
Bhīṣma’s Admonition; Duryodhana’s Rājasūya Aspiration and the Proposal of a Vaiṣṇava-satra
Upa-parva: Gandharva-episode aftermath: Dhṛtarāṣṭra–Karṇa counsel and the proposed Vaiṣṇava-satra (Rājasūya-equivalent)
Janamejaya asks what the Kaurava leaders did while the Pandavas resided in the forest. Vaiśaṃpāyana reports that after the Gandharva incident and the Pandavas’ intervention, Bhīṣma addresses Duryodhana with a corrective assessment: he had earlier advised against the forest venture; Duryodhana was seized by enemies and released by the dharma-aligned Pandavas, yet shows no shame. Bhīṣma highlights that Karṇa retreated in fear during the Gandharva battle, underscoring the limits of their martial standing relative to the Pandavas. Bhīṣma recommends a settlement (saṃdhi) with the Pandavas for the growth of the Kuru line. Duryodhana departs with Śakuni; Karṇa and Duḥśāsana follow. Bhīṣma withdraws in embarrassment. Duryodhana then consults ministers on what is beneficial. Karṇa encourages him to rule as unrivaled and proposes initiating a major sacrifice. Duryodhana expresses desire for a Rājasūya like Yudhiṣṭhira’s; Karṇa supports preparations and summons priests. The purohita refuses: a Rājasūya is not feasible while Yudhiṣṭhira lives and while Dhṛtarāṣṭra remains alive, citing precedence and conflict with propriety. He proposes an alternative great rite, a Vaiṣṇava-satra comparable to Rājasūya, funded by tribute and requiring preparation of the yajña-ground (including ploughing). The court approves; the king assigns tasks; artisans are ordered to execute the required implements and arrangements.
Chapter Arc: दुर्योधन अपनी विशाल सेना सहित वन में ‘घोषयात्रा’ के लिए आता है—गौओं की देखभाल और शिकार-विहार के बहाने, पर भीतर-भीतर पाण्डवों को दिखाकर अपमानित करने का गर्व भी साथ चलता है। → रमणीय, जल-वनस्पति से भरपूर देश में कौरवों के अलग-अलग शिविर सजते हैं—दुर्योधन के निकट कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि; फिर वे चारों ओर वन्य पशुओं का शिकार करते हुए पुण्य-प्रसिद्ध द्वैतवन-सरोवर की ओर बढ़ते हैं और वहाँ क्रीड़ा-स्थल बनवाने की आज्ञा देते हैं। → द्वैतवन के क्षेत्र में गन्धर्वों से सामना होता है; गन्धर्व दूत कौरव सैनिकों को फटकारते हैं—‘तुम्हारा राजा मूर्ख है, देवलोकवासी गन्धर्वों को बनियों की तरह समझकर आदेश दे रहा है’—और चेतावनी देते हैं कि तुरंत लौटो, नहीं तो परिणाम भोगो। → गन्धर्वों की कठोर वाणी सुनकर कौरव सेना के अग्रणी योद्धा घबरा उठते हैं और जहाँ धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन है, उसी ओर भागकर सूचना देने दौड़ते हैं। → गन्धर्वों की चेतावनी के बाद दुर्योधन क्या झुकेगा या अहंकार में टकराव को बुलाएगा—यह संकट अगले प्रसंग में फूटने को तैयार है।
