
Draupadī’s Rebuke of Jayadratha and Dhaumya’s Admonition (Āraṇyaka-parva, Adhyāya 252)
Upa-parva: Jayadratha–Draupadī Episode (Abduction Attempt) — Āraṇyaka-parva
Vaiśaṃpāyana narrates a charged exchange in which Draupadī addresses Jayadratha with angered clarity, censuring his disparagement of renowned warriors and warning him through a chain of analogies: attempting to challenge the Pāṇḍavas is likened to provoking formidable beasts or handling venomous serpents, underscoring disproportionate risk and moral impropriety. Jayadratha replies by asserting his own aristocratic standing and dismissing verbal threats, pressing for immediate compliance. Draupadī refuses any posture of supplication, grounding her confidence in the protective agency of the Pāṇḍavas and their allies, and projects the psychological outcome Jayadratha would face upon encountering their martial response. The narration then shifts from speech to action: Draupadī resists being touched, calls out to Dhaumya, and Jayadratha seizes her garment. A brief reversal is described—Jayadratha falls when she counters—yet she is then forcibly taken toward a chariot, after saluting Dhaumya’s feet. Dhaumya publicly warns Jayadratha that removal without defeating the great warriors violates ancient kṣatra norms and will yield harmful consequences. The chapter ends with Dhaumya following on foot amid attendants as Draupadī is carried away, marking the episode’s transition from ethical discourse to imminent accountability.
Chapter Arc: अपमान और विफलता से जला दुर्योधन प्राणत्याग (प्रायोपवेशन) का निश्चय कर बैठता है; कर्ण की ‘उचित’ सलाह भी उसे लौटा नहीं पाती। → शकुनि दुर्योधन को समझाता है कि कर्ण की बात सही है और जो समृद्धि/श्री उसे मिली है उसे मोहवश त्यागना अज्ञान है; वह दुर्योधन की ‘अल्पबुद्धि’ पर चोट करता है और बताता है कि उसने वृद्धों/हितैषियों की सेवा नहीं की, इसलिए विवेक नहीं आया। → शकुनि के वचनों के बाद दुर्योधन दःशासन की ओर देखता है; दःशासन भाईचारे की विकृत अवस्था में, वीर होकर भी पाँवों पर गिरकर उसे रोकने का प्रयत्न करता है—भ्रातृस्नेह बनाम हठ का तीखा टकराव। → दुर्योधन सुहृदों/गुरुओं को नगर लौट जाने का आदेश देता है—वह धर्म, अर्थ, सुख, ऐश्वर्य, राज्य और भोग की बातों को तिरस्कार कर अपने निश्चय पर अड़ा रहता है; समझाइश असफल रहती है। → पातालवासी रौद्र दैत्य-दानव दुर्योधन के निश्चय को जानकर अथर्ववेद/उपनिषद्-प्रोक्त मंत्र-जप सहित क्रियाएँ आरम्भ करते हैं—अदृश्य शक्तियाँ इस हठ को किस दिशा में मोड़ेंगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल १३ ६ “लोक हैं) हू... “+/ (9) #:६.+ #25-२ एकपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना वैशम्पायन उवाच प्रायोपविष्टं राजानं॑ दुर्योधनममर्षणम् । उवाच सान्त्वयन् राजज्छकुनि: सौबलस्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर अमर्षमें भरकर आमरण उपवासके लिये बैठे हुए राजा दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए सुबलपुत्र शकुनिने कहा
বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! তারপর ক্রোধে দগ্ধ, আমরণ অনশনে বসা রাজা দুর্যোধনকে সান্ত্বনা দিতে দিতে সুবলপুত্র শকুনি তখন বলল।
Verse 2
शकुनिरुवाच सम्यगुक्तं हि कर्णेन तच्छुतं कौरव त्वया । मया हूतां श्रियं स्फीतां तां मोहादपहाय किम्,शकुनि बोला--कुरुनन्दन! कर्णने बहुत अच्छी बात कही है, जो तुमने सुनी ही है। मैंने पाण्डवोंसे तुम्हारे लिये जिस समृद्धशालिनी राज-लक्ष्मीका अपहरण किया है, तुम उसे मोहवश क्यों त्याग रहे हो?
