
कृपोपदेशः — द्रौणेरनिद्रा च (Kṛpa’s Counsel and Drauṇi’s Sleepless Resolve)
Upa-parva: Sauptika Parva — Drauṇi’s Resolve and Counsel of Kṛpa (Chapter 4)
Kṛpa addresses Drauṇi with supportive assurance, stating that the intention to act has arisen and proposing a controlled sequence: rest during the night, then proceed together at dawn with Kṛtavarmā, equipped and coordinated in chariots. Kṛpa amplifies confidence through comparative invulnerability motifs (even Indra cannot restrain them), emphasizing readiness, recovery, and collective strength. Drauṇi replies with heightened agitation, arguing that sleep is impossible for one who is distressed, affronted, or consumed by planning and desire. He enumerates the causes of insomnia: the recollection of Droṇa’s death, the pain of hearing Pāñcāla statements about it, the perceived necessity of retribution against Dṛṣṭadyumna and allied forces, and the burning effect of news about allies’ defeat and the Pāṇḍavas’ victory. He asserts firm determination, concluding that he will undertake a decisive hostile action in the night context (sauptika), after which rest would become possible.
Chapter Arc: रात्रि के धुँधलके में, पराजय की राख पर बैठा अश्वत्थामा भीतर-ही-भीतर जल रहा है—राज्यहानि और पिता-द्रोण के वध की स्मृति उसकी नींद को भस्म कर देती है। → कृपाचार्य और भोजवंशी कृतवर्मा उसे संयम और योजना की राह दिखाते हैं—आज रात कवच-ध्वजा उतारकर विश्राम करो, प्रभात में हम साथ चलेंगे; पर अश्वत्थामा का क्रोध चौगुना होकर जागता है, और दुर्योधन की टूटी जाँघ की दशा सुनकर करुणा भी उसी क्रोध में घुल जाती है। → अश्वत्थामा मन में निश्चय बाँध लेता है कि धृष्टद्युम्न—पिता के वध का कारण—और उसके सहचर पाँचाल, सब रात्रि में ही दंड पाएँगे; प्रतिशोध का यह संकल्प उसके भीतर की अंतिम झिझक को काट देता है। → कृप और कृतवर्मा की ‘प्रभात-युद्ध’ की सलाह के बावजूद, अश्वत्थामा का मन रात के मार्ग पर टिक जाता है—वह मान लेता है कि अब शत्रु-शिविर में सोते हुओं पर ही प्रहार होगा, और उसी से ‘पूर्ण प्रीति’ (विजय-तृप्ति) मिलेगी। → तीनों की दिशा तय हो चुकी है—अगला कदम शत्रु-शिविर की ओर है, जहाँ निद्रा में पड़े पाँचालों पर रात्रि-प्रलय उतरने वाला है।
Verse 1
अ-क्रा् - भोजका अर्थ है भोजवंशी कृतवर्मा। चतुथों5 ध्याय: कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना कृप उवाच दिष्टया ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत । नत्वां वारयितुं शक्तो वज़पाणिरपि स्वयम्,कृपाचार्य बोले--तात! तुम अपनी टेकसे टलने-वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ। तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते
Kṛpa sprach: „Glücklich ist es, o Acyuta, dass dieser Entschluss in dir aufgestiegen ist – Vergeltung zu fordern. Nicht einmal Vajrapāṇi (Indra) selbst vermöchte dich von dieser Tat zurückzuhalten.“
Verse 2
अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ । अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वज:,आज रातमें कवच और ध्वजा खोलकर विश्राम करो। कल सबेरे हम दोनों एक साथ होकर तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे
Kṛpa sprach: „Bei Tagesanbruch werden wir beide gemeinsam hinter dir herziehen. Für diese Nacht aber ruhe aus, nachdem du Rüstung und Feldzeichen abgelegt hast.“
Verse 3
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ,अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वत: । परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ जब तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ोगे, उस समय मैं और सात्वतवंशी कृतवर्मा दोनों ही कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो तुम्हारे साथ चलेंगे
Sañjaya sprach: „Wenn du vorrückst, um dem Feind entgegenzutreten, werde auch ich – und Kṛtavarmā aus der Sātvata-Linie – dir folgen. Gerüstet und auf unsere Streitwagen gestiegen, werden wir mit dir ziehen, während du dich dem gegnerischen Heer stellst.“
Verse 4
आवाभ्यां सहित: शत्रून् श्वो निहन्ता समागमे । विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पजचालान् सपदानुगान्,रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! कल सबेरेके संग्राममें हम दोनोंके साथ रहकर तुम अपने शत्रु पांचालों और उनके सेवकोंको बलपूर्वक मार डालना “मैं तो आज सोते समय शत्रुओंका संहार करके निश्चिन्त होनेपर ही विश्राम करूँगा और नींद लूँगा' ।। इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां चतुर्थोडध्याय:
Kṛpa said: “O best of chariot-warriors, tomorrow in the battle, standing together with us two, strike down your enemies—the Pāñcālas and those who follow at their heels. Show your valor and destroy them.” The counsel frames killing as a planned, collective act to be executed at daybreak, revealing how strategic resolve and the thirst for retribution can eclipse restraint and the ethical limits of warfare.
