Ādi Parva, Adhyāya 178 — Royal Contestants Assemble; Cosmic Witnesses; The Bow Remains Unstrung
याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभ: । स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च,वसिष्ठजीने (पराशरसे) कहा--वत्स! इस पृथ्वीपर कृतवीर्य नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे नृपश्रेष्ठ वेदज्ञ भृगुवंशी ब्राह्मणोंक यजमान थे। तात! उन महाराजने सोमयज्ञ करके उसके अन्तमें उन अग्रभोजी भार्गवोंको विपुल धन और धान्य देकर उसके द्वारा पूर्ण संतुष्ट किया। राजाओंमें श्रेष्ठ कृतवीर्यके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके वंशजोंको किसी तरह द्रव्यकी आवश्यकता आ पड़ी। भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यहाँ धन है, यह जानकर वे सभी राजपुत्र उन श्रेष्ठ भार्गवोंके पास याचक बनकर गये। उस समय कुछ भार्गवोंने अपनी अक्षय धनराशिको धरतीमें गाड़ दिया
yājyo vedavidāṁ loke bhṛgūṇāṁ pārthivarṣabhaḥ | sa tān agrabhujas tāta dhānyena ca dhanena ca ||
Vasiṣṭha said: “Dear child, in the world of Veda-knowers there was a bull among kings—Kṛtavīrya—fit to be the yājamāna (sacrificial patron) for the Bhṛgu lineage. He gratified those foremost recipients, the Bhārgava Brahmins, by giving them abundant grain and wealth.”
वसिष्ठ उवाच