শকুনি বলল—হে কৌরব! কর্ণ যা বলেছে তা যথার্থই উত্তম, আর তুমি তা শুনেছ। আমি পাণ্ডবদের কাছ থেকে তোমার জন্য যে সমৃদ্ধ রাজলক্ষ্মী হরণ করে এনেছি, তুমি মোহবশে তা কেন ত্যাগ করছ?
Verse 3
त्वमल्पबुद्धया नृपते प्राणानुत्स्रष्टमर्हसि । अथवाप्यवगच्छामि न वृद्धा: सेवितास्त्वया,नरेश्वर! तुम अपनी अल्पबुद्धिके कारण ही आज प्राणत्याग करनेको उतारू हो गये हो; अथवा मैं समझता हूँ कि तुमने कभी वृद्धपुरुषोंका सेवन नहीं किया है
বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরেশ্বর! অল্পবুদ্ধির বশেই তুমি আজ প্রাণ ত্যাগ করতে উদ্যত হয়েছ; অথবা আমি বুঝি, তুমি কখনও বৃদ্ধজনের সঙ্গ ও উপদেশ গ্রহণ করোনি।
Verse 4
यः समुत्पतितं हर्ष दैन्यं वा न नियच्छति । स नश्यति श्रियं प्राप्य पात्रमाममिवाम्भसि,जो मनुष्य सहसा उत्पन्न हुए हर्ष अथवा शोकपर नियन्त्रण नहीं रखता, वह राजलक्ष्मीको पाकर भी उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे मिट्टीका कच्चा बर्तन पानीमें गल जाता है
যে মানুষ হঠাৎ জাগা হর্ষ বা দীনতা (শোক) সংযত করতে পারে না, সে ঐশ্বর্য লাভ করেও নষ্ট হয়—যেমন কাঁচা মাটির পাত্র জলেতে পড়লে গলে যায়।
Verse 5
अतिभीरुमतिकक्लीबं दीर्घसूत्रं प्रमादिनम् । व्यसनाद् विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजा:,जो राजा अत्यन्त डरपोक, बहुत कायर, दीर्घसूत्री (आलसी), प्रमादी और दुर्व्यसनवश विषयोंमें फँसा होता है, उसे प्रजा अपना स्वामी नहीं स्वीकार करती है
যে রাজা অতিভীতচিত্ত, কাপুরুষ, দীর্ঘসূত্রী (টালবাহানা-প্রবণ), অসতর্ক এবং কু-আসক্তির বশে বিষয়ভোগে আচ্ছন্ন—প্রজারা তাকে অধিপতি বলে মানে না।
Verse 6
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत् | मा कृतं शोभनं पार्थ: शोकमालमब्य नाशय,पाण्डवोंने तुम्हारा सत्कार किया है तो तुम्हें शोक हो रहा है। इसके विपरीत यदि उन्होंने तिरस्कार किया होता तो न जाने तुम्हारी कैसी दशा हो जाती? कुन्तीकुमारोंने जो सद्व्यवहार किया है, उसे तुम शोकका आश्रय लेकर नष्ट न कर दो
তোমাকে তো সম্মান করা হয়েছে; তবে তোমার শোক কীভাবে যুক্তিসঙ্গত? উল্টোটা যদি ঘটত—অবমাননা যদি পেতে—তবে তোমার অবস্থা কী হতো? কুন্তীপুত্র পার্থ যে শোভন আচরণ করেছে, শোককে আশ্রয় করে তা নষ্ট কোরো না।
Verse 7
