प्रतीप–गङ्गा संवादः तथा शंतनु–गङ्गा विवाहशर्तिः
Pratīpa and Gaṅgā; Śaṃtanu’s marriage condition
आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनि: । अथास्य लोक: सर्वो5यं सो5मृतत्वाय कल्पते,जब संन्यासी मुनि गाय-बैलोंकी तरह मुखसे ही आहार ग्रहण करता है, हाथ आदिका भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है
Und wenn der entsagende Muni seine Nahrung nur mit dem Mund sucht und zu sich nimmt, wie eine Kuh oder ein Wildstier, ohne Hände oder sonstige Hilfe zu gebrauchen, dann gilt es, als habe er all diese Welten bereits bezwungen, und man hält ihn für fähig, Unsterblichkeit (mokṣa) zu erlangen.
अद्टक उवाच