अध्याय ७४: अक्रोध–क्षमा–निवासनीति
Chapter 74: Non-anger, Forbearance, and the Ethics of Residence
(वैशग्पायन उवाच धर्माभिपूजितं पुत्र॑ काश्यपेन निशाम्य तु । काश्यपात् प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कश्यपनन्दन कण्वने धर्मानुसार मेरे पुत्रका बड़ा आदर किया है, यह देखकर तथा उनकी ओरसे पतिके घर जानेकी आज्ञा पाकर शकुन्तला मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। कण्वस्य वचन श्रुत्वा प्रतिगच्छेति चासकृत् । तथेत्युक्त्वा तु कण्वं च मातरं पौरवो5ब्रवीत् ।। कि चिरायसि मातस्त्वं गमिष्यामो नृपालयम् । कण्वके मुखसे बारंबार 'जाओ-जाओ” यह आदेश सुनकर पूरुनन्दन सर्वदमनने 'तथास्तु” कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और मातासे कहा--'माँ! तुम क्यों विलम्ब करती हो, चलो राजमहल चलें'। एवमुक्त्वा तु तां देवीं दुष्पन्तस्य महात्मन: ।। अभिवाद्य मुने: पादौ गन्तुमैच्छत् स पौरव: । देवी शकुन्तलासे ऐसा कहकर पौरवराजकुमारने मुनिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर महात्मा राजा दुष्यन्तके यहाँ जानेका विचार किया। शकुन्तला च पितरमभिवाद्य कृताञज्जलि: ।। प्रदक्षिणीकृत्य तदा पितरं वाक्यमब्रवीत् | अज्ञानान्मे पिता चेति दुरुक्त वापि चानृतम् ।। अकार्य वाप्यनिष्ट॑ वा क्षन्तुमहति काश्यप । शकुन्तलाने भी हाथ जोड़कर पिताको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके उस समय यह बात कही--“'भगवन्! काश्यप! आप मेरे पिता हैं, यह समझकर मैंने अज्ञानवश यदि कोई कठोर या असत्य बात कह दी हो अथवा न करनेयोग्य या अप्रिय कार्य कर डाला हो, तो उसे आप क्षमा कर देंगे'। एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किउ्चन ।। मनुष्यभावात् कण्वो5पि मुनिरश्रूण्यवर्तयत् । शकुन्तलाके ऐसा कहनेपर सिर झुकाकर बैठे हुए कण्व मुनि कुछ बोल न सके; मानव-स्वभावके अनुसार करुणाका उदय हो जानेसे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे। अब्भक्षान् वायुभक्षांश्व शीर्णपर्णाशनान् मुनीन् ।। फलमूलाशिनो दान्तान् कृशान् धमनिसंततान् | व्रतिनो जटिलान् मुण्डान् वल्कलाजिनसंवृतान् ।। उनके आश्रममें बहुत-से ऐसे मुनि रहते थे, जो जल पीकर, वायु पीकर अथवा सूखे पत्ते खाकर तपस्या करते थे। फल-मूल खाकर रहनेवाले भी बहुत थे। वे सब-के-सब जितेन्द्रिय एवं दुर्बल शरीरवाले थे। उनके शरीरकी नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले उन महर्षियोंमेंसे कितने ही सिरपर जटा धारण करते थे और कितने ही सिर मुड़ाये रहते थे। कोई वल्कल धारण करते थे और कोई मृगचर्म लपेटे रहते थे। समाहूय मुनीन् कण्व: कारुण्यादिदमब्रवीत् ।। मया तु लालिता नित्यं मम पुत्री यशस्विनी । वने जाता विवृद्धा च न च जानाति किड्चन ।। अश्रमेण पथा सर्वर्नीयतां क्षत्रियालयम् ।) महर्षि कण्वने उन मुनियोंकों बुलाकर करुण भावसे कहा--“महर्षियो! यह मेरी यशस्विनी पुत्री वनमें उत्पन्न हुई और यहीं पलकर इतनी बड़ी हुई है। मैंने सदा इसे लाड़- प्यार किया है। यह कुछ नहीं जानती है। विप्रगण! तुम सब लोग इसे ऐसे मार्गसे राजा दुष्यन्तके घर ले जाओ जिसमें अधिक श्रम न हो'। तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे प्रातिष्ठन्त महौजस: । शकुन्तलां पुरस्कृत्य दुष्यन्तस्य पुरं प्रति,“बहुत अच्छा" कहकर वे सभी महातेजस्वी शिष्य (पुत्रसहित) शकुन्तलाको आगे करके दुष्यन्तके नगरकी ओर चले
vaiśampāyana uvāca | dharmābhipūjitaṃ putra kāśyapena niśāmya tu | kāśyapāt prāpya cānujñāṃ mumude ca śakuntalā ||
Vaiśampāyana sprach: „O Sohn (Janamejaya), als Śakuntalā sah, dass Kaṇva, der Sohn Kāśyapas, sie dem Dharma gemäß ehrte, und als sie von ihm die Erlaubnis erhielt, in das Haus ihres Gatten aufzubrechen, empfand sie in ihrem Innern tiefe Freude.“
(वैशग्पायन उवाच
The verse highlights dharma as lived etiquette: honoring dependents properly and granting consent at life-transitions (like a daughter’s departure to her husband’s home). Right conduct by elders (Kaṇva) becomes a source of inner peace and joy for the one being guided (Śakuntalā).
Vaiśampāyana tells Janamejaya that Śakuntalā, having been duly respected and then formally permitted by Kaṇva to leave for her marital home, feels inward happiness—marking the transition from the hermitage to the royal household.