असुरैर्वध्यमानास्ते क्षीणप्राणा दिवौकस: । अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विप्रं तपोधनम्,असुरोंकी मार खाकर देवताओंकी प्राणशक्ति क्षीण हो चली और वे भागकर तपस्यामें संलग्न हुए तपोधन विप्रवर अत्रि मुनिके पास गये। वहाँ उन्होंने उन क्रोधशून्य जितेन्द्रिय मुनिका दर्शन किया और इस प्रकार कहा--'प्रभो! असुरोंने अपने बाणोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया है और अब घोर अन्धकार छा जानेके कारण हम भी शत्रुओंके हाथसे मारे जा रहे हैं। हमें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है। आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिये”
asurair vadhyamānās te kṣīṇaprāṇā divaukasaḥ | apaśyanta tapasyantam atriṃ vipraṃ tapodhanam ||
Bhīṣma sprach: Von den Asuras niedergemacht und an Lebenshauch geschwächt, erblickten die Götter den Weisen Atri, den Brahmanen reich an asketischer Kraft, in strenger Buße versunken, und traten zu ihm, um Schutz zu suchen.
भीष्म उवाच