Rudra-Śiva: Names, Two Natures, and the Logic of Epithets (रुद्रनाम-बहुरूपत्व-प्रकरणम्)
श्रीमहेश्वर उवाच (एतत्ते कथयिष्यामि यत्ते देवि मन:प्रियम् । शृणु तत् सर्वमखिलं धर्म वर्णाश्रमाश्रितम् ।। श्रीमहे श्वरने कहा--देवि! तुम्हारे मनको प्रिय लगनेवाला जो यह धर्मका विषय है, उसे बताऊँगा। तुम वर्णों और आश्रमोंपर अवलम्बित समस्त धर्मका पूर्णरूपसे वर्णन सुनो ।। ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्वेति चतुर्विधम् ब्रद्मणा विहिता: पूर्व लोकतन्त्रमभीप्सता ।। कर्माणि च तदर्हाणि शास्त्रेषु विहितानि वै । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--ये वर्णोौंके चार भेद हैं। लोकतन्त्रकी इच्छा रखनेवाले विधाताने सबसे पहले ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है और शास्त्रोंमें उनके योग्य कर्मोका विधान किया है ।। यदीदमेकवर्ण स्याज्जगत् सर्व विनश्यति ।। सहैव देवि वर्णानि चत्वारि विहितान्यत: । देवि! यदि यह सारा जगत् एक ही वर्णका होता तो सब साथ ही नष्ट हो जाता। इसलिये विधाताने चार वर्ण बनाये हैं ।। मुखतो ब्राह्मणा: सृष्टास्तस्मात् ते वाग्विशारदा: ।। बाहुभ्यां क्षत्रिया: सृष्टास्तस्मात् ते बाहुगर्विता: । ब्राह्मणोंकी सृष्टि विधाताके मुखसे हुई है, इसीलिये वे वाणीविशारद होते हैं। क्षत्रियोंकी सृष्टि दोनों भुजाओंसे हुई है, इसीलिये उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व होता है ।। उदरादुद्गता वैश्यास्तस्माद् वार्तोपजीविन: ।। शूद्राश्न॒ पादत: सृष्टास्तस्मात् ते परिचारका: । तेषां धर्माश्च॒ कर्माणि शृणु देवि समाहिता ।। वैश्योंकी उत्पत्ति उदरसे हुई है, इसीलिये वे उदर-पोषणके निमित्त कृषि, वाणिज्यादि वार्तवृत्तिका आश्रय ले जीवन-निर्वाह करते हैं। शूद्रोंकी सृष्टि पैरसे हुई है, इसलिये वे परिचारक होते हैं। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोके धर्म और कर्मोका वर्णन सुनो ।। विप्रा: कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृता: । ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभि: ।। ब्राह्यणको इस भूमिका देवता बनाया गया है। वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न किये गये हैं। अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करना चाहिये ।। यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहा: सदा । उभयोलेोंकयोर्देवि स्थितिर्न स्थात्ू समासत:ः ।। देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ।। ब्राह्मणान् यो&वमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा । प्रहरेत हरेद् वापि धनं तेषां नराधम: ।। कारयेद्धीनकर्माणि कामलोभविमोहनात् । स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ।। मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्पापहारक: । मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतन: ।। जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है। मुझे ही क्रोध दिलाता है, मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त मानव मुझे ही इधर-उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ।। स्वाध्यायो यजन दान॑ तस्य धर्म इति स्थिति: । कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रह: ।। सत्यं शान्तिस्तप: शौचं तस्य धर्म: सनातन: । वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है। वेदोंको पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना--ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं। सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन--यह उनका सनातन धर्म है ।। विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्लहित:ः ।। रस और धान्य (अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ।। तप एव सदा धर्मों ब्राह्मणस्य न संशय: । स तु धर्मार्थिमुत्पन्न: पूर्व धात्रा तपोबलात् ।।) सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है। विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था ।। न्यायतस्ते महा भागे सर्वश: समुदीरित: । भूमिदेवा महाभागा: सदा लोके द्विजातय:,महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है। महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं
śrīmaheśvara uvāca |
etatte kathayiṣyāmi yatte devi manaḥ-priyam |
śṛṇu tat sarvamakhilaṁ dharmaṁ varṇāśramāśritam ||
Śrī Maheśvara sprach: „Göttin, ich werde dir jene Lehre vom Dharma darlegen, die deinem Herzen lieb ist. Höre in voller Gänze die vollständige Darstellung des Dharma, wie er auf dem Gefüge von Varṇa und Āśrama beruht.“
श्रीमहेश्वर उवाच
The verse frames dharma as something to be understood comprehensively through the varṇa–āśrama structure, presenting it as an ordered, teachable system rather than a purely personal preference.
Śiva (Maheśvara) addresses Devī and announces that he will now explain, in full, the doctrine of dharma grounded in varṇas and āśramas—serving as a preface to a longer instructional section.