अव्यक्त–पुरुष–विवेकः (Discrimination of Avyakta/Prakṛti and Puruṣa) — Yājñavalkya’s Anvīkṣikī to Viśvāvasu
यस्माद् यदभिजायेत तत् तत्रैव प्रलीयते । लीयन्ते प्रतिलोमानि सृज्यन्ते चान्तरात्मना,जो तत्त्व जिससे उत्पन्न होता है, वह उसीमें लीन भी होता है। अनुलोमक्रमसे उन तत्त्वोंकी उत्पत्ति होती है (जैसे प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत््वसे अहंकार, अहंकारसे सूक्ष्म भूत आदिके कमसे सृष्टि होती है); परंतु उनका संहार विलोमक्रमसे होता है (अर्थात् पृथ्वीका जलमें, जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है। इस तरह सभी तत्त्व अपने-अपने कारणमें लीन होते हैं)। ये सभी तत्त्व अन्तरात्माद्वारा ही रचे जाते हैं
vasistha uvāca | yasmād yad abhijāyeta tat tatraiva pralīyate | līyante pratilomāni sṛjyante cāntarātmanā ||
Vasiṣṭha sprach: „Was immer aus etwas geboren wird, in eben diese Quelle löst es sich wieder auf. Die Auflösung schreitet in umgekehrter Ordnung fort, während die Schöpfung sich in gerader Ordnung entfaltet; und all diese Prinzipien werden vom Inneren Selbst (Inner Self) geformt. Die Lehre betont eine sittliche Sicht der Wirklichkeit: Das Entstehen und Vergehen der Welt vollzieht sich geordnet, und das Erkennen ihres Ursprungs im inneren Lenker festigt den Geist zu Loslösung und rechtem Verstehen.“
वसिष्ठ उवाच