भीमस्य जलान्वेषणं तथा वनविश्रान्तिः
Bhīma’s Search for Water and the Forest Halt
(न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी । अदृश्यत महाराज तत्र किंचन संयुगे ।। बाणान्धकारे बलिना कृते गाण्डीवधन्वना ।) महाराज! उस युद्धमें न तो दिशाओंका पता चलता था न आकाशका और न पृथ्वी अथवा और कुछ भी ही दिखायी देता था। बलवान वीर गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा घोर अन्धकार फैला दिया था। सिंहनादश्न संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रित: । ततः पञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह,उस समय पाण्डव-दलमें साधुवादके साथ-साथ सिंहनाद हो रहा था। उधर पंचालराज द्रपदने अपने भाई सत्यजित॒को साथ लेकर तीव्र गतिसे अर्जुनपर धावा किया, ठीक उसी तरह जैसे शम्बरासुरने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था। परंतु कुन्तीनन्दन अर्जुनने बाणोंकी भारी बौछार करके पंचालनरेशको ढक दिया
vaiśampāyana uvāca |
na diśo nāntarikṣaṃ ca tadā naiva ca medinī |
adṛśyata mahārāja tatra kiṃcana saṃyuge ||
bāṇāndhakāre balinā kṛte gāṇḍīvadhanvanā ||
Vaiśampāyana said: O King, in that battle neither the directions, nor the sky, nor even the earth could be made out—nothing at all was visible. For the mighty Arjuna, bearer of the Gāṇḍīva, had spread a dense darkness by means of his arrows.
वैशम्पायन उवाच