लेख हुआ है। इससे मंगलाचरणमें ग्रन्थके इन दोनों प्रधान पात्र तथा भगवानके मूर्ति- युगलको प्रणाम करना मंगलाचरणको नमस्कारात्मक होनेके साथ ही वस्तुनिर्देशात्मक भी बना देता है। इसलिये अनुवादमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका ही उल्लेख किया गया है। 3. नैमिषारण्य नामकी व्याख्या वाराहपुराणमें इस प्रकार मिलती है-- एवं कृत्वा ततो देवो मुनिं गौरमुखं तदा। उवाच निमिषेणेदं निहतं दानवं बलम्‌ ।। अरुण्येडस्मिंस्ततस्त्वेतत्नैमिषारण्यसंज्ञितम्‌ । ऐसा करके भगवानने उस समय गौरमुख मुनिसे कहा--“मैंने निमिषमात्रमें इस अरण्य (वन)-के भीतर इस दानव-सेनाका संहार किया है; अत: यह वन नैमिषारण्यके नामसे प्रसिद्ध होगा।” ४. जो दिद्वान्‌ ब्राह्ण अकेला ही दस सहसख्र जिज्ञासु व्यक्तियोंका अन्न-दानादिके द्वारा भरण-पोषण करता है, उसे कुलपति कहते हैं। ५. जो कार्य अनेक व्यक्तियोंके सहयोगसे किया गया हो और जिसमें बहुतोंको ज्ञान, सदाचार आदिकी शिक्षा तथा अन्न-वस्त्रादि वस्तुएँ दी जाती हों, जो बहुतोंके लिये तृप्तिकारक एवं उपयोगी हो, उसे “सत्र” कहते हैं। $. “तत्‌ सृष्टवा तदेवानु प्राविशत” (तैत्तिरीय उपनिषद्‌)। ब्रह्मने अण्ड एवं पिण्डकी रचना करके मानो स्वयं ही उसमें प्रवेश किया है। २. ऋषय: सप्त पूर्वे ये मनवश्च चतुर्दश । एते प्रजानां पतय एभि: कल्प: समाप्यते ।। (नीलकपण्ठीमें ब्रह्माण्डपुराणका वचन) > यह और इसके बादका श्लोक महाभारतके तात्पर्यके सूचक हैं। दुर्योधन क्रोध है। यहाँ क्रोध शब्दसे द्वेष-असूया आदि दुर्गुण भी समझ लेने चाहिये। कर्ण, शकुनि, दःशासन आदि उससे एकताको प्राप्त हैं, उसीके स्वरूप हैं। इन सबका मूल है राजा धृतराष्ट्र। यह अज्ञानी अपने मनको वशमें करनेमें असमर्थ है। इसीने पुत्रोंकी आसक्तिसे अंधे होकर दुर्योधनको अवसर दिया, जिससे उसकी जड़ मजबूत हो गयी। यदि यह दुर्योधनको वशमें कर लेता अथवा बचपनमें ही विदुर आदिकी बात मानकर इसका त्याग कर देता तो विष-दान, लाक्षागृहदाह, द्रौपदी-केशाकर्षण आदि दुष्कर्मोंका अवसर ही नहीं आता और कुलक्षय न होता। इस प्रसंगसे यह भाव सूचित किया गया है कि यह जो मन्यु (दुर्योधन)-रूप वृक्ष है, इसका दृढ़ अज्ञान ही मूल है, क्रोध-लोभादि स्कन्ध हैं, हिंसा-चोरी आदि शाखाएँ हैं और बन्धन-नरकादि इसके फल- पुष्प हैं। पुरुषार्थकामी पुरुषको मूलाज्ञानका उच्छेद करके पहले ही इस (क्रोधरूप) वृक्षको नष्ट कर देना चाहिये। - युधिष्ठिर धर्म हैं। इसका अभिप्राय यह है कि वे शम, दम, सत्य, अहिंसा आदि रूप धर्मकी मूर्ति हैं। अर्जुन-भीम आदिको धर्मकी शाखा बतलानेका अभिप्राय यह है कि वे सब युधिष्ठिरके ही स्वरूप हैं, उनसे अभिन्न हैं। शुद्धसत्त्वमय ज्ञानविग्रह श्रीकृष्णरूप परमात्मा ही उसके मूल हैं। उनके दृढ़ ज्ञानसे ही धर्मकी नींव मजबूत होती है। श्रुति भगवतीने कहा है कि “हे गार्गी! इस अविनाशी परमात्माको जाने बिना इस लोकमें जो हजारों वर्षपर्यन्त यज्ञ करता है, दान देता है, तपस्या करता है, उन सबका फल नाशवान्‌ ही होता है।' ज्ञानका मूल है ब्रह्म अर्थात्‌ वेद। वेदसे ही परमधर्म योग और अपरधर्म यज्ञ-यागादिका ज्ञान होता है। यह निश्चित सिद्धान्त है कि धर्मका मूल केवल शब्दप्रमाण ही है। वेदके भी मूल ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे ही वेद-सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं। इस प्रकार उपदेशकके रूपमें ब्राह्मण, प्रमाणके रूपमें वेद और अनुग्राहकके रूपमें परमात्मा धर्मका मूल है। इससे यह बात सिद्ध हुई है कि वेद और ब्राह्मणका भक्त अधिकारी पुरुष भगवदाराधनके बलसे योगादिरूप धर्ममय वृक्षका सम्पादन करे। उस वृक्षके अहिंसा-सत्य आदि तने हैं। धारण-ध्यान आदि शाखाएँ हैं और तत्त्व-साक्षात्कार ही उसका फल है। इस धर्ममय वृक्षके समाश्रयसे ही पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं। > शास्त्रोक्त आचारका परित्याग न करना, सदाचारी सत्पुरुषोंका संग करना और सदाचारमें दृढ़तासे स्थित रहना--इसको “शौच” कहते हैं। अपनी इच्छाके अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें विकार न होना ही 'धृति" है। सबसे बढ़कर सामर्थ्यका होना ही “विक्रम” है। सद्वृत्तकी अनुवृत्ति ही 'शुश्रूषा” है। (सदाचारपरायण गुरुजनोंका अनुसरण गुरुशुश्रूषा है।) किसीके द्वारा अपराध बन जानेपर भी उसके प्रति अपने चित्तमें क्रोध आदि विकारोंका न होना ही 'क्षमाशीलता' है। जितेन्द्रियता अथवा अनुद्धत रहना ही “विनय” है। बलवान्‌ शत्रुको भी पराजित कर देनेका अध्यवसाय “शौर्य” है। इनके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं-- आचारापरिहारश्न संसर्गश्चाप्यनिन्दितै: | आचारे च व्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ।। इष्टानिष्टार्थसम्पत्तौ चित्तस्याविकृतिर्धृतिः | सर्वातिशयसामर्थ्य॑ विक्रमं परिचक्षते ।। वृत्तानुवृत्ति: शुश्रूषा क्षान्तिरागस्यविक्रिया । जितेन्द्रियत्वं विनयो5थवानुद्धतशीलता ।। शौर्यमध्यवसायः स्याद्‌ बलिनो5पि पराभवे ।। > आचार्य, ब्रह्मा, ऋत्विकू, सदस्य, यजमान, यजमानपत्नी, धन-सम्पत्ति, श्रद्धा-उत्साह, विधि- विधानका सम्यक्‌ पालन एवं सदबुद्धि आदि यज्ञकी उत्तम गुणसामग्रीके अन्तर्गत हैं। (पर्वसंग्रहपर्व) द्वितीयो<्ध्याय: समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल ऋषय ऊचु: समन्तपञ्चकमिति यदुक्त सूतनन्दन । एतत्‌ सर्व यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम्‌,ऋषि बोले--सूतनन्दन! आपने अपने प्रवचनके प्रारम्भमें जो समनन्‍्तपंचक (कुरुक्षेत्र)- की चर्चा की थी, अब हम उस देश (तथा वहाँ हुए युद्ध)-के सम्बन्धमें पूर्णरूपसे सब कुछ यथावत्‌ सुनना चाहते हैं

Ṛṣaya ūcuḥ—samantapañcakam iti yad uktaṁ sūtanandana, etat sarvaṁ yathātattvaṁ śrotum icchāmahe vayam.

The sages said: “O delight of the Sūtas, you earlier mentioned the place called Samantapañcaka. Now we wish to hear, in full and exactly as it truly is, everything about that land—and about the great conflict that took place there.”

ऋषयःsages
ऋषयः:
Karta
TypeNoun
Rootऋषि
FormMasculine, Nominative, Plural
ऊचुःsaid
ऊचुः:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect (Liṭ), 3rd, Plural, Parasmaipada
समन्तपञ्चकम्Samantapañcaka (name of a region)
समन्तपञ्चकम्:
Karma
TypeNoun
Rootसमन्तपञ्चक
FormNeuter, Accusative, Singular
इतिthus/so (quotative)
इति:
TypeIndeclinable
Rootइति
यत्which (that)
यत्:
TypePronoun
Rootयद्
FormNeuter, Nominative, Singular
उक्तम्said/uttered
उक्तम्:
TypeVerb
Rootवच्
Formक्त (kta), Neuter, Nominative, Singular, Passive (past participle)
सूतनन्दनO son of the Sūta (charioteer-bard)
सूतनन्दन:
TypeNoun
Rootसूत-नन्दन
FormMasculine, Vocative, Singular
एतत्this
एतत्:
Karma
TypePronoun
Rootएतद्
FormNeuter, Accusative, Singular
सर्वम्all/entire
सर्वम्:
Karma
TypeAdjective
Rootसर्व
FormNeuter, Accusative, Singular
यथातत्त्वम्in accordance with reality; truly
यथातत्त्वम्:
TypeIndeclinable
Rootयथा-तत्त्व
श्रोतुम्to hear
श्रोतुम्:
TypeVerb
Rootश्रु
FormInfinitive (tumun)
इच्छामहेwe desire/wish
इच्छामहे:
TypeVerb
Rootइष्
FormPresent (Laṭ), 1st, Plural, Ātmanepada
वयम्we
वयम्:
Karta
TypePronoun
Rootअस्मद्
Form—, Nominative, Plural

संजय उवाच

Ṛṣayaḥ (the sages)
S
Sūtanandana (Ugraśravas Sauti, the narrator)
S
Samantapañcaka
K
Kurukṣetra (implied by Samantapañcaka in Mahābhārata tradition)