Verse 5
शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् | चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम्,तात! तुम पराक्रम दिखाकर शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हो, अतः इस रातमें विश्राम कर लो। तुम्हें जागते हुए बहुत देर हो गयी है, अब इस रातमें सो लो
Kṛpa said: “You are capable—having displayed your valor—of striking down the enemies. Therefore rest for this night. You have been awake a long time, dear one; now sleep for a while through this night.”
Verse 6
विश्रान्तश्न विनिद्रश्न स्वस्थचित्तशक्ष॒ मानद । समेत्य समरे शत्रून् वधिष्यसि न संशय:,मानद! थकावट दूर करके नींद पूरी कर लेनेसे तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा। फिर तुम समरभूमिमें जाकर शत्रुओंका वध कर सकोगे, इसमें संशय नहीं है
Kṛpa said: “O bestower of honor, once you have rested and fully slept, your mind will become steady and sound. Then, entering the battlefield, you will be able to slay the enemies—of this there is no doubt.” In context, the counsel frames violence as a deliberate act requiring composure and readiness, not impulsive rage, even as it remains embedded in the harsh ethic of war.
Verse 7
न हि त्वां रथिनां श्रेष्ठ प्रगहीतवरायुधम् । जेतुमुत्सहते शश्वदपि देवेषु वासव:,तुम रथियोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अपने हाथमें उत्तम आयुध ले रखा है। तुम्हें देवताओंके राजा इन्द्र भी कभी जीतनेका साहस नहीं कर सकते हैं
Kṛpa said: “Indeed, O best of chariot-warriors, with your excellent weapon already grasped in hand, even Vāsava (Indra), king among the gods, would never dare to attempt to conquer you.”
Verse 8
कृपेण सहित यान्त॑ गुप्तं च कृतवर्मणा । को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट्,जब कृतवमसि सुरक्षित हो द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मुझ कृपाचार्यके साथ कुपित होकर युद्धके लिये प्रस्थान करेगा, उस समय कौन वीर, वह देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उसका सामना कर सकता है?
Kripa said: “When Drona’s son (Aśvatthāmā), guarded by Kṛtavarman and accompanied by me, advances to battle in wrath, who could possibly fight him on the field—even if that warrior were Indra himself, lord of the gods?”