Verse 1
हि >> आय न (0) हि 7 2 चत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वो्में परस्पर कटु संवाद वैशम्पायन उवाच अथ दुर्योधनो राजा तत्र तत्र वने वसन् | जगाम घोषानभितत्तत्र चक्रे निवेशनम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन जहाँ-तहाँ वनमें पड़ाव डालता हुआ उन घोषों (गोशालाओं)-के पास पहुँच गया और वहाँ उसने अपनी छावनी डाली
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! তারপর রাজা দুর্যোধন বনে স্থানে স্থানে শিবির স্থাপন করতে করতে গোশালাগুলির (ঘোষের) নিকটে পৌঁছাল এবং সেখানেই সে নিজের শিবির স্থাপন করল।
Verse 2
रमणीये समाज्ञाते सोदके समहीरुहे । देशे सर्वगुणोपेते चक्कुरावसथान् परा:,उसके साथ गये हुए लोगोंने भी उस सर्वगुणसम्पन्न, रमणीय, सुपरिचित, सजल तथा सघन वृक्षावलियोंसे युक्त प्रदेशमें अपने डेरे डाल दिये
তার সঙ্গে গমনকারী লোকেরাও সেই সর্বগুণসম্পন্ন, মনোরম, সুপরিচিত, জলসমৃদ্ধ ও ঘন বৃক্ষরাজিতে আচ্ছাদিত দেশে নিজেদের শিবির স্থাপন করল।
Verse 3
तथैव तत्समीपस्थान् पृथगावसथान् बहुन् कर्णस्य शकुने श्वैव ३ 2७ | चैव सर्वश:,इसी प्रकार दुर्योधनके डेकके पास ही कर्ण, शकुनि तथा दुःशासन आदि सब भाइयोंके लिये पृथक्-पृथक् बहुत-से खेमे पड़ गये
তদ্রূপ দুর্যোধনের শিবিরের নিকটেই কর্ণের, শকুনির এবং দুঃশাসন প্রভৃতি সকলের জন্য পৃথক পৃথক বহু শিবির স্থাপিত হল।
Verse 4
ददर्श स तदा गाव: शतशो5थ सहस््रश: । अड्कैरल॑क्षैश्ष ता: सर्वा लक्षयामास पार्थिव:,(रहनेकी व्यवस्था ठीक हो जानेपर) राजा दुर्योधनने अपनी सैकड़ों एवं हजारों गौओंका निरीक्षण करना आरम्भ किया। उन सबपर संख्या और निशानी डलवा दी
তখন রাজা শত শত ও সহস্র সহস্র গাভী দেখলেন। তিনি সকলের গায়ে সংখ্যা-চিহ্ন ও পরিচয়-লক্ষণ বসিয়ে তাদের চিহ্নিত করালেন।
Verse 5
अड्कयामास वसत्सांश्व॒ जज्ञे चोपसूतांस्त्वपि । बालवसत्साश्न या गाव: कालयामास ता अपि,फिर बछड़ोंपर भी संख्या और निशानी डलवायी और उनमेंसे जो नाथनेयोग्य थे, उन सबकी गणना कराकर उनपर पहचान डाल दी। जिन गौओंके बछड़े बहुत छोटे थे, उनकी भी अलग गणना करवायी
তিনি বাছুরগুলিতেও সংখ্যা-চিহ্ন বসালেন এবং সদ্য প্রসূতা গাভীগুলিকেও যথাযথভাবে গণনা করালেন। যেসব গাভীর বাছুর খুবই ছোট, সেগুলিকেও পৃথকভাবে নথিভুক্ত করে আলাদা রাখালেন।
Verse 6
अथ स स्मारणं कृत्वा लक्षयित्वा त्रिहायनान् | वृतो गोपालकै: प्रीतो व्यहरत् कुरुनन्दन:,इस प्रकार जाँच-पड़तालका काम पूरा करके कुरुनन्दन दुर्योधनने तीन सालके बछड़ोंकी पृथक् गणना करवायी और स्मरणके लिये सब कुछ लिखकर वह बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा
তারপর স্মরণার্থ সব হিসাব লিখিয়ে এবং তিন বছরের বাছুরগুলিকে পৃথকভাবে চিহ্নিত করে, কুরু-নন্দন দুর্যোধন আনন্দিত হয়ে গোপালদের পরিবেষ্টিত অবস্থায় সেই বনে বিচরণ করতে লাগলেন।
Verse 7
स च पौरजन: सर्व: सैनिकाश्न सहस्रश: | यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन् यथामरा:,वे समस्त पुरवासी और सहस्रोंकी संख्यामें आये हुए सैनिक उस वनमें अपनी-अपनी रुचिके अनुसार देवताओंके समान क्रीड़ा करने लगे
