
Chapter Arc: वनवास की सीमा पर खड़े पाण्डव—अब ‘अज्ञातवास’ का कठिन व्रत सामने है। युधिष्ठिर तपस्वियों और आचार्य धौम्य से अनुमति माँगते हुए शोक से भर उठते हैं। → आश्रमवासी विद्वान तपस्वी, जो पाण्डवों के भक्त हैं, युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर उन्हें विदा देने को खड़े होते हैं। पाण्डव अपनी योजना रखते हैं—इस वर्ष छिपकर रहना है, क्योंकि सुयोधन, कर्ण और शकुनि जैसे दुष्टात्मा शत्रु अवसर खोज रहे हैं। युधिष्ठिर का मन कर्तव्य और भय के बीच डगमगाता है। → अज्ञातवास की अनुमति माँगते-माँगते युधिष्ठिर दुःख-शोक से विह्वल होकर मूर्छित हो जाते हैं—कण्ठ आँसुओं से भर जाता है और राजधर्म का धैर्य क्षणभर को टूटता दिखता है। → धौम्य युधिष्ठिर को समझाते हैं—आप विद्वान, दान्त, सत्यसंध, जितेन्द्रिय हैं; ऐसी आपदा में भी महापुरुष मोह नहीं करते। उदाहरण देकर वे बताते हैं कि इन्द्र ने भी शत्रुदमन हेतु निषध देश में गुप्तरूप से रहकर कार्य सिद्ध किया; अतः छिपकर रहना अधर्म नहीं, नीति है। फिर भीमसेन उत्साहवर्धन करते हैं, राजा के भीतर साहस जगाते हैं और अज्ञातवास के लिए मन स्थिर होता है। → पाण्डवों के अज्ञातवास-प्रवेश का निर्णय पक्का हो जाता है—अब प्रश्न केवल यह है कि वे कहाँ और किस रूप में छिपेंगे, और क्या शत्रु उनकी पहचान कर पाएँगे।
Verse 1
हि >> न (0) हि 7 आम पञ्चदशाधिकंत्रेशततमो< ध्याय: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना वैशम्पायन उवाच धर्मेण ते5भ्यनुज्ञाता: पाण्डवा: सत्यविक्रमा: । अज्ञातवासं वत्स्यन्त$छज्ना वर्ष त्रयोदशम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले--- / ५ 8 । (/) १ /€+। कर
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! ধর্মানুসারে অনুমতি পেয়ে সত্যপরাক্রমী পাণ্ডবেরা স্থির করলেন যে ত্রয়োদশ বর্ষে তাঁরা গোপনে অজ্ঞাতবাস করবেন। সেই উদ্দেশ্যে তাঁরা নিকটেই একত্রিত হয়ে পরামর্শের জন্য বসে পড়লেন।
Verse 2
उपोपविष्टा विद्वांस: सहिता: संशितव्रता: । ये तद्भक्ता वसन्ति सम वनवासे तपस्विन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! বিদ্বান পাণ্ডবেরা একত্রিত হয়ে, সুদৃঢ় ব্রতধারী হয়ে, নিকটেই বসে পড়লেন। বনবাসকালে স্নেহবশত যেসব তপস্বী ব্রাহ্মণ তাঁদের সঙ্গে বাস করতেন, তাঁরাও সেখানে উপস্থিত ছিলেন।
Verse 3
तानब्रुवन् महात्मान: स्थिता: प्राजजलयस्तदा । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সেই মহাত্মারা, ব্রতে অবিচল, করজোড়ে দাঁড়িয়ে যে গোপন নিবাস—অজ্ঞাতবাস—গ্রহণ করতে উদ্যত ছিলেন, তার অনুমতি প্রার্থনা করে বললেন।
Verse 4
विदितं भवतां सर्व धार्तराष्ट्रैयथा वयम् । छद्मना हृृतराज्याश्लानयाश्व बहुशः कृता:,“मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है
“মুনিশ্রেষ্ঠগণ! ধৃতরাষ্ট্রপুত্রেরা কীভাবে ছল করে আমাদের রাজ্য হরণ করেছে এবং বারংবার আমাদের উপর অন্যায়-অত্যাচার করেছে—সে সবই আপনাদের বিদিত।”
Verse 5
, ५ (१ ' १4. 8... -- उषिताश्च वने कृच्छे वयं द्वादश वत्सरान् । अज्ञातवाससमयं शेषं वर्ष त्रयोदशम्,“हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोतक रह लिये। अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है
“কষ্টসাধ্য অরণ্যে আমরা বারো বছর বাস করেছি। এখন অবশিষ্ট ত্রয়োদশ বছর আমাদের অজ্ঞাতবাসের কাল।”
Verse 6
तद् वसामो वयं छजन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ । सुयोधनश्व दुष्टात्मा कर्णश्न सहसौबल:,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
