Adhyāya 125: Raṅga-pradarśana — Arjuna’s Entry and Astric Demonstration (रङ्गप्रदर्शनम्)
वैशम्पायन उवाच (ऋषयस्तान् समाश्चास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् | ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विन: ।। सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्षापि नेष्याम: कुरुराष्ट्रं परंतपान् ।। अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्न लोभवान् । स कदाचित्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ।। कुन्त्याश्न वृष्णयो नाथा: कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्रयाश्न बलिनां श्रेष्ठ; शल्यो भ्राता महारथ: ।। भर्त्रा तु मरणं सार्थ फलवन्नात्र संशय: । युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुड्रवा: ।। मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्न नियमै: श्रान्ता मनोवाक्कायजै: शुभै: ।। व्रतोपवासनियमै: कृच्छैश्नान्द्रायणादिभि: । भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ।। येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा । देहपोषणसंयुक्ता विषयैह्वतचेतना ।। देहव्ययेन नरकं॑ महदाप्रोत्यसंशय: । तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्तुयु: ।। भर्तरें चिन्तयन्ती सा भर्तरे निस्तरेच्छुभा | तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ।। तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्य शोभनम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा--'सुभगे! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता। कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्रीके बलवानोंमें श्रेष्ठ महारथी शल्य उसके भाई हैं। इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं। जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छुचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है। वह क्षार (पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है। वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है। किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस (दुर्लभ मनुष्य-) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके नि:संदेह महान् नरकको प्राप्त होती है। अतः साध्वी सत्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय-कामनाएँ नष्ट हो जायाँ। इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है। इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है। अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो/। कुन्त्युवाच यथा पाण्डोश्व निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च । आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ।। यथा<<हुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् । भर्तुश्व॒ मम पुत्राणां मम चैव न संशय: ।। कुन्ती बोली--महात्माओ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है। आपका आदेश मैं सिर-माथे रखती हूँ। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगी। पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने-आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ--इसमें तनिक भी संशय नहीं है। माद्रयुवाच कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे | अस्या हि न समा बुद्धा यद्यपि स्यादरुन्धती ।। कुन्त्याश्न वृष्णयो नाथा: कुन्तिभोजस्तथैव च । नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ।। साहं भर्तारिमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा । भर्तलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ।। धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमत: । पादौ परिचरिष्यामि तदायें हानुमन्यताम् ।। माद्रीने कहा--कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग-क्षेमके निर्वाहमें--पालन-पोषणमें समर्थ हैं। कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती। वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं। बहिन! पुत्रोंक॒ पालन-पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है। अत: मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ। पतिके संयोग-सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है। अत: आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें। मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी। आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें। वैशम्पायन उवाच एवमुक््त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा । ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ।। अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् | मूर्ध््युपाप्राय बहुश: पार्थानात्मसुतौ तथा ।। हस्ते युधिष्ठिरं गृह माद्री वाक्यमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती-साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये। तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूँघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा। माद्रयुवाच कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः । युधिष्ठिर: पिता ज्येष्ठ श्नतुर्णा धर्मत: सदा ।। वृद्धानुशासने सक्ता: सत्यधर्मपरायणा: । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।। तस्मात् सर्वे कुरुध्व॑ वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिता: ।। माद्री बोली--बच्चो! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी। तुम्हारे पिता तो मर गये। अब बड़े भैया युधिष्छिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं। तुम सब बड़े-बूढ़ों--गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना। ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है। अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना। वैशम्पायन उवाच ऋषीणां च पृथायाश्न नमस्कृत्य पुन: पुनः । आयासकृपणा माद्दी प्रत्युवाच पृथां तथा ।। धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्य तेजश्न योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ।। कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पज्चानाममितौजसाम् | ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ।। स्वर्ग दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् | आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ।। ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणै: शुभै: । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ।। धर्म स्वर्ग च कीर्ति च त्वत्कृतेडहमवाप्रुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीविचारणाम् ।। वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, कक््लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा --वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंक समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सदगुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैतला सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'। बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ।। अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमो<स्तु ते । भर्त्रां सह विशालाश्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ।। संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथा: शाश्वती: समा: ।।) राज्ञ: शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् । दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु,तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा--“कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षोतक प्रसन्न रहो।' माद्री बोली--“मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें
vaiśampāyana uvāca |
ṛṣayastān samāśvāsya pāṇḍavān satyavikramān |
ūcuḥ kuntīṃ ca mādrīṃ ca samāśvāsya tapaspinaḥ ||
subhage bālaputre tu na martavyaṃ kathaṃcana |
pāṇḍavān api neṣyāmaḥ kururāṣṭraṃ paraṃtapān ||
adharmeṣv arthajāteṣu dhṛtarāṣṭro hi lobhavān |
sa kadācit na varteta pāṇḍaveṣu yathāvidhi ||
kuntīyā vṛṣṇayo nāthāḥ kuntibhojas tathaiva ca |
mādrīyā balināṃ śreṣṭhaḥ śalyo bhrātā mahārathaḥ ||
bhartṛā tu maraṇaṃ sārthaṃ phalavannātra saṃśayaḥ |
yuvābhyāṃ duṣkaraṃ caitad vadanti dvijapuṅgavāḥ ||
mṛte bhartari yā sādhvī brahmacaryavrate sthitā |
yamaiś ca niyamaiḥ śrāntā manovākkāyajaiḥ śubhaiḥ ||
vratopavāsaniyamaiḥ kṛcchraiś cāndrāyaṇādibhiḥ |
bhūśayyāṃ kṣāralavaṇavarjanaṃ caikabhojanam ||
yena kenāpi vidhinā dehaśoṣaṇatatparā |
dehapoṣaṇasaṃyuktā viṣayair hata-cetanā ||
dehavyayena narakaṃ mahad āpnoty asaṃśayam |
tasmāt saṃśoṣayed dehaṃ viṣayā nāśam āpnuyuḥ ||
bhartaraṃ cintayantī sā bhartare nistarec chubhā |
tāritaś cāpi bhartā syād ātmā putras tathaiva ca ||
tasmāj jīvitam evaitad yuvayor vidyate śobhanam ||
Vaiśampāyana said: The ascetic seers, having consoled the Pāṇḍavas of steadfast valor, also reassured Kuntī and Mādrī and spoke: “O fortunate ladies, your sons are still young; therefore you must not abandon your bodies in any way. We shall escort these Pāṇḍavas—scorchers of foes—to the Kuru realm. Dhṛtarāṣṭra is greedy for wealth gained through unrighteous means; thus he will never treat the Pāṇḍavas as is proper. “Kuntī has protectors in the Vṛṣṇis and in King Kuntibhoja; Mādrī has as her brother the mighty chariot-warrior Śalya, foremost among the strong. To die with one’s husband is indeed said to yield great fruit—there is no doubt of it—yet for you two this would be exceedingly hard, so declare the best of the twice-born. “When a virtuous woman’s husband has died, she remains firm in the vow of chastity, worn by yamas and niyamas and by auspicious disciplines of mind, speech, and body—by vows, fasts, and observances such as the kṛcchra and cāndrāyaṇa; sleeping on the ground, avoiding alkaline and salty foods, eating only once. In whatever manner, she strives to dry the body, so that sense-desires may be destroyed. “But a woman whose awareness is struck down by pleasures, intent only on nourishing the body, wastes this human frame and surely attains a great hell. Therefore one should discipline and ‘dry’ the body so that the objects of desire perish. “Thus, thinking constantly on her husband, the auspicious woman uplifts her husband; and she saves herself and her son as well. Therefore, for you both, continuing to live is what is truly fitting.”
वैशम्पायन उवाच
The seers argue that, though dying with one’s husband is praised as meritorious, Kuntī and Mādrī should preserve life for the sake of their young sons and the continuity of dharma. They emphasize disciplined widowhood—continence, austerity, and restraint of sense-desires—warning that indulgence and mere bodily nourishment leads to moral downfall and painful consequences.
After Pāṇḍu’s death, ascetic sages console Kuntī and Mādrī and advise them not to die. They promise to escort the Pāṇḍavas to the Kuru realm, caution that Dhṛtarāṣṭra will not treat them properly due to greed, and point to the women’s external supports (Vṛṣṇis, Kuntibhoja, and Śalya). They then outline an ideal of disciplined conduct for a virtuous widow and conclude that living on to protect and raise the children is the best course.