আর সমস্ত নগরবাসী এবং সহস্র সহস্র সৈন্য, সেই বনে প্রত্যেকে নিজের রুচি অনুযায়ী দেবতাদের মতো ক্রীড়া করতে লাগল।
Verse 8
ततो गोपा: प्रगातार: कुशला नृत्यवादने । धार्रराष्ट्रमुपातिष्ठन् कन्याश्वैव स्वलंकृता:,तदनन्तर नृत्य और वादनकी कलामें कुशल कुछ गवैये गोप तथा गहने-कपड़ोंसे सजी हुई उनकी कन्याएँ दुर्योधनके समीप आयीं
তারপর নৃত্য, গান ও বাদ্যে দক্ষ কিছু গোপ-গায়ক এবং অলংকার ও বস্ত্রে সুশোভিত তাদের কন্যারা ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধনের নিকট উপস্থিত হল।
Verse 9
स स्त्रीगणावृतो राजा प्रदह्ृष्ट: प्रददौ वसु । तेभ्यो यथाहमन्नानि पानानि विविधानि च,अपनी स्त्रियोंके साथ राजा दुर्योधन उनको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें बहुत- सा धन दिया तथा यथायोग्य नाना प्रकारकी खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित की
নারীগণে পরিবৃত রাজা দুর্যোধন তাদের দেখে অত্যন্ত প্রীত হলেন। তিনি তাদের প্রচুর ধন দান করলেন এবং যথোচিত নানা প্রকার অন্ন ও পানীয় অর্পণ করলেন।
Verse 10
ततस्ते सहिता: सर्वे तरक्षून् महिषान् मृगान् । गवयर्क्षवराहांश्व समन्तात् पर्यकालयन्,तदनन्तर वे सब लोग तरक्षुओं (जरखों), जंगली भैंसों, गवयों, रीछों और शूकरों एवं अन्य जंगली हिंसक पशुओंका सब ओरसे शिकार करने लगे
তারপর তারা সকলে একত্র হয়ে চারদিক থেকে ঘিরে শিকার করতে লাগল—শিয়াল, বন্য মহিষ, হরিণ, গয়াল, ভালুক, বুনো শূকর এবং অন্যান্য বনচর পশু।
Verse 11
स ताउछरैविनिर्भिद्य गजांश्व सुबहून् वने । रमणीयेषु देशेषु ग्राहयामास वै मृगान्,उन्होंने वनके रमणीय प्रदेशोंमें बहुत-से हाथियोंको अपने बाणोंसे विदीर्ण करके अनेकानेक हिंस्र पशुओंको पकड़ लिया
সে বনে উপর থেকে তীক্ষ্ণ বাণে বিদ্ধ করে বহু হাতি ও ঘোড়াকে নিপাত করল; আর মনোরম বনপ্রদেশে নানা বন্য পশুকে ধরিয়ে দিল।
Verse 12
गोरसानुपयुञ्जान उपभोगांश्व भारत । पश्यन् स रमणीयानि वनान्युपवनानि च,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा
হে ভারতনন্দন! দুর্যোধন সঙ্গীদের সঙ্গে দুধ-দধি প্রভৃতি গোরস ভোগ করে এবং নানা সুখ-সম্ভোগে মত্ত হয়ে সেখানকার মনোরম বন ও উপবনের শোভা দেখতে লাগল।
Verse 13
मत्तभ्रमरजुष्टानि बर्हिणाभिरुतानि च । अगच्छदानुपूर्व्येण पुण्यं द्वैतववनं सर:,भरतनन्दन! दुर्योधन अपने साथियोंसहित दूध आदि गोरसोंका उपयोग करता और भाँति-भाँतिके भोग भोगता हुआ वहाँके रमणीय वनों और उपवनोंकी शोभा देखने लगा। उनमें मतवाले भ्रमर गुंजार करते थे और मयूरोंकी मधुर वाणी सब ओर गूँज रही थी। इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह परम पवित्र द्वैववननामक सरोवरके समीप जा पहुँचा
হে ভারতনন্দন! মত্ত ভ্রমরের গুঞ্জনে পূর্ণ এবং ময়ূরের কলরবে মুখর সেই বনভূমি অতিক্রম করে সে ক্রমে পুণ্য দ্বৈতবন-নামক সরোবরের নিকটে এসে পৌঁছাল।
Verse 14
