Ruru–Ḍuṇḍubha Saṃvāda: Śāpa, Mokṣa, and Ahiṃsā-Upadeśa
Chapter 11
तस्याहं तपसो वीर्य जानन्नासं तपोधन । भृशमुद्विग्नह्ददयस्तमवोचमहं तदा,तपोधन! मैं उसकी तपस्याका बल जानता था, अतः मेरा हृदय अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और बड़े वेगसे उसके चरणोंमें प्रणाम करके, हाथ जोड़, सामने खड़ा हो, उस तपोधनसे बोला--सखे! मैंने परिहासके लिये सहसा यह कार्य कर डाला है। ब्रह्मन! इसके लिये क्षमा करो और अपना यह शाप लौटा लो। मुझे अत्यन्त घबराया हुआ देखकर सम्भ्रममें पड़े हुए उस तपस्वीने बार-बार गरम साँस खींचते हुए कहा--“मेरी कही हुई यह बात किसी प्रकार झूठी नहीं हो सकती”
Ich kannte, o Schatz der Askese, die Kraft seiner Buße; darum geriet mein Herz in tiefe Unruhe, und da sprach ich zu ihm.
डुण्ड्रुभ उवाच