
Chapter Arc: सरोवर के तट पर युधिष्ठिर एक अद्भुत तपस्वी को देखते हैं—वह एक पाँव पर स्थिर, अजेय-सा, मानो किसी लोक का रक्षक। राजा के मन में कौतूहल उठता है: यह यक्ष नहीं, फिर कौन? → युधिष्ठिर उस दिव्य पुरुष की पहचान टटोलते हैं—क्या वह वसु है, रुद्र है, मरुतों में श्रेष्ठ है, या स्वयं इन्द्र? प्रश्नों के साथ-साथ यह भी तनाव है कि यह साक्षात्कार केवल पहचान का नहीं, परीक्षा का भी हो सकता है; धर्म और व्यवहार की कसौटी सामने है। → तपस्वी स्वयं उद्घोष करता है—‘मैं धर्म हूँ; तुम्हारे आनृशंस्य (करुणा/धर्मशीलता) से प्रसन्न हूँ; वर माँगो।’ यह क्षण युधिष्ठिर के जीवन-धर्म का सार्वजनिक अनुमोदन बन जाता है, और धर्मदेव का प्रत्यक्ष प्राकट्य अध्याय का शिखर है। → युधिष्ठिर धर्मदेव को ‘सनातन देवाधिदेव’ जानकर वर स्वीकारते हैं। धर्मदेव वरदान देकर यह भी संकेत करते हैं कि युधिष्ठिर अपने ही रूप में पृथ्वी पर विचरेंगे, फिर भी तीनों लोकों में उनकी कीर्ति/पहचान सुरक्षित रहेगी। तत्पश्चात धर्मदेव अंतर्धान हो जाते हैं; पाण्डव विश्राम कर श्रमरहित होकर एकत्र होते हैं।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३४ श्लोक हैं।) #::73:.8 #::3.:7 (0) हि 7 - धर्मानुकूल प्राप्त भार्यासे धर्मका विरोध नहीं होता एवं वह पातित्रत्यधर्मका पालन करनेवाली हो
বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! তারপর যক্ষের বাক্যে পাণ্ডবেরা উঠে দাঁড়াল; আর মুহূর্তের মধ্যেই সকলের ক্ষুধা ও তৃষ্ণা দূর হয়ে গেল।
Verse 2
युधिछ्िर उवाच सरस्येकेन पादेन तिष्ठन्तमपराजितम् | पृच्छामि को भवान् देवो न मे यक्षो मतो भवान्
যুধিষ্ঠির বললেন—এই সরোবরে এক পায়ে দাঁড়িয়ে, অজেয় আপনি কে, দেবশ্রেষ্ঠ? আমি জিজ্ঞাসা করি—আপনি কে? আমার কাছে আপনি যক্ষ বলে মনে হয় না।
Verse 3
वसूनां वा भवानेको रुद्राणामथवा भवान् | अथवा मरुतां श्रेष्ठो वज्नी वा त्रिदशेश्वर:
আপনি কি বসুদের মধ্যে একজন, না রুদ্রদের মধ্যে? অথবা মরুতদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ? নাকি আপনি স্বয়ং বজ্রধারী, ত্রিদশদের অধীশ্বর ইন্দ্র?