Verse 9
ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वरा: । प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान्,अतः हमलोग रातमें विश्राम करके निद्रारहित और विगतज्वर हो प्रातःकाल अपने शत्रुओंका संहार करेंगे
Kṛpa sprach: „Lasst uns diese Nacht ruhen, wachsam bleiben und frei von Unruhe. Wenn die Morgenröte anbricht, werden wir das feindliche Heer niederschlagen.“
Verse 10
तव ह्[स्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशय: । सात्वतो5पि महेष्वासो नित्य॑ं युद्धेषु कोविद:,इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे और मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं तथा महाधनुर्धर कृतवर्मा भी युद्ध करनेकी कलामें सदा ही कुशल हैं
Kṛpa sprach: „Zweifellos besitzt du göttliche Waffen — und ich ebenso. Und der Sātvata-Held, der große Bogenschütze Kṛtavarmā, ist stets kundig in den Künsten des Krieges.“
Verse 11
ते वयं सहितास्तात सर्वान् शत्रूनू समागतान् | प्रसह समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्ललाम्,तात! हम सब लोग एक साथ होकर समरांगणमें सामने आये हुए समस्त शत्रुओंका संहार करके अत्यन्त हर्षका अनुभव करेंगे
Kṛpa sprach: „Mein Lieber, wenn wir gemeinsam handeln, dann werden wir, nachdem wir im Kampf mit Gewalt alle Feinde erschlagen haben, die sich vor uns versammelt haben, reiche Genugtuung und Jubel erlangen.“
Verse 12
विश्रमस्व त्वमव्यग्र: स्वप चेमां निशां सुखम् | अहं च कृतवर्मा च त्वां प्रयान्तं नरोत्तमम्,तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल खबरेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आखरूढ़ हो यात्रा करेंगे
Kṛpa sprach: „Ruh dich aus, ohne Unruhe, und schlafe diese Nacht behaglich. Morgen, wenn du zur Schlacht aufbrichst, o Bester der Männer, werden Kṛtavarmā und ich gemeinsam hinter dir herziehen, den Bogen in der Hand, um den Feinden Qual zu bringen.“
Verse 13
अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ | रथिन त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ,तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल खबरेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आखरूढ़ हो यात्रा करेंगे
Kṛpa sprach: „Wir beide — Bogenschützen und Peiniger der Feinde — werden gemeinsam folgen. Auf unseren Wagen steigend, vollständig gerüstet, werden wir in Eile hinter dem Wagenkrieger herziehen, der nach vorn drängt.“
Verse 14
स गत्वा शिबिरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे । ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत्,उस अवस्थामें शत्रुओंके शिविरमें जाकर युद्धके लिये अपने नामकी घोषणा करके सामने आकर जूझते हुए उन शत्रुओंका बड़ा भारी संहार मचा देना
Geh in ihr Lager und rufe mitten im Kampf laut deinen Namen aus; dann, indem du sie im offenen Gefecht stellst, wirst du unter den Feinden ein großes Blutbad anrichten.
Verse 15
कृत्वा च कदन तेषां प्रभाते विमले5हनि । विहरस्व यथा शक्र: सूदयित्वा महासुरान्,जैसे इन्द्र बड़े-बड़े असुरोंका विनाश करके सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार तुम भी कल प्रातःकाल निर्मल दिन निकल आनेपर उन शत्रुओंका विनाश करके इच्छानुसार विहार करो
Hast du bei Tagesanbruch, wenn der Tag klar und rein hervorbricht, ihr Blutbad vollbracht, so zieh nach Belieben umher — wie Śakra (Indra), der nach der Vernichtung der mächtigen Asuras in Leichtigkeit und Triumph wandelt.
Verse 16
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पज्चालानां वरूथिनीम् | दैत्यसेनामिव क्रुद्ध: सर्वदानवसूदन:,जैसे सम्पूर्ण दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्र कुपित होनेपर दैत्योंकी सेनाको जीत लेते हैं, उसी प्रकार तुम भी रणभूमिमें पांचालोंकी विशाल वाहिनीपर विजय पानेमें समर्थ हो
Du bist wahrlich imstande, auf dem Schlachtfeld das große Heer der Pañcālas zu besiegen — wie Indra, der Vernichter aller Dānavas, der im Zorn das Heer der Daityas niederwirft.
