कर्म–ज्ञान–दैव–स्वभावविचारः
Inquiry into Karma, Knowledge, Fate, and Nature
नासूयत्यागमं कंचित् स्वनयेनोपजीवति । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा तस्मात् सर्वत्र पूजित:,वे किसी शास्त्रमें दोषदृष्टि नहीं करते। अपनी नीतिके अनुसार जीवन-यापन करते हैं। समयको कभी व्यर्थ नहीं गँवाते और मनको वशमें रखते हैं; इसीलिये वे सर्वत्र सम्मानित होते हैं
Er sucht in keiner Śāstra nach Fehlern und lebt nach seiner eigenen Richtschnur des rechten Handelns. Er vergeudet keine Zeit und beherrscht seinen Geist; darum wird er überall geehrt.
वायुदेव उवाच