धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः
Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation
सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत्,महर्षि वाल्मीकिने पूर्वकालमें ही इस भूतलपर एक श्लोकका गान किया है। जिसका भावार्थ इस प्रकार है--“वानर! तुम जो यह कहते हो कि स्त्रियोंका वध नहीं करना चाहिये, उसके उत्तरमें मेरा यह कहना है कि उद्योगी मनुष्यके लिये सदा सब समय वह कार्य करने ही योग्य माना गया है, जो शत्रुओंको पीड़ा देनेवाला हो”
sarvakālaṃ manuṣyeṇa vyavasāyavatā sadā | pīḍākaraṃ amitrāṇāṃ yat syāt kartavyam eva tat ||
Sañjaya sprach: „Zu jeder Zeit gilt für den Menschen von festem Entschluss und Tatkraft: Nur jene Handlung ist zu tun, die den Feinden Bedrängnis bringt.“
संजय उवाच