Verse 17
मया त्वां सहितं संख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा । न सहेत विभु: साक्षाद् वज़पाणिरपि स्वयम्,युद्धस्थलमें जब तुम मेरे साथ खड़े होओगे और कृतवर्मा तुम्हारी रक्षामें लगे होंगे, उस समय हाथमें वज्र लिये हुए साक्षात् देवसम्राट् इन्द्र भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे
Kṛpa sprach: „Wenn du in der Schlacht an meiner Seite stehst und Kṛtavarman zu deinem Schutz aufgestellt ist, dann könnte nicht einmal Indra selbst—der mächtige Herr, den Donnerkeil in der Hand—deinem Ansturm standhalten.“
Verse 18
न चाहं समरे तात कृतवर्मा न चैव हि | अनिर्जित्य रणे पाण्डून् न च यास्यामि कहिचित्,तात! समरांगणमें मैं और कृतवर्मा पाण्डवोंको परास्त किये बिना कभी पीछे नहीं हटेंगे
Kṛpa sprach: „Mein Sohn, weder ich noch Kṛtavarmā werden jemals vom Schlachtfeld weichen. Solange wir die Pāṇḍavas nicht zuerst im Kampf bezwungen haben, werden wir nicht fortgehen—nirgendwohin.“
Verse 19
हत्वा च समरे क्रुद्धान् पज्चालान् पाण्डुभि: सह । निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वयम्,समरांगणमें कुपित हुए पांचालोंको पाण्डवोंसहित मारकर ही हम सब लोग पीछे हटेंगे अथवा स्वयं ही मारे जाकर स्वर्गलोककी राह लेंगे
Kṛpa sprach: „Erst wenn wir im Kampf die zornentbrannten Pāñcālas samt den Söhnen Pāṇḍus erschlagen haben, werden wir alle zurückweichen; andernfalls, wenn wir selbst fallen, werden wir in den Himmel eingehen.“
Verse 20
सर्वोपायै: सहायास्ते प्रभाते वयमाहवे । सत्यमेतन्महाबाहो प्रब्रवीमि तवानघ,निष्पाप महाबाहु वीर! कल प्रातःकाल हमलोग सभी उपायोंसे युद्धमें तुम्हारे सहायक होंगे। मैं तुमसे यह सच्ची बात कह रहा हूँ
Kṛpa sagte: „Bei Tagesanbruch werden wir dir im Kampf mit allen erdenklichen Mitteln beistehen. Das ist die Wahrheit, o Starkarmiger; ohne Trug spreche ich zu dir — o schuldloser Held.“
Verse 21
राजन! मामाके इस प्रकार हितकारक वचन कहनेपर द्रोणकुमार अभश्वत्थामाने क्रोधसे लाल आँखें करके उनसे कहा--
Kṛpa sprach: „O König! Als wir, seine eigenen Wohlgesinnten, ihm auf diese heilsame Weise zusprachen, erwiderte Aśvatthāmā, Dronas Sohn —die Augen vor Zorn gerötet— ihnen.“
Verse 22
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च । अर्थाश्विन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः । तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेउद्य चतुष्टयम्,“मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं
„O Onkel! Wie sollte Schlaf zu einem Menschen kommen, der von Kummer gequält wird, oder von Groll verzehrt, oder in Gedanken an viele dringliche Werke befangen, oder wiederum vom Begehren versklavt? Sieh: Heute sind alle vier zugleich über mich gekommen.“
Verse 23
यस्य भागश्नतुर्थो मे स्वप्रमह्नाय नाशयेत् । कि नाम दुःखं लोके5स्मिन् पितुर्वधमनुस्मरन्
Kṛpa sprach: „Wenn auch nur der vierte Teil dessen, was mir zusteht, um meines eigenen Stolzes willen zugrunde ginge — welches Leid in dieser Welt könnte dem Kummer gleichkommen, sich an die Ermordung des Vaters zu erinnern?“
Verse 24
यथा च निहत: पापै: पिता मम विशेषत:,“इन पापियोंने विशेषत: मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगतमें दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है?
Kṛpa sprach: „Du selbst hast mit eigenen Augen gesehen, wie jene sündigen Männer—zumal—meinen Vater erschlugen. Dieser Anblick durchbohrt die tiefsten, lebenswichtigsten Stellen in mir. In einem solchen Zustand—wie könnte ein Krieger wie ich in dieser Welt auch nur einen Augenblick weiterleben?“
Verse 25
प्रत्यक्षमपि ते सर्व तन्मे मर्माणि कृन्तति । कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तमपि जीवति,“इन पापियोंने विशेषत: मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगतमें दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है?
Auch wenn du alles mit eigenen Augen gesehen hast, schneidet eben dieses Ereignis weiter in meinen lebenswichtigen Kern. Denn nachdem jene Sünder—zumal—meinen Vater auf solche Weise getötet haben, wie könnte ein Mensch wie ich in dieser Welt auch nur einen Augenblick am Leben bleiben?