मत्तभ्रमरसंजुष्ट नीलकण्ठरवाकुलम् । सप्तच्छदसमाकीर्ण पुन्नागबकुलैर्युतम्,वहाँ मधुमत्त भ्रमर कमलपुष्पोंका रस ले रहे थे। मयूरोंकी मधुर वाणीसे वह सारा प्रदेश व्याप्त हो रहा था। सप्तच्छद (छितवन)-के वृक्षोंसे वह सरोवर आच्छादित-सा जान पड़ता था। उसके तटोंपर मौलसिरी और नागकेसरके वृक्ष शोभा पा रहे थे
সেখানে মত্ত ভ্রমররা পদ্মফুলের মধুরস পান করছিল, আর ময়ূরের মধুর ডাক-ধ্বনিতে সমগ্র প্রদেশ মুখরিত ছিল। সপ্তচ্ছদ বৃক্ষে যেন সরোবরটি আচ্ছন্ন, আর তার তট পুন্নাগ ও বকুলবৃক্ষে শোভিত ছিল।
Verse 15
ऋद्धया परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे
পরম ঐশ্বর্যে ভূষিত, বজ্রধারী মহেন্দ্রের ন্যায় ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির কাকতালীয়ভাবে সেখানেই অবস্থান করছিলেন।
Verse 16
ईजे राजर्षियज्ञेन साद्यस्केन विशाम्पते । दिव्येन विधिना चैव वन्येन कुरुसत्तम,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे
হে জনমেজয়, কুরুশ্রেষ্ঠ! তিনি সেখানে সাদ্যস্ক রাজর্ষিযজ্ঞ সম্পাদন করছিলেন—বনে সহজলভ্য উপকরণে, দিব্য ও বিধিপূর্বক।
Verse 17
(विद्वद्धिः सहितो धीमान् ब्राह्मुणैर्वनवासिभि: ।) कृत्वा निवेशमभित: सरसस्तस्य कौरव । द्रौपद्या सहितो धीमान् धर्मपत्न्या नराधिप:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे
হে কৌরব! বনবাসী বিদ্বান ব্রাহ্মণদের সঙ্গে সেই প্রাজ্ঞ নৃপতি ঐ সরোবরের চারদিকে শিবির স্থাপন করলেন; এবং ধর্মপত্নী দ্রৌপদীসহ সেই ধীর নরাধিপতি সেখানেই বাস করলেন।
Verse 18
ततो दुर्योधन: प्रेष्यानादिदेश सहस्रश: । आक्रीडावसथा: क्षिप्रं क्रियन्तामिति भारत
তখন দুর্যোধন সহস্র সহস্র পরিচারককে আদেশ দিল—“হে ভারত! শীঘ্রই ক্রীড়াস্থল ও আবাসস্থল প্রস্তুত করা হোক।”
Verse 19
भारत! तदनन्तर दुर्योधनने अपने सहस्रों सेवकोंको आज्ञा दी--'तुमलोग बहुत-से क्रीडामण्डप तैयार करो” ।। ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिण: । चिकीर्षन्तस्तदा55क्रीडाञ्जम्मुर्दतवनं सर:,आज्ञाकारी सेवक दुर्योधनसे “तथास्तु'” कहकर क्रीडाभवन बनानेकी इच्छासे द्वैतवनके सरोवरके निकट गये
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর দুর্যোধন তার সহস্র পরিচারককে আদেশ দিল—“অনেক ক্রীড়ামণ্ডপ প্রস্তুত করো।” তারা ‘তথাস্তु’ বলে কৌরবের আদেশ গ্রহণ করে, ক্রীড়ার আয়োজন করতে উদ্যত হয়ে দ্বৈতবনের সরোবরের নিকটে গেল।
Verse 20
प्रविशन्तं वनद्वारि गन्धर्वा: समवारयन् | सेनाग्रयं धार्तराष्ट्रस्य प्राप्तं द्वैतवनं सर:,दुर्योधनका सेनानायक द्वैतवन सरोवरके अत्यन्त निकटतक पहुँच गया था, उस वनके द्वारपर पैर रखते ही उसको गन्धर्वोने रोक दिया
বৈশম্পায়ন বললেন—ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের সেনার অগ্রভাগ দ্বৈতবনের সরোবরের নিকটে এসে বনদ্বার দিয়ে প্রবেশ করতে উদ্যত হলে গন্ধর্বরা তাদের পথ রুদ্ধ করল।
Verse 21
तत्र गन्धर्वराजो वै पूर्वमेव विशाम्पते । कुबेरभवनाद् राजन्नाजगाम गणावृतः,राजन! वहाँ गन्धर्वराज चित्रसेन पहलेसे ही अपने सेवकगणोंके साथ कुबेरभवनसे आये हुए थे
হে রাজন, সেখানে গন্ধর্বরাজ চিত্রসেন পূর্বেই কুবেরের ভবন থেকে নিজের গণপরিবেষ্টিত হয়ে এসে উপস্থিত ছিল।