यत्र हर्षस्त्वया कार्य: सत्कर्तव्याश्व पाण्डवा: । तत्र शोचसि राजेन्द्र विपरीतमिदं तव,राजेन्द्र! जहाँ तुम्हें हर्ष मनाना और पाण्डवोंका सत्कार करना चाहिये था वहाँ तुम शोक कर रहे हो। तुम्हारा यह व्यवहार तो उलटा ही है
রাজেন্দ্র! যেখানে তোমার আনন্দ করা এবং পাণ্ডবদের সম্মান করা উচিত ছিল, সেখানে তুমি শোক করছ; তোমার এই আচরণ সম্পূর্ণ উল্টো।
Verse 8
प्रसीद मा त्यजात्मान तुष्टश्न सुकृतं समर । प्रयच्छ राज्यं पार्थानां यशो धर्ममवाप्रुहि,अतः मनमें प्रसन्नता लाओ। शरीरका त्याग न करो। पाण्डवोंने तुम्हारे साथ जो सद्व्यवहार किया है उसे स्मरण करो और संतुष्ट होकर उनका राज्य उन्हें लौटा दो। ऐसा करके यश और धर्मके भागी बनो
অতএব প্রসন্ন হও; নিজেকে ত্যাগ কোরো না (প্রাণত্যাগ কোরো না)। তাদের উপকার ও সদাচরণ স্মরণ করে সন্তুষ্ট হও, এবং পাণ্ডবদের রাজ্য তাদেরই ফিরিয়ে দাও। এভাবে যশ ও ধর্ম—উভয়ই লাভ করবে।
Verse 9
क्रियामेतां समाज्ञाय कृतज्ञस्त्वं भविष्यसि । सौक्षात्रं पाण्डवैः कृत्वा समवस्थाप्य चैव तान्
এই কার্যপন্থা সম্যক্ জেনে তুমি সত্যই কৃতজ্ঞ হবে। পাণ্ডবদের সঙ্গে সূত-সম্পর্কিত ক্রিয়া (সৌক্ষাত্র) সম্পন্ন করে এবং তাদের যথাযথভাবে স্থাপন করে, তদনুসারে অগ্রসর হও।
Verse 10
वैशम्पायन उवाच शकुनेस्तु वच: श्रुत्वा दःशासनमवेक्ष्य च
বৈশম্পায়ন বললেন: শকুনির কথা শুনে, তারপর দুঃশাসনের দিকে দৃষ্টি নিক্ষেপ করে (সে অগ্রসর হল)।
Verse 11
पादयो: पतितं वीरं विकृतं भ्रातृसौहदम् । बाहुभ्यां साधुजाताभ्यां दुःशासनमरिंदमम्
ভ্রাতৃস্নেহ বিকৃত হয়ে গিয়েছিল; সেই বীর পায়ে লুটিয়ে পড়ে, সুজাত বাহু দিয়ে শত্রুদমন দুঃশাসনকে ধরে ফেলল।
Verse 12
उत्थाप्य सम्परिष्वज्य प्रीत्याजिप्रत मूर्थनि । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! शकुनिका यह वचन सुनकर दुर्योधनने अपने चरणोंमें पड़े हुए म्लान मुखवाले भ्रातृभक्त शत्रुदमन वीर दुःशासनकी ओर देखकर अपनी सुन्दर बाँहोंद्वारा उसे उठाया और प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघा ।। १०-११ ई | कर्णसौबलयोश्वापि संश्रुत्य वचनान्यसौ,कर्ण और शकुनिकी भी बातें सुनकर राजा दुर्योधन अत्यन्त उदास हो गया, तथा मन- ही-मन लज्जासे अभिभूत हो उसने बड़ी निराशाका अनुभव किया
তাকে তুলে ধরে, স্নেহে আলিঙ্গন করে, প্রীতিতে তার মস্তক শুঁকে (দুর্যোধন স্নেহ প্রকাশ করল)। পরে কর্ণ ও সৌবল (শকুনি)-এর কথাও শুনে সে (দুর্যোধন) অত্যন্ত বিষণ্ণ হয়ে পড়ল।
Verse 13