Verse 26
द्रोणो हतेति यद् वाच: पञ्चालानां शृणोम्यहम् | धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे
Kṛpa sprach: „Ich höre die Pañcālas ausrufen: ‚Droṇa ist erschlagen.‘ Doch solange ich Dhṛṣṭadyumna nicht eigenhändig töte, habe ich nicht das Herz, weiterzuleben.“
Verse 27
'ट्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये” यह बात जब मैं पांचालोंके मुखसे सुनता आ रहा हूँ, तब धृष्टद्युम्नका वध किये बिना जीवित नहीं रह सकता ।। स मे पितुर्वधाद् वध्य: पञ्चाला ये च संगता: । विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुत:
Kṛpa sprach: „Seit ich aus dem Mund der Pañcālas höre: ‚Droṇācārya, unser Lehrer, wurde von Dhṛṣṭadyumna eigenhändig erschlagen‘, kann ich nicht weiterleben, ohne Dhṛṣṭadyumna zu töten. Er muss von mir erschlagen werden für den Mord an meinem verehrten Lehrer, der mir wie ein Vater war; ebenso die Pañcālas, die sich zu ihm gesellten. Denn ich habe die Klage des Königs gehört, im Geist gebrochen, und dieser Schmerz verlangt Vergeltung.“
Verse 28
कस्य हाकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत्
Kṛpa sprach: „Wessen Augen würden keine Tränen vergießen—selbst wenn er völlig ohne Mitgefühl wäre—beim Anblick einer solchen Szene?“
Verse 29
यक्षायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जित:
Kṛpa sagte: „Dieser ist wie ein Yakṣa — mein Verbündeter und Stütze — und doch ist er, während ich noch lebe, überwältigt worden.“
Verse 30
शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम् | एकाग्रमनसो मेउ5द्य कुतो निद्रा कुत: सुखम्
Dieser Ansturm vermehrt nur meinen Kummer, wie ein reißender Strom den Ozean anschwellen lässt. Heute kann mein Geist sich auf keinen einzigen Punkt sammeln — wie sollte Schlaf zu mir kommen, und wie sollte es irgendein Glück geben?
Verse 31
“मेरे जीते-जी जो यह मेरा मित्र-पक्ष परास्त हो गया, वह मेरे शोककी उसी प्रकार वृद्धि कर रहा है, जैसे जलका वेग समुद्रको बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही कार्यकी ओर लगा हुआ है, फिर मुझे नींद कैसे आ सकती है और मुझे सुख भी कैसे मिल सकता है? ।। वासुदेवार्जुनाभ्यां च तानहं परिरक्षितान् | अविषद्दुतमान् मन्ये महेन्द्रेणापि सत्तम
Kṛpa sagte: „Solange ich noch lebe, lässt die Niederlage meines eigenen verbündeten Lagers meinen Kummer nur anschwellen, wie der Ansturm der Wasser den Ozean steigen lässt. Heute ist mein Geist auf eine einzige Aufgabe festgelegt; wie sollte da Schlaf zu mir kommen, und wie sollte ich Frieden finden? Jene Männer, die von Vāsudeva und Arjuna behütet werden, halte ich für unerschütterlich und für die Vornehmsten — o Bester der Menschen — als wären sie sogar von Mahendra selbst geschützt.“
Verse 32
'सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! पाण्डव और पांचाल जब श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित हों, उस दशामें मैं उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी अत्यन्त असहा एवं अजेय मानता हूँ ।। न चापि शक्तः संयन्तुं कोपमेतं समुत्थितम् | त॑ं न पश्यामि लोकेडस्मिन् यो मां कोपान्निवर्तयेत्
O Bester der Menschen! Wenn die Pāṇḍava und die Pañcāla unter dem Schutz Śrī Kṛṣṇas (Vāsudevas) und Arjunas stehen, halte ich sie für unerträglich schwer zu bezwingen und unbesiegbar — selbst für Indra, den König der Götter. Und auch diesen aufgestiegenen Zorn vermag ich nicht zu zügeln; in dieser Welt sehe ich keinen Mann, der mich vom Grimm abbringen könnte.