Verse 22
गणैरप्सरसां चैव त्रिदशानां तथा55त्मजै: । विहारशील: क्रीडार्थ तेन तत् संवृतं सर:,वे उन दिनों अप्सराओं तथा देवकुमारोंके साथ विभिन्न स्थानोंमें भ्रमण करते थे। उन्होंने स्वयं ही क्रीड़ाविहारके लिये उस सरोवरको सब ओरसे घेर लिया था
সে অপ্সরাগণের দল এবং দেবপুত্রদের সঙ্গে বিহারপ্রবণ ছিল। ক্রীড়া-বিনোদনের জন্য সে সেই সরোবরকে চারদিক থেকে ঘিরে রেখেছিল।
Verse 23
तेन तत् संवृतं दृष्टवा ते राजपरिचारका: । प्रतिजग्मुस्ततो राजन् यत्र दुर्योधनो नूप:,राजन्! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'
হে রাজন, সেই সরোবর গন্ধর্বরাজের দ্বারা ঘেরা দেখে রাজপরিচারকেরা যেখানে রাজা দুর্যোধন ছিল সেখানে ফিরে গেল।
Verse 24
स तु तेषां वच: श्रुत्वा सैनिकान् युद्धदुर्मदान् प्रेषयामास कौरव्य उत्सारयत तानिति,राजन्! उस सरोवरको गन्धर्वराजने घेर रखा है, यह देखकर वे राजसेवक जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ लौट गये। जनमेजय! अपने सेवकोंका कथन सुनकर राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले सैनिकोंको यह आदेश देकर भेजा कि “गन्धर्वोको वहाँसे मार भगाओ'
বৈশম্পায়ন বললেন—নিজ সেবকদের সংবাদ শুনে কৌরব-রাজ দুর্যোধন যুদ্ধগর্বে উন্মত্ত সৈন্যদের পাঠালেন এই আদেশ দিয়ে—“ওদের তাড়িয়ে দাও!” হে রাজন, সেই সরোবর গন্ধর্বরাজ দ্বারা পরিবেষ্টিত দেখে রাজসেবকেরা যেখানে রাজা দুর্যোধন ছিলেন সেখানেই ফিরে এল। হে জনমেজয়, সেবকদের কথা শুনে দুর্যোধন যুদ্ধোন্মত্ত বাহিনীকে পাঠালেন—“গন্ধর্বদের আঘাত করে সেই স্থান থেকে হটিয়ে দাও।”
Verse 25
तस्य तद् वचन श्रुत्वा राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सरो द्वैतवनं गत्वा गन्धर्वानिदमब्रुवन्,राजाका यह आदेश सुनकर उसकी सेनाके नायक द्वैतवन सरोवरके समीप जाकर गन्धर्वोंसे इस प्रकार बोले--
রাজার সেই আদেশ শুনে সেনার অগ্রগামী নায়কেরা দ্বৈতবন-সরোবরের কাছে গিয়ে গন্ধর্বদের এভাবে বলল।
Verse 26
राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो बली । विजिहीर्षुरिहायाति तदर्थमपसर्पत,“गन्धर्वो! महाराज धृतराष्ट्रके बलवान् पुत्र राजा दुर्योधन यहाँ विहार करनेकी इच्छासे पधार रहे हैं। तुमलोग उनके लिये यह स्थान खाली करके दूर चले जाओ'
“হে গন্ধর্বগণ! মহারাজ ধৃতরাষ্ট্রের বলবান পুত্র রাজা দুর্যোধন এখানে ক্রীড়া-বিহার করতে আসছেন। অতএব তোমরা এই স্থান খালি করে দূরে সরে যাও।”
Verse 27
एवमुक्तास्तु गन्धर्वा: प्रहसन्तो विशाम्पते | प्रत्यब्रुवंस्तान् पुरुषानिदं हि परुषं वच:,राजन्! उनके ऐसा कहनेपर गन्धर्व जोर-जोरसे हँसने लगे; और उन राजसेवकोंको उत्तर देते हुए उनसे इस प्रकार कठोर वाणीमें बोले--
হে জনপতি, এমন কথা শুনে গন্ধর্বরা উচ্চহাস্যে ফেটে পড়ল; তারপর রাজসেবকদের জবাব দিতে গিয়ে কঠোর বাক্যে এভাবে বলল।
Verse 28
न चेतयति वो राजा मन्दबुद्धि: सुयोधन: । योअस्मानाज्ञापयत्येवं वैश्यानिव दिवौकस:
“তোমাদের রাজা সুয়োধন মন্দবুদ্ধি; সে একটুও বিবেচনা করে না—যে আমাদের, স্বর্গবাসী দিব্যজনদের, এমনভাবে আদেশ দেয় যেন আমরা কেবল সাধারণ বৈশ্য!”