निर्वेदं परमं गत्वा राजा दुर्योधनस्तदा । ब्रीडयाभिपरीतात्मा नैराश्यमगमत् परम्,कर्ण और शकुनिकी भी बातें सुनकर राजा दुर्योधन अत्यन्त उदास हो गया, तथा मन- ही-मन लज्जासे अभिभूत हो उसने बड़ी निराशाका अनुभव किया
তখন রাজা দুর্যোধন চরম নির্বেদে পতিত হয়ে, লজ্জায় অন্তরে আচ্ছন্ন হয়ে, পরম নিরাশায় ডুবে গেল।
Verse 14
तच्छुत्वा सुहृदश्चैव समन्युरिदमब्रवीत् | न धर्मधनसौख्येन नैश्वर्येण न चाज्ञया,गच्छध्वं नगरं सर्वे पूज्याश्व गुरवो मम । सब सुहृदोंके वचन सुनकर दुर्योधनने उनसे कुपित हो इस प्रकार कहा--'मुझे धर्म, धन, सुख, ऐश्वर्य, शासन और भोग किसीकी भी आवश्यकता नहीं है। तुमलोग मेरे निश्चयमें बाधा न डालो। यहाँसे चले जाओ। आमरण अनशन करनेके सम्बन्धमें मेरी बुद्धिका निश्चय अटल है। तुम सब लोग नगरको जाओ और वहाँ मेरे गुरुजनोंका सदा आदर-सत्कार करो'
সুহৃদদের কথা শুনে ক্রুদ্ধ হয়ে দুর্যোধন বলল— “আমার ধর্মের প্রয়োজন নেই, ধন-সুখেরও নয়; ঐশ্বর্য বা শাসন-আজ্ঞারও নয়। আমার সংকল্পে বাধা দিও না। তোমরা সবাই নগরে ফিরে যাও এবং সেখানে আমার পূজ্য গুরুজন ও বৃদ্ধদের সর্বদা সম্মান-সেবা করো।”
Verse 15
नैव भोगैश्षल मे कार्य मा विहन्यत गच्छत । निश्चितेयं मम मति: स्थिता प्रायोपवेशने
“ভোগে আমার কোনো প্রয়োজন নেই; আমাকে বাধা দিও না—তোমরা চলে যাও। আমার মতি স্থির ও অচল; আমি প্রায়োপবেশনে—মৃত্যুপর্যন্ত উপবাসের ব্রতে—অটল।”
Verse 16
त एवमुक्ता: प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम्,ऐसा उत्तर पाकर सब सुहदोंने शत्रुदमन राजा दुर्योधनसे कहा--'राजेन्द्र! तुम्हारी जो गति होगी वही हमारी भी होगी। भारत! हम तुम्हारे बिना हस्तिनापुरमें कैसे प्रवेश करेंगे?”
এভাবে বলা হলে সেই সুহৃদরা শত্রুদমন রাজাকে উত্তর দিল— “রাজেন্দ্র! তোমার যে গতি, আমাদেরও সেই গতি। হে ভরতবংশীয়! তোমাকে ছাড়া আমরা কীভাবে হস্তিনাপুরে প্রবেশ করব?”
Verse 17
या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत । कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीना: पुरं वयम्,ऐसा उत्तर पाकर सब सुहदोंने शत्रुदमन राजा दुर्योधनसे कहा--'राजेन्द्र! तुम्हारी जो गति होगी वही हमारी भी होगी। भारत! हम तुम्हारे बिना हस्तिनापुरमें कैसे प्रवेश करेंगे?”
“রাজেন্দ্র! তোমার যে গতি, আমাদেরও সেই গতি। হে ভরতবংশীয়! তোমাকে ছাড়া আমরা নগরে কীভাবে প্রবেশ করব?”
