Adhyāya 14: Sudēṣṇā Sends Sairandhrī to Kīcaka’s House (सुदेष्णा–सैरन्ध्री–कीचक संवादः)
त्यजामि दारान् मम ये पुरातना भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि । अहं च ते सुन्दरि दासवत् स्थित: सदा भविष्ये वशगो वरानने,“चारुहासिनि! यदि तुम चाहो तो मैं पहली स्त्रियोंको त्याग दूँगा अथवा वे सब तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी। सुन्दरि! सुमुखि! मैं स्वयं भी दासकी भाँति सदा तुम्हारे अधीन रहूँगा'
Vaiśampāyana sprach: „O du mit dem schönen Lachen, wenn du es wünschst, will ich meine früheren Frauen verstoßen, oder sie sollen allesamt als deine Dienerinnen leben. O Schöne, o Anmutige, ich selbst werde wie ein Knecht dastehen und stets deinem Willen unterworfen sein.“
वैशम्पायन उवाच