Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
(प्रयत: प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने ।) स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समचोदयम् तब मैंने एकाग्रचित्त हो मस्तक झुकाकर देवाधिदेव महात्मा रुद्रको प्रणाम किया और “समस्त भूतोंका कल्याण हो” ऐसा कहकर उनके महान् पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया ।। ४० ई | यत् तद् रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम्,उसीको “रौद्रास्त्र” भी कहते हैं। वह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। वह महान् एवं दिव्य पाशुपतास्त्र सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय है। उसका प्रयोग करते ही मुझे एक दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ, जिनके तीन मस्तक, तीन मुख, नौ नेत्र तथा छः: भुजाएँ थीं। उनका स्वरूप बड़ा तेजस्वी था। उनके मस्तकके बाल सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे
svasti bhūtebhya ity uktvā mahāstraṃ samacodayam
Nachdem er sich ehrfürchtig verneigt und dem großen Herrn seine Verehrung dargebracht hatte, sprach Arjuna: „Wohl ergehe es allen Wesen“, und setzte dann die mächtige Waffe in Bewegung. Dies erscheint nicht als persönliche Rache, sondern als feierlicher, gezügelter Einsatz göttlicher Kraft, eingeleitet durch Demut und einen universalen Segensspruch—eine ethische Mahnung, dass selbst im Krieg Macht nur mit Ehrfurcht und im Blick auf das Wohl aller angerufen werden darf.
अजुन उवाच
Even when compelled to wield overwhelming power, one should act with humility, reverence, and a universal intention of welfare—‘svasti bhūtebhyaḥ’—so that force is governed by dharma rather than hatred.
Arjuna, after offering salutations, pronounces a benediction for all beings and then activates a mighty divine weapon (contextually associated in this episode with Rudra/Śiva’s supreme missile).