Verse 18
वैशम्पायन उवाच स सुहृद्भिरमात्यैश्न भ्रातृभि: स्वजनेन च । बहुप्रकारमप्युक्तो निश्चयाज्न विचाल्यते,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधनको उसके सुहृद मन्त्री, भाई तथा स्वजनोंने बहुतेरा समझाया, परंतु कोई भी उसे अपने निश्चयसे विचलित न कर सका
বৈশম্পায়ন বললেন— সুহৃদ, মন্ত্রী, ভ্রাতা ও স্বজনেরা নানা প্রকারে তাকে বোঝাল; তবু সে নিজের স্থির সংকল্প থেকে এক বিন্দুও টলল না।
Verse 19
संस्पृश्याप: शुचिर्भूत्वा भूतले समुपस्थित:
জল স্পর্শ করে শুচি হয়ে তিনি ভূমিতে উপস্থিত হলেন—যেন সংযমিত আচরণে প্রত্যাবর্তন করে পরবর্তী কর্মের জন্য প্রস্তুত হলেন।
Verse 20
कुशचीराम्बरधर: परं नियममास्थित: । वाग्यतो राजशार्दूल: स स्वर्गगतिकाम्यया
বৈশম্পায়ন বললেন—কুশ ও বল্কলের বস্ত্র পরিধান করে সেই রাজশার্দূল পরম নিয়ম-তপস্যায় প্রবৃত্ত হলেন। বাক্সংযমী হয়ে স্বর্গগতি লাভের কামনায় তিনি সেই ব্রত পালন করলেন।
Verse 21
मनसोपचितिं कृत्वा निरस्य च बहिःक्रिया: । धृतराष्ट्रपुत्र नृपश्रेष्ठ दुर्योधन अपने निश्चयपर अटल रहकर आचमन करके पवित्र हो पृथ्वीपप कुशका आसन बिछा कुश और वल्कलके वस्त्र धारण करके बैठा और स्वर्गप्राप्तिकी इच्छासे वाणीका संयम करके उपवासके उत्तम नियमोंका पालन करने लगा। उस समय उसने मनके द्वारा मरनेका ही निश्चय करके स्नान-भोजन आदि बाहा क्रियाओंको सर्वथा त्याग दिया था ।। १९-२० ई || अथ तं निश्चयं तस्य बुद्ध्वा दैतेयदानवा:,दुर्योधनके इस निश्चयकों जानकर पातालवासी भयंकर दैत्यों और दानवोंने, जो पूर्वकालमें देवताओंसे पराजित हो चुके थे, मन-ही-मन विचार किया कि इस प्रकार दुर्योधनका प्राणान्त होनेसे तो हमारा पक्ष ही नष्ट हो जायगा; अतः उसे अपने पास बुलानेके लिये मन्त्रविद्यामें निपुण दैत्योंने उस समय बृहस्पति और शुक्राचार्यके द्वारा वर्णित तथा अथर्ववेदमें प्रतिपादित मन्त्रोंद्वारा अग्निविस्तार-साध्य यज्ञकर्मका अनुष्ठान आरम्भ किया और उपनिषद् (आरण्यक)-में जो मन्त्रजपसे युक्त हवनादि क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उनका भी सम्पादन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—মনকে অন্তর্মুখী সংযমে একত্র করে এবং বাহ্য ক্রিয়াকলাপ পরিত্যাগ করে, ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন নিজের সংকল্পে অটল রইলেন। আচমন করে শুচি হয়ে তিনি ভূমিতে কুশাসন পাতলেন, কুশ ও বল্কলের বস্ত্র পরিধান করে বসে পড়লেন। স্বর্গলাভের কামনায় বাক্সংযম করে তিনি উপবাসের উৎকৃষ্ট নিয়ম পালন করতে লাগলেন। সেই সময় মনে মনে মৃত্যুকেই স্থির করে স্নান-ভোজন প্রভৃতি বাহ্য আচরণ সম্পূর্ণ ত্যাগ করেছিলেন। পতালবাসী ভয়ংকর দৈত্য ও দানবেরা—যারা পূর্বকালে দেবতাদের কাছে পরাজিত হয়েছিল—যখন তাঁর এই সংকল্প জানতে পারল, তখন তারা মনে মনে ভাবল—“এভাবে যদি দুর্যোধনের প্রাণান্ত হয়, তবে আমাদের পক্ষই বিনষ্ট হবে।” অতএব তাঁকে নিজেদের কাছে আহ্বান করতে মন্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী সেই অসুরেরা বৃহস্পতি ও শুক্রাচার্য কর্তৃক বর্ণিত এবং অথর্ববেদে প্রতিপাদিত মন্ত্রে অগ্নিবিস্তারের দ্বারা সাধ্য যজ্ঞকর্ম আরম্ভ করল; এবং উপনিষদ/আরণ্যকে নির্দেশিত মন্ত্রজপযুক্ত হোম-হবনাদি ক্রিয়াও সম্পাদন করল।