Verse 4
मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतयोधिन: । त॑ योध॑ न प्रपश्यामि येन सर्वे निपातिता:,मेरे ये भाई तो लाखों वीरोंसे युद्ध करनेवाले हैं। ऐसा तो मैंने कोई योद्धा नहीं देखा, जिसने इन सभीको रणभूमिमें गिरा दिया हो
আমার এই ভ্রাতারা শত-সহস্র যোদ্ধার সঙ্গে যুদ্ধ করতে সক্ষম; তবু এমন কোনো এক যোদ্ধাকে আমি দেখি না, যার দ্বারা এরা সকলেই রণক্ষেত্রে একসঙ্গে নিপতিত হয়েছে।
Verse 5
सुखं प्रतिप्रबुद्धानामिन्द्रियाण्युपलक्षये । स भवान् सुहृदो5स्माकमथवा न: पिता भवान्
আমি লক্ষ করছি, এদের ইন্দ্রিয়সমূহ সুখনিদ্রা থেকে জাগ্রত মানুষের মতোই সুস্থ ও স্থির; অতএব আপনি আমাদের সুহৃদ—অথবা আমাদের পিতার তুল্য।
Verse 6
यक्ष उवाच अहं ते जनकस्तात धर्मो5मृदुपराक्रम । त्वां दिदृक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ
যক্ষ বলল—বৎস! হে ভরতশ্রেষ্ঠ, অদম্য পরাক্রমী যুধিষ্ঠির! আমি তোমার জনক—ধর্মই। তোমাকে দেখার আকাঙ্ক্ষায় আমি এখানে এসেছি; আমাকে চিনে নাও।
Verse 7
यश: सत्यं दम: शौचमार्जवं ह्वीरचापलम् | दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम,यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य--ये सब मेरे शरीर हैं
যশ, সত্য, দম, শৌচ, আর্জব, হ্রী, অচঞ্চলতা, দান, তপ এবং ব্রহ্মচর্য—এই সবই আমার অঙ্গপ্রত্যঙ্গ।
Verse 8
अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सर: । द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो हासि सदा मम,अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर--डाहका न होना--इन्हें मेरे पास पहुँचनेके द्वार समझो। तुम मुझे सदा प्रिय हो
যক্ষ বলল—অহিংসা, সমতা, শান্তি, দয়া এবং অমৎসর (ঈর্ষাহীনতা)—এগুলিকেই আমার কাছে পৌঁছবার দ্বার বলে জেনো। তুমি সর্বদাই আমার প্রিয়।
Verse 9
दिष्ट्या पञ्चसु रक्तो5सि दिष्ट्या ते घट्पदी जिता । द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके
যক্ষ বলল—সৌভাগ্যবশত তুমি পঞ্চ (অন্তর্দমন-সাধন) এর প্রতি অনুরক্ত; এবং সৌভাগ্যবশত তুমি ষট্পদী—ছয় প্রকার ক্লেশ—জয় করেছ। এদের মধ্যে দুইটি শুরু থেকেই থাকে, দুইটি মধ্যকালে ওঠে, আর দুইটি অন্তিমে, প্রস্থানকালে আসে।
Verse 10
धर्मोड्हमिति भद्र ते जिज्ञासुस्त्वामिहागत: । आनुृशंस्येन तुष्टोडस्मि वरं दास्यामि तेडनघ
যক্ষ বলল—তোমার মঙ্গল হোক। আমি ধর্ম; তোমার আচরণ যাচাই ও জানতে ইচ্ছা করেই এখানে এসেছি। নিষ্পাপ রাজা, তোমার দয়া ও সমদৃষ্টিতে আমি সন্তুষ্ট; তাই তোমাকে বর দিতে চাই।
Verse 11
वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता हास्मि तवानघ । ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गति:
যক্ষ বলল—হে রাজেন্দ্র, হে নিষ্পাপ, ইচ্ছামতো বর চাও; আমি তোমাকে দেব। যারা আমার ভক্ত, তাদের কখনও দুর্গতি হয় না।
Verse 12
युधिछिर उवाच अरणीसहितं यस्य मृगो हयादाय गच्छति । तस्याग्नयो न लुप्येरन् प्रथमो5स्तु वरो मम
যুধিষ্ঠির বলল—ভগবন, আমার প্রথম বর এই: যে ব্রাহ্মণের অরণীসহ মথন-কাষ্ঠ হরিণ নিয়ে পালিয়েছে, তার পবিত্র অগ্নিগুলি (অগ্নিহোত্র) যেন লুপ্ত না হয়; তার নিত্যকর্ম যেন ব্যাহত না হয়।
Verse 13
यक्ष उवाच अरणीसहितं हास्य ब्राह्मणस्य हृतं॑ मया । मृगवेषेण कौन्तेय जिज्ञासार्थ तव प्रभो
যক্ষ বলল—কৌন্তেয়! আমি সেই ব্রাহ্মণের অরণীসহ মথনকাষ্ঠ হরণ করেছি। প্রভু, হরিণবেশ ধারণ করে তোমার জ্ঞান পরীক্ষা করতেই আমি তা করেছি।