Verse 33
“इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, इसे मैं स्वयं भी रोक नहीं सकता। इस संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको नहीं देख रहा हूँ, जो मुझे क्रोधसे दूर हटा दे ।। तथैव निश्चिता बुद्धिरेषा साधु मता मम । वार्तिकै: कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभव:
Kṛpa sagte: „Der Zorn, der in diesem Augenblick in mir aufgestiegen ist, den kann ich nicht zügeln, nicht einmal aus eigener Kraft. In dieser Welt sehe ich keinen Mann, der mich vom Grimm abbringen könnte. Und mein Entschluss steht fest; nach meinem Urteil ist es der rechte Weg. Doch wenn ich die Berichte und das Gerede höre, werde ich an die Niederlage und die Schmach meiner Freunde erinnert.“
Verse 34
पाण्डवानां च विजयो हृदयं दहतीव मे । “इसी प्रकार मैंने जो अपनी बुद्धिमें शत्रुओंके संहारका यह दृढ़ निश्चय कर लिया है, यही मुझे अच्छा प्रतीत होता है। जब संदेशवाहक दूत मेरे मित्रोंकी पराजय और पाण्डवोंकी विजयका समाचार कहने लगते हैं, तब वह मेरे हृदयको दग्ध-सा कर देता है ।। अहं तु कदन कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके । ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वर:
Kṛpa sprach: „Der Sieg der Pāṇḍavas brennt in meinem Herzen, als stünde es in Flammen. Darum werde ich heute Nacht, in diesem nächtlichen Überfall, das Gemetzel an den Feinden vollziehen. Danach werde ich ruhen—und schlafen—frei vom Fieber der Qual.“
Verse 231
एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हित॑ वच: । अब्रवीन्मातुलं राजन् क्रोधसंरक्तलोचन:
So von seinem Onkel mütterlicherseits mit wohlmeinendem Rat angesprochen, erwiderte Droṇas Sohn (Aśvatthāmā) seinem Onkel, o König, die Augen vor Zorn gerötet.
Verse 233
हृदयं निर्दहन्मेड्द्य राज्यहानि न शाम्यति । “इन चारोंका एक चौथाई भाग जो क्रोध है, वही मेरी निद्राको तत्काल नष्ट किये देता है। अपने पिताके वधकी घटनाका बारंबार स्मरण करके इस संसारमें कौन-सा ऐसा दुःख है, जिसका मुझे अनुभव न होता हो। वह दुःखकी आग रात-दिन मेरे हृदयको जलाती हुई अबतक बुझ नहीं पा रही है
Kṛpa sagt: „Mein Herz brennt unaufhörlich; der Verlust des Reiches will in mir nicht weichen. Von den vier Kräften, die die Menschen antreiben, ist es der Zorn—ein Viertel davon—der mir augenblicklich den Schlaf raubt. Wenn ich immer wieder an die Tötung meines Vaters denke: Welches Leid in dieser Welt hätte ich nicht gekostet? Das Feuer der Trauer, das mein Herz bei Tag und Nacht verzehrt, ist noch immer nicht erloschen.“
Verse 276
स पुनर्हदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् । *धृष्टद्युम्न तो पिताजीका वध करनेके कारण मेरा वध्य होगा और उसके संगी-साथी जो पांचाल हैं, वे भी उसका साथ देनेके कारण मारे जायँगे। इधर जिसकी जाँघें तोड़ डाली गयी हैं, उस राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने अपने कानों सुना है, वह किस क्रूर मनुष्यके भी हृदयको शोक-दग्ध नहीं कर देगा?
Kṛpa sprach: „Und wiederum: Wessen Herz—selbst wenn es grausam wäre—würde davon nicht versengt? Dhrishtadyumna werde ich töten, weil er meinen Vater erschlug, und seine Gefährten, die Pañcālas, werden ebenfalls fallen, weil sie zu ihm hielten. Und die Klage König Duryodhanas—dessen Schenkel zerschmettert sind—die ich mit eigenen Ohren hörte: Welcher Mensch mit hartem Herzen würde beim Hören nicht von Kummer verbrannt?“
Verse 283
नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृगू वच: पुनः । “टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनकी वैसी बात पुनः सुनकर किस निष्ठुरके भी नेत्रोंसे आँसू नहीं बह चलेगा?
Kṛpa sprach: „Wenn man erneut solche Worte von dem König—Duryodhana—mit zerschmetterten Schenkeln hört, wer—selbst der Härteste—würde da nicht Tränen in den Augen haben?“
The tension between disciplined restraint (rest, timing, counsel) and immediate retaliatory impulse driven by grief and anger, raising questions about legitimate conduct when formal war norms have fractured.
The chapter juxtaposes two models of agency: strategic self-regulation as a safeguard for discernment versus emotion-dominated resolve that narrows moral and cognitive flexibility.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-function is thematic—positioning psychological causality (śoka, krodha, vārttā) as a driver of consequential action within the epic’s karmic narrative.