Verse 22
पातालवासिनो रौद्रा: पूर्व देवैविनिर्जिता: । ते स्वपक्षक्षयं त॑ तु ज्ञात्वा दुर्योधनस्य वै,दुर्योधनके इस निश्चयकों जानकर पातालवासी भयंकर दैत्यों और दानवोंने, जो पूर्वकालमें देवताओंसे पराजित हो चुके थे, मन-ही-मन विचार किया कि इस प्रकार दुर्योधनका प्राणान्त होनेसे तो हमारा पक्ष ही नष्ट हो जायगा; अतः उसे अपने पास बुलानेके लिये मन्त्रविद्यामें निपुण दैत्योंने उस समय बृहस्पति और शुक्राचार्यके द्वारा वर्णित तथा अथर्ववेदमें प्रतिपादित मन्त्रोंद्वारा अग्निविस्तार-साध्य यज्ञकर्मका अनुष्ठान आरम्भ किया और उपनिषद् (आरण्यक)-में जो मन्त्रजपसे युक्त हवनादि क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उनका भी सम्पादन किया
পতালবাসী সেই রৌদ্র দৈত্য-দানবেরা, যারা পূর্বে দেবতাদের দ্বারা পরাজিত হয়েছিল, দুর্যোধনের এই সংকল্পে নিজেদের পক্ষের ক্ষয় বুঝতে পারল।
Verse 23
आह्वानाय तदा चक्कु: कर्म वैतानसम्भवम् । बृहस्पत्युशनोक्तैश्न मन्त्रैर्मन्त्रविशारदा:,दुर्योधनके इस निश्चयकों जानकर पातालवासी भयंकर दैत्यों और दानवोंने, जो पूर्वकालमें देवताओंसे पराजित हो चुके थे, मन-ही-मन विचार किया कि इस प्रकार दुर्योधनका प्राणान्त होनेसे तो हमारा पक्ष ही नष्ट हो जायगा; अतः उसे अपने पास बुलानेके लिये मन्त्रविद्यामें निपुण दैत्योंने उस समय बृहस्पति और शुक्राचार्यके द्वारा वर्णित तथा अथर्ववेदमें प्रतिपादित मन्त्रोंद्वारा अग्निविस्तार-साध्य यज्ञकर्मका अनुष्ठान आरम्भ किया और उपनिषद् (आरण्यक)-में जो मन्त्रजपसे युक्त हवनादि क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उनका भी सम्पादन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন তাঁকে আহ্বান করতে, মন্ত্রে পারদর্শী তারা বৃহস্পতি ও উশনস্ (শুক্রাচার্য) কর্তৃক উক্ত মন্ত্রে বৈতান কর্মের অনুষ্ঠান করল।
Verse 24
अथर्ववेदप्रोक्तैश्न याश्नोपनिषदि क्रिया: । मन्त्रजप्यसमायुक्तास्तास्तदा समवर्तयन्,दुर्योधनके इस निश्चयकों जानकर पातालवासी भयंकर दैत्यों और दानवोंने, जो पूर्वकालमें देवताओंसे पराजित हो चुके थे, मन-ही-मन विचार किया कि इस प्रकार दुर्योधनका प्राणान्त होनेसे तो हमारा पक्ष ही नष्ट हो जायगा; अतः उसे अपने पास बुलानेके लिये मन्त्रविद्यामें निपुण दैत्योंने उस समय बृहस्पति और शुक्राचार्यके द्वारा वर्णित तथा अथर्ववेदमें प्रतिपादित मन्त्रोंद्वारा अग्निविस्तार-साध्य यज्ञकर्मका अनुष्ठान आरम्भ किया और उपनिषद् (आरण्यक)-में जो मन्त्रजपसे युक्त हवनादि क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उनका भी सम्पादन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—দুর্যোধনের এই সংকল্প জানতে পেয়ে পাতালবাসী ভয়ংকর দৈত্য-দানবেরা—যারা প্রাচীনকালে দেবতাদের কাছে পরাজিত হয়েছিল—মনে মনে ভাবল: “দুর্যোধনের প্রাণান্ত হলে আমাদের পক্ষও বিনষ্ট হবে।” অতএব তাকে নিজেদের কাছে আহ্বান করতে মন্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী তারা বৃহস্পতি ও শুক্রাচার্যের বর্ণিত এবং অথর্ববেদে প্রতিপাদিত মন্ত্রে অগ্নিবিস্তার-সাধ্য যজ্ঞকর্ম আরম্ভ করল; আর উপনিষদ (আরণ্যক) প্রথায় নির্দেশিত মন্ত্রজপসহ হোম-আহুতি প্রভৃতি ক্রিয়াও সম্পন্ন করল।