“অতএব এ বছরে আমরা গোপনে বাস করতে চাই; এ বিষয়ে আপনারা আমাদের অনুমতি দিন। দুষ্টাত্মা সুয়োধন (দুর্যোধন), কর্ণ এবং সৌবল (শকুনি) সহ আমাদের প্রতি প্রবল বৈরী।”
Verse 7
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिण: । युक्तचाराश्न युक्ताश्न पौरस्प स््वजनस्य च,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
“আমাদের অবস্থান জেনে ফেললে সেই চরম বৈরীরা আমাদের প্রতি নিষ্ঠুর আচরণ করবে; আর গুপ্তচর নিয়োগ করে নগরবাসী ও আমাদের স্বজনদেরও বিপদে ফেলতে পারে।”
Verse 8
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह | समस्ता: स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि,“क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे--अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे”
আমাদের কি আবার কখনও এমন সুযোগ আসবে—যে আমরা সকল ভাই ব্রাহ্মণদের সঙ্গে নিজ নিজ রাষ্ট্রে বাস করব এবং স্বরাজ্যে সুপ্রতিষ্ঠিত হব?
Verse 9
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा दुःखशोकार्त: शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूर्छितो5भवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दु:ख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে ধর্মপুত্র, পবিত্রচিত্ত রাজা যুধিষ্ঠির দুঃখ-শোকে আচ্ছন্ন হয়ে অচেতন হয়ে পড়লেন। অশ্রুতে তাঁর কণ্ঠ রুদ্ধ হলো; তিনি আর কথা বলতে পারলেন না।
Verse 10
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभि: सह | अथ धौम्योडब्रवीद् वाक्यं महार्थ नृपतिं तदा,उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा--
তখন তাঁর ভ্রাতৃগণসহ সকল ব্রাহ্মণ তাঁকে সান্ত্বনা দিলেন। এরপর মহর্ষি ধৌম্য নৃপতির উদ্দেশে গভীর অর্থবহ বাণী উচ্চারণ করলেন।
Verse 11
“राजन्! आप विद्वान, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप- जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं
রাজন! আপনি বিদ্বান, মনসংযমী, সত্যপ্রতিজ্ঞ ও জিতেন্দ্রিয়। আপনার মতো পুরুষ বিপদেও মোহগ্রস্ত হন না; ধৈর্য ও বিবেক হারান না।
Verse 12
देवैरप्यापद: प्राप्ता#छन्नैश्व बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थ महात्मभि:,“महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है
মহাত্মন! দেবতারাও বিপদে পড়েছেন; আর শত্রুদের দমনার্থে সেই মহাত্মারা বহুবার এখানে-সেখানে গোপনে অবস্থান করে দুর্দশা সহ্য করেছেন।
Verse 13
राजन विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रिय: । नैवंविधा: प्रमुहान्ते नरा: कस्याज्चिदापदि,इन्द्रेण निषधान प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, আপনি বিদ্বান, সংযত, সত্যসংকল্প এবং জিতেন্দ্রিয়। এমন মানুষ কোনো বিপদে বিভ্রান্ত হয় না। ইন্দ্রের নির্দেশে নিষধ দেশে পৌঁছে আপনি তখন গিরিপ্রস্থ আশ্রমে গোপনে অবস্থান করে শত্রুদের দমন করার সেই কর্ম সম্পন্ন করেছিলেন।
Verse 14
विष्णुनाश्वशिर: प्राप्प तथादित्यां निवत्स्यता | गर्भे वधार्थ दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम्,“भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—ভগবান বিষ্ণু দৈত্যদের বিনাশের উদ্দেশ্যে হয়গ্রীব রূপ ধারণ করে অদিতির মধ্যে প্রবেশ করেছিলেন এবং অজ্ঞাতভাবে তাঁর গর্ভে দীর্ঘকাল গোপনে অবস্থান করেছিলেন।
Verse 15
प्राप्प वामनरूपेण प्रच्छन्न॑ ब्रह्म॒रूपिणा । बलेयथा हूतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम्
বামনরূপ ধারণ করে, ব্রাহ্মণবেশে নিজের দিব্য স্বরূপ গোপন রেখে, তিনি যেভাবে তিন পদক্ষেপের বিক্রমে বলির রাজ্য হরণ করেছিলেন—তাও তুমি শুনেছ।
Verse 16
“उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ।। हुताशनेन यच्चाप: प्रविश्यच्छन्नमासता । विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्व श्रुतं त्वया,'अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो
আর তুমিই শুনেছ—হুতাশন অগ্নি জলে প্রবেশ করে সেখানে গোপনে অবস্থান করে দেবতাদের কার্য কীভাবে সম্পন্ন করেছিলেন।
Verse 17
प्रच्छन्न॑ चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्ज प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम्,“धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्॒में प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा
হে ধর্মজ্ঞ! শত্রুদের বিনাশের জন্য শ্রীহরি গোপনে শক্র (ইন্দ্র)-এর বজ্রে প্রবেশ করে যে কর্ম সম্পন্ন করেছিলেন—তাও তুমি শুনেছ।
Verse 18
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेडनघ श्रुतम्,“तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा
বৈশম্পায়ন বললেন— বৎস, নিষ্পাপ নৃপতি! ব্রহ্মর্ষি ঔর্ব উরুতে গোপনে বাস করে দেবতাদের জন্য যে কর্ম সম্পন্ন করেছিলেন, তা তুমি নিশ্চয়ই শুনেছ।
Verse 19
एवं विवस्वता तात छतन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धा: शात्रवा: सर्वे वसता भुवि सर्वश:,“तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है
বৈশম্পায়ন বললেন— বৎস! তেমনি অতুল তেজস্বী বিবস্বান্ সূর্যদেবও পৃথিবীতে গোপন রূপে বাস করে সর্বদিকে সকল শত্রুকে দগ্ধ করেছিলেন।
Verse 20
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्न॑ संयुगे भीमकर्मणा,“भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था
বৈশম্পায়ন বললেন— ভয়ংকর কর্মসাধক বিষ্ণুও দশরথের গৃহে (রামরূপে) গোপনে বাস করে যুদ্ধে দশগ্রীবকে বধ করেছিলেন।
Verse 21
एवमेव महात्मान: प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह अजयज्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि,“इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र-तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे”
বৈশম্পায়ন বললেন— এইভাবেই বহু মহাত্মা বীর নানাস্থানে গোপনে থেকে যুদ্ধে শত্রুদের পরাজিত করেছেন; তেমনি তুমিও বিজয়ী হবে।
Verse 22
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यै: सम्परितोषित: । शास्त्रबुद्धया स्वबुद्धया च न चचाल युधिछिर:,महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण (धर्मसे) विचलित नहीं हुए
এইভাবে মহর্ষি ধৌম্য যুক্তিসংগত বাক্যে ধর্মজ্ঞ যুধিষ্ঠিরকে সন্তুষ্ট করলেন; তখন শাস্ত্রসম্মত বিবেচনা ও নিজের স্থির বুদ্ধির বলে যুধিষ্ঠির ধর্ম থেকে বিচলিত হলেন না।
Verse 23
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबल: । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन्,तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा--
তদনন্তর বলবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, মহাবলী মহাবাহু ভীমসেন রাজা যুধিষ্ঠিরের হৃদয় আনন্দিত ও উৎসাহিত করতে মধুর বাক্যে বললেন।
Verse 24
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वचना । धर्मानुगतया बुद्धया न किज्चित् साहसं कृतम्,“महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया है
মহারাজ! আপনার আদেশের অপেক্ষায় এবং ধর্মানুগ বুদ্ধির কারণে গাণ্ডীবধন্বী অর্জুন এ পর্যন্ত কোনো বেপরোয়া সাহসিক কাজ করেনি।
Verse 25
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्न निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ,“भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ
ভয়ংকর পরাক্রমশালী নকুল ও সহদেব সেই শত্রুদের ধ্বংস করতে সক্ষম; কিন্তু আমি-ই সর্বদা তাদের সংযত করে রেখেছি।
Verse 26
न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् | भवान् विधत्तां तत् सर्व क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून्,“आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे”
আপনি যে কাজে আমাদের নিয়োজিত করবেন, তা সম্পন্ন না করে আমরা থামব না। অতএব আপনি যুদ্ধের সমস্ত ব্যবস্থা করুন; আমরা শীঘ্রই শত্রুদের উপর বিজয় লাভ করব।
Verse 27
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणा: परमाशिषा । उक्त्वा चापच्छय भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुग्गृहान्,भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये
ভীমসেনের এমন কথা শুনে ব্রাহ্মণরা পাণ্ডবদের সর্বোত্তম আশীর্বাদ দিলেন; তারপর সেই ভরতবংশীয় বীরদের নিকট থেকে বিদায় নিয়ে প্রত্যেকে নিজ নিজ গৃহে প্রস্থান করলেন।
Verse 28
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा । आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाड्क्षया,वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे
বৈশম্পায়ন বললেন— বেদের প্রধান প্রধান জ্ঞানী, যতি ও মুনিগণ পাণ্ডবদের পুনর্দর্শনের আকাঙ্ক্ষায় ধর্মানুসারে যথাক্রমে নিজ নিজ উপযুক্ত আসনে উপবিষ্ট হলেন।
Verse 29
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवा: । उत्थाय प्रययुर्वीरा: कृष्णामादाय धन्विन:,धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये वहाँसे उठकर चल दिये
বৈশম্পায়ন বললেন— তখন ধৌম্যসহ সেই জ্ঞানী ও বীর পাঁচ পাণ্ডব, ধনুক ধারণ করে, কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে সঙ্গে নিয়ে উঠে সেখান থেকে যাত্রা করলেন।
Verse 30
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्तत: । श्वोभूते मनुजव्याप्राश्छन्नवासार्थमुद्यता:,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
কোনো বিশেষ কারণে সেই স্থান থেকে এক ক্রোশ দূরে গিয়ে তারা থেমে গেল। পরদিন থেকে অজ্ঞাতবাস আরম্ভ করতে উদ্যত হয়ে, পরস্পর পরামর্শের জন্য তারা কাছাকাছি বসে পড়ল।
Verse 31
पृथक्छास्त्रविद: सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदा: । संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन्,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
তাঁরা সকলেই পৃথক পৃথক শাস্ত্রে পারদর্শী, সকলেই পরামর্শে নিপুণ, এবং সন্ধি-বিদ্বেষ (সন্ধি ও বিগ্রহ)-এর যথাযথ সময় জানতেন; তাই তারা মন্ত্রণা করতে একত্রে বসিলেন।
Verse 53
“देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया
বৈশম্পায়ন বললেন— শত্রুদমন করার জন্য দেবরাজ ইন্দ্র গোপন রূপ ধারণ করে নিষধ দেশে গিয়েছিলেন। গিরিপ্রস্থ আশ্রমে গোপনে অবস্থান করে তিনি নিজের উদ্দেশ্য সফল করেছিলেন।
Verse 314
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত আরণ্যেয়পর্বে নকুল প্রভৃতির পুনর্জীবনাদি বরলাভ-বিষয়ক তিনশো চৌদ্দতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 315
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पज्चदशाधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत--व्यासनिर्मित शतयाहसी संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে ব্যাসপ্রণীত শতমহাস্র সংহিতা শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত আরণ্যেয়পর্বে অজ্ঞাতবাসের জন্য পরামর্শ-বিষয়ক তিনশো পনেরোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।