
सहदेव–सात्यकि संवादः (Sahadeva and Satyaki on resolve after failed conciliation)
Upa-parva: Yāna–Udyoga Context (War-Counsel and Mobilization Discourse)
Chapter 79 records a compact counsel sequence in which Sahadeva asserts that the “sanātana” dharma articulated by the king is acknowledged, yet insists that the practical outcome must be organized engagement rather than mere pacification. He argues that even if the Kurus were to desire reconciliation with the Pāṇḍavas, preparation for conflict should still proceed, reflecting distrust of durable settlement. Sahadeva grounds his resolve in remembered moral injury—Draupadī’s public humiliation—and states that his anger toward Suyodhana cannot be calmed without decisive redress. He further notes that even if