Verse 25
जुद्वत्यग्नौ हवि: क्षीरं मन्त्रवत् सुसमाहिता: । ब्राह्मणा वेदवेदाड़पारगा: सुदृढव्रता:,तब दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें घृत और खीरकी आहुति देने लगे
তখন দৃঢ়ব্রত পালনকারী, বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী ব্রাহ্মণেরা একাগ্রচিত্তে মন্ত্রোচ্চারণসহ প্রজ্বলিত অগ্নিতে ঘৃত ও ক্ষীরান্নের আহুতি দিতে লাগল।
Verse 26
कर्मसिद्धौ तदा तत्र जूम्भमाणा महाद्धुता । कृत्या समुत्थिता राजन् कि करोमीति चाब्रवीत्,राजन! कर्मकी सिद्धि होनेपर वहाँ यज्ञकुण्डसे उस समय एक अत्यन्त अदभुत कृत्या जँभाई लेती हुई प्रकट हुई और बोली--“मैं क्या करूँ?”
রাজন! কর্মসিদ্ধি হলে তখন সেখানে যজ্ঞকুণ্ড থেকে এক অতিশয় আশ্চর্য কৃত্যা হাই তুলতে তুলতে উঠে এল এবং রাজার উদ্দেশে বলল—“আমি কী করব?”
Verse 27
आहहुर्देत्याश्ष तां तत्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । प्रायोपविष्टं राजानं धार्तराष्ट्रमिहानय,तब दैत्योंने प्रसन्नचित्त होकर उससे कहा--'तू प्रायोपवेशन करते हुए धुृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको यहाँ ले आ'
তখন দৈত্য-দানবেরা অন্তরে সন্তুষ্ট হয়ে তাকে বলল—“প্রায়োপবেশনে বসা ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধনকে এখানে নিয়ে আ।”
Verse 28
तथेति च प्रतिश्रुत्य सा कृत्या प्रययौ तदा । निमेषादगमच्चापि यत्र राजा सुयोधन:,“जो आज्ञा" कहकर वह कृत्या तत्काल वहाँसे प्रस्थित हुई और पलक मारते-मारते जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ पहुँच गयी
“তথাস্তু” বলে সম্মতি জানিয়ে সেই কৃত্যা তখনই রওনা দিল; নিমেষমাত্রে যেখানে রাজা সুয়োধন (দুর্যোধন) ছিলেন, সেখানে পৌঁছে গেল।
Verse 29
समादाय च राजानं प्रविवेश रसातलम् । दानवानां मुहूर्ताच्च तमानीत॑ न््यवेदयत् । तमानीत॑ नृपं दृष्टवा रात्रौ संगत्य दानवा:,फिर राजाको साथ ले दो ही घड़ीमें रसातल आ पहुँची; और दानवोंको उसके लाये जानेकी सूचना दे दी। राजा दुर्योधनको लाया गया देख सब दानव रातमें एकत्र हुए। उनके मनमें प्रसन्नता भरी थी और नेत्र हर्षातिरिकसे कुछ खिल उठे थे। उन्होंने दुर्योधनसे अभिमानपूर्वक यह बात कही
বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি রাজাকে সঙ্গে নিয়ে রসাতলে প্রবেশ করলেন। অল্পক্ষণের মধ্যেই দানবদের জানালেন যে রাজাকে আনা হয়েছে। রাজা দুর্যোধনকে উপস্থিত দেখে দানবেরা রাত্রিতে একত্র হল; তাদের মন আনন্দে উচ্ছ্বসিত, চোখ হর্ষে উজ্জ্বল। তারপর তারা গর্বভরে, আত্মবিশ্বাসী বাক্যে দুর্যোধনকে সম্বোধন করতে উদ্যত হল।
Verse 30