Verse 14
यक्षने कहा--कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थनकाष्ठको तो तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं ही मृगरूपसे लेकर भाग गया था ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন ভগবান ধর্ম উত্তর দিলেন—“দিচ্ছি।” এই বলে অরণী ও মথনকাষ্ঠ ফিরিয়ে দিলেন। অমরসম রাজন, তোমার মঙ্গল হোক; এখন অন্য এক বর প্রার্থনা করো।
Verse 15
युधिछिर उवाच वर्षाणि द्वादशारण्ये त्रयोदशमुपस्थितम् । तत्र नो नाभिजानीयुर्वसतो मनुजा: क्वचित्
যুধিষ্ঠির বললেন—আমরা বনে বারো বছর কাটিয়েছি; এখন ত্রয়োদশ বছর উপস্থিত। এমন বর দিন, যাতে এই সময়ে আমরা যেখানে থাকি, মানুষ কখনও আমাদের চিনতে না পারে।
Verse 16
वैशम्पायन उवाच ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत । भूयश्चाश्वासयामास कौन्तेयं सत्यविक्रमम्
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা শুনে ভগবান ধর্ম উত্তর দিলেন—“এ বরও দিচ্ছি।” তারপর তিনি সত্যবিক্রমী কৌন্তেয় যুধিষ্ঠিরকে আবার আশ্বস্ত করলেন।
Verse 17
यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् | नवो विज्ञास्यते वक्षित् त्रिषु लोकेषु भारत,“भरतनन्दन! यद्यपि तुम इस पृथ्वीपर इसी रूपसे विचरोगे, तो भी तीनों लोकोंमें कोई भी तुम्हें नहीं पहचान सकेगा
হে ভারতনন্দন! তুমি যদি নিজেরই রূপে এই পৃথিবীতে বিচরণ করো, তবু তিন লোকের মধ্যে কেউই তোমাকে চিনতে পারবে না—এমনই স্থির হয়েছে।
Verse 18
वर्ष त्रयोदशमिदं मत्प्रसादात् कुरूद्वहा: | विराटनगरे गूढा अविज्ञाताश्चरिष्यथ
বৈশম্পায়ন বললেন— “কুরুশ্রেষ্ঠগণ! আমার প্রসাদে তোমরা এই ত্রয়োদশ বর্ষ বিরাটনগরে গোপনে বাস করে, অচেনা অবস্থায়ই বিচরণ করবে।”
Verse 19
यद् वः संकल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् | तादृशं तादृशं सर्वे छन््दतो धारयिष्यथ,“तथा तुममेंसे जो-जो मनसे जैसा संकल्प करेगा, वह इच्छानुसार वैसा-वैसा ही रूप धारण कर सकेगा
বৈশম্পায়ন বললেন— “তোমাদের প্রত্যেকে মনে যে-যে রূপ কল্পনা করবে, ইচ্ছামতো ঠিক সেই-সেই রূপই ধারণ করতে পারবে।”
Verse 20
अरणीसत्ितं॑ चेदं ब्राह्मणाय प्रयच्छत । जिज्ञासार्थ मया होतदाह्ृतं मृगरूपिणा,“यह अरणीसहित मन्थनकाष्ठ उस ब्राह्मणको दे दो। तुम्हारी परीक्षाके लिये ही मैंने मृगका रूप धारण करके इसका हरण किया था
বৈশম্পায়ন বললেন— “অরণিসহ এই অগ্নিমন্থন-কাষ্ঠ সেই ব্রাহ্মণকে দিয়ে দাও। তোমাদের পরীক্ষা করতেই আমি হরিণরূপ ধারণ করে এটি নিয়ে গিয়েছিলাম।”
Verse 21
प्रवृणीष्वापरं सौम्य वरमिष्टं ददानि ते । न तृप्यामि नरश्रेष्ठ प्रयच्छन् वै वरांस्तथा
বৈশম্পায়ন বললেন— “সৌম্য! আরও একটি প্রিয় বর চেয়ে নাও, আমি তোমাকে দেব। নরশ্রেষ্ঠ! এভাবে বর দিতেও আমার তৃপ্তি হয় না।”
Verse 22
तृतीयं गृह्यृतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् । त्वं हि मत्प्रभवों राजन् विदुरश्चन ममांशज:
বৈশম্পায়ন বললেন— “পুত্র! তৃতীয় একটি মহান ও অতুল বরও গ্রহণ করো। রাজন! তুমি আমার থেকেই উৎপন্ন; আর বিদুরও আমারই অংশ থেকে জন্মেছে।”
Verse 23
युधिछिर उवाच देवदेवो मया दृष्टो भवान् साक्षात् सनातन: । य॑ं ददासि वर तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पित:
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতাজি! আপনি সনাতন দেবাধিদেব। আজ আমি আপনাকে প্রত্যক্ষ দর্শন করেছি। আপনি প্রসন্ন হয়ে যে বরই দিন, আমি তা গভীর শ্রদ্ধায় গ্রহণ করব।
Verse 24
जयेय॑ लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभो । दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत्,विभो! मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं लोभ, मोह और क्रोधको जीत सकूँ तथा दान, तप और सत्यमें सदा मेरा मन लगा रहे
হে প্রভু! এমন বর দিন যেন আমি সর্বদা লোভ, মোহ ও ক্রোধকে জয় করতে পারি, আর দান, তপস্যা ও সত্যে আমার মন সদা নিবিষ্ট থাকে।
Verse 25
धर्म उवाच उपपन्नो गुणैरेतै: स्वभावेनासि पाण्डव | भवान् धर्म: पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति
ধর্ম বললেন—হে পাণ্ডব, স্বভাবতই তুমি এই গুণসমূহে সমৃদ্ধ। তুমি তো ধর্মেরই মূর্ত রূপ; আর তুমি যেমন বলেছ, তেমনই এই ধর্মগুণ তোমার মধ্যে ভবিষ্যতেও স্থির থাকবে।
Verse 26
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वान्तर्दथे धर्मों भगवॉललोकभावन: । समेता: पाण्डवाश्वैव सुखसुप्ता मनस्विन:
বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা বলে ধর্ম, যিনি ভগবান ও লোকসমূহের পালনকর্তা, অদৃশ্য হয়ে গেলেন। আর মনস্বী পাণ্ডবরাও একত্র হয়ে শান্ত সুখে নিদ্রায় মগ্ন হলেন।
Verse 27
उपेत्य चाश्रमं वीरा: सर्व एव गतकक््लमा: । आरणेयं ददुस्तस्मै ब्राह्णाय तपस्विने
বৈশম্পায়ন বললেন—বীরেরা আশ্রমে পৌঁছে সকলেই ক্লান্তিমুক্ত হলেন। তারপর তপস্বী ব্রাহ্মণকে ধর্মানুযায়ী উপযুক্ত দান হিসেবে ‘আরণেয়’ প্রদান করলেন।
Verse 28
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! ऐसा कहकर लोकरक्षक भगवान् धर्म अन्तर्धान हो गये एवं सुखपूर्वक सोकर उठनेसे श्रमरहित हुए मनस्वी वीर पाण्डवगण एकत्र होकर आश्रममें लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने उस तपस्वी ब्राह्मणको उसकी अरणी एवं मन्थनकाष्ठ दे दिये ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! এ কথা বলে লোকরক্ষক ভগবান ধর্ম অন্তর্ধান করলেন। তারপর মহামনা পাণ্ডবেরা আরামে নিদ্রা করে উঠে ক্লান্তিহীন হয়ে একত্রিত হলেন এবং আশ্রমে ফিরে এলেন। সেখানে এসে তাঁরা সেই তপস্বী ব্রাহ্মণকে তাঁর অরণি ও মথনকাষ্ঠ ফিরিয়ে দিলেন। এই মহান ও মঙ্গলময় পুনর্মিলন-উপাখ্যান পিতা ধর্ম ও পুত্র যুধিষ্ঠির—উভয়েরই কীর্তি বৃদ্ধি করে। যে ব্যক্তি এই কাহিনি পাঠ করে, সে ইন্দ্রিয়জয়ী, সংযমী হয়; পুত্র-পৌত্রে সমৃদ্ধ হয়ে শতবর্ষ আয়ু লাভ করে।
Verse 29
न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने परस्वहारे परदारमर्शने । कदर्यभावे न रमेन्मन: सदा नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम्
যাঁরা এই সদামঙ্গল উপাখ্যানকে যথার্থভাবে বোঝেন ও স্মরণে রাখেন, তাঁদের মন কখনও অধর্মে, সুহৃদদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টিতে, পরের ধন হরণে, পরস্ত্রীগমনে কিংবা কৃপণতার নীচতায় রমণ করে না। এই মনোহর কাহিনি নিত্য স্মরণ করলে হৃদয় এমন দুষ্কর্মের দিকে ফেরে না।
Verse 314
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिजीवनादिवरप्राप्तौ चतुर्दशाधिकत्रिशततमो<5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের আরণ্যেয়পর্বে, নকুল প্রভৃতির জীবন-প্রাপ্তি ইত্যাদি বরলাভ-প্রসঙ্গবিষয়ক তিনশো চৌদ্দতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।