Verse 29
“तुम्हारा राजा दुर्योधन मूर्ख है। उसे तनिक भी चेत नहीं है; क्योंकि वह हम देवलोकवासी गन्धर्वको भी बनियोंके समान समझकर इस प्रकार आज्ञा दे रहा है ।। यूयं मुमूर्षवश्चापि मन्दप्रज्ञा न संशय: । ये तस्य वचनादेवमस्मान् ब्रूत विचेतस:,“तुमलोगोंकी भी बुद्धि मारी गयी है। इसमें संदेह नहीं कि तुम सब-के-सब मरना चाहते हो। तभी तो उस दुर्योधनके कहनेसे तुम इस प्रकार हमसे विचारहीन होकर बातें कर रहे हो
বৈশম্পায়ন বললেন— তোমরা নিশ্চিতই মৃত্যুর দিকে ধাবিত, আর তোমাদের বুদ্ধি মন্দ— এতে কোনো সন্দেহ নেই। দুর্যোধনের কেবল আদেশে তোমরা বিবেচনাহীন হয়ে আমাদের সঙ্গে এভাবে কথা বলছ।
Verse 30
गच्छध्वं त्वरिता: सर्वे यत्र राजा स कौरव: । न चेदद्यैव गच्छथध्वं धर्मराजनिवेशनम्,“या तो तुम सब लोग तुरन्त वहीं लौट जाओ, जहाँ तुम्हारा राजा दुर्योधन रहता है। या यदि ऐसा नहीं करना है, तो अभी धर्मराजके नगर (यमलोक) की राह लो”
বৈশম্পায়ন বললেন— তোমরা সবাই ত্বরিত গিয়ে পৌঁছাও যেখানে সেই কৌরব রাজা (দুর্যোধন) আছে। আর যদি তা না করো, তবে আজই ধর্মরাজ (যম)-এর নিবাসের পথে যাত্রা করো।
Verse 31
एवमुक्तास्तु गन्धर्व राज्ञ: सेनाग्रयायिन: । सम्प्राद्रवन् यतो राजा धृतराष्ट्रसुतो&$भवत्,गन्धर्वोके ऐसा कहनेपर राजाके सेनानायक योद्धा वहीं भाग गये, जहाँ धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन स्वयं विराजमान था
বৈশম্পায়ন বললেন— গন্ধর্বরাজের এমন কথা শুনে সেনার অগ্রগণ্য নেতারা তৎক্ষণাৎ দৌড়ে গেল, যেখানে ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন অবস্থান করছিল।
Verse 240
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वदुर्योधनसेनासंवादे चत्वारिंशदधिकद्विशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের ঘোষযাত্রাপর্বে গন্ধর্ব ও দুর্যোধনের সেনার সংলাপ-প্রসঙ্গে দুই শত চল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Whether to pursue reconciliation after receiving undeserved rescue (acknowledging obligation and shame) or to convert resentment into a prestige project that competes for status through ritual display.
Ethical authority requires self-assessment and restraint: public humiliation and dependence on rivals should motivate prudence and settlement, not denial and escalation through vanity.
No explicit phalaśruti appears; the meta-function is structural—linking political embarrassment to ritual strategy, showing how legitimacy is negotiated through both conduct and sanctioned ceremonial order.