प्रहृष्मनस: सर्वे किंचिदुत्फुल्ललोचना: । साभिमानमिदं वाक्यं दुर्योधनमथाब्रुवन्,फिर राजाको साथ ले दो ही घड़ीमें रसातल आ पहुँची; और दानवोंको उसके लाये जानेकी सूचना दे दी। राजा दुर्योधनको लाया गया देख सब दानव रातमें एकत्र हुए। उनके मनमें प्रसन्नता भरी थी और नेत्र हर्षातिरिकसे कुछ खिल उठे थे। उन्होंने दुर्योधनसे अभिमानपूर्वक यह बात कही
তাঁরা সকলেই প্রফুল্লচিত্ত, আর আনন্দে তাদের চোখ সামান্য প্রসারিত। তখন তারা গর্বভরে দুর্যোধনকে এই কথা বলল।
Verse 96
पित्र्यं राज्यं प्रयच्छैषां तत: सुखमवाप्स्यसि । मेरे इस प्रस्तावको समझकर ऐसा ही करो। इससे तुम कृतज्ञ माने जाओगे। पाण्डवोंके साथ उत्तम भाईचारेका बर्ताव करके उन्हें राज्यसिंहासनपर बिठा दो और उनका पैतृक राज्य उन्हें समर्पित कर दो। इससे तुम्हें सुख प्राप्त होगा
এদের পৈতৃক রাজ্য তাদেরই অর্পণ কর; তবেই তুমি সুখ লাভ করবে।
Verse 153
गच्छध्वं नगरं सर्वे पूज्याश्व गुरवो मम । सब सुहृदोंके वचन सुनकर दुर्योधनने उनसे कुपित हो इस प्रकार कहा--'मुझे धर्म, धन, सुख, ऐश्वर्य, शासन और भोग किसीकी भी आवश्यकता नहीं है। तुमलोग मेरे निश्चयमें बाधा न डालो। यहाँसे चले जाओ। आमरण अनशन करनेके सम्बन्धमें मेरी बुद्धिका निश्चय अटल है। तुम सब लोग नगरको जाओ और वहाँ मेरे गुरुजनोंका सदा आदर-सत्कार करो'
তোমরা সবাই নগরে ফিরে যাও; আমার গুরুজনেরা পূজনীয়।
Verse 250
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनके प्रसंगमें कर्णवाक्यसम्बन्धी दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত ঘোষযাত্রাপর্বে দুর্যোধনের প্রায়োপবেশন-প্রসঙ্গে কর্ণবাক্য-সম্বন্ধীয় দুই শত পঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 251
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे एकपज्चाशदधिकद्वधिशततमो<5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের ঘোষযাত্রাপর্বে দুর্যোধনের প্রায়োপবেশ (আমরণ অনশন)-সংক্রান্ত দুই শত একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল। এই উপসংহার কাহিনিতে এক সন্ধিক্ষণ নির্দেশ করে—অহংকার ও অপমান দুর্যোধনকে আত্মবিনাশী সংকল্পের দিকে ঠেলে দেয়, এবং রাজধর্ম ও কুলধর্মের কর্তব্যের সঙ্গে একগুঁয়ে অহংয়ের নৈতিক টানাপোড়েনকে তীব্র করে তোলে।
The dilemma is the attempted use of status and force to override dharmic protections: whether coercion can be legitimized by lineage or opportunity, versus the principle that kṣatra authority is constrained by restraint, consent, and accountability to established norms.
Speech functions as ethical governance: Draupadī’s admonition and Dhaumya’s counsel model how dharma is articulated before retaliation, and how foreseeable consequences—social, moral, and strategic—follow from adharma even when immediate power appears to favor the aggressor.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-commentary is implicit in its narrative closure: the purohita’s warning and the transition to pursuit frame the episode as a demonstrative case of karmic and social consequence rather than a ritualized promise of merit.