Ādi Parva, Adhyāya 180 — Svayaṃvara-Virodha and Pāṇḍava Parākrama
Draupadī Episode
वसिष्ठ उवाच ततस्तं क्रोधजं तात और्वोडग्निं वरुणालये । उत्ससर्ज स चैवाप उपयुद्धक्ते महोदधौ,वसिष्ठजी कहते हैं--पराशर! तब और्वने (अपनी) उस क्रोधाग्निको समुद्रमें डाल दिया। आज भी वह बहुत बड़ी घोड़ीके मुखकी-सी आकृति धारण करके महासागरके जलका पान करती रहती है। वेदज्ञ पुरुष उससे (भली-भाँति) परिचित हैं। वह बड़वा अपने मुखसे वही आग उगलती हुई महासागरका जल पीती रहती है गन्धर्व उवाच एवमुक्त: पुलस्त्येन वसिष्ठदेन च धीमता । तदा समापयामास सत्र शाक्तो महामुनि: गन्धर्व कहता है--अर्जुन! पुलस्त्यजी तथा परम बुद्धिमान् वसिष्ठजीके यों कहनेपर महामुनि शक्तिपुत्र पराशरने उसी समय यज्ञको समाप्त कर दिया
Vasiṣṭha uvāca: tatas taṁ krodhajaṁ tāta aurvo 'gnim Varuṇālaye | utsasarja sa caivāpa upayuddhakte mahodadhau ||
Vasiṣṭha said: “Then, dear one, Aurva cast that fire born of wrath into the abode of Varuṇa—the ocean. There, in the great sea, it remains, drinking the waters and blazing forth.”
वसिष्ठ उवाच