Śarīrin, Buddhi, and the Limits of Sense-Perception (इन्द्रियबुद्धिशरीरिविचारः)
पांसुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्िता: । सहसा वारिणासिक्ता न यान्ति परिभावनम्,जैसे धूलि, भस्म और सूखे गोबरके चूर्णकी अलग-अलग इकट्टी की हुई ढेरियोंपर जल छिड़का जाय तो वे सहसा जलसे भीगकर इतनी तरल नहीं हो सकतीं कि उनके द्वारा कोई आवश्यक कार्य किया जा सके; क्योंकि बार-बार भिगोये बिना वह सूखा चूर्ण थोड़ा-सा भीगता है, पूरा नहीं भीगता; परंतु उसको यदि बार-बार जल देकर क्रमसे भिगोया जाय तो धीरे-धीरे वह सब गीला हो जाता है, उसी प्रकार योगी विषयोंकी ओर बिखरी हुई इन्द्रियोंको धीरे-धीरे विषयोंकी ओरसे समेटे और चित्तको ध्यानके अभ्याससे क्रमशः स्नेहयुक्त बनावे। ऐसा करनेपर वह चित्त भलीभाँति शान्त हो जाता है
bhīṣma uvāca | pāṃsubhasmakarīṣāṇāṃ yathā vai rāśayaḥ sthitāḥ | sahasā vāriṇā siktā na yānti paribhāvanam |
Bhīṣma sprach: Wie Haufen von Staub, Asche und getrocknetem Kuhdung, wenn man sie plötzlich mit Wasser besprengt, nicht sogleich so durchfeuchtet werden, dass sie weich und brauchbar sind, so wird auch der Geist nicht durch ein abruptes Bemühen sofort tauglich für standhafte Betrachtung. Erst durch wiederholtes, allmähliches Befeuchten wird die trockene Masse überall weich; ebenso soll der Yogin geduldig, Schritt für Schritt, die zerstreuten Sinne von ihren Gegenständen zurückziehen und durch anhaltende Meditationsübung den Geist geschmeidig und still machen, bis er wahrhaft zur Ruhe kommt.
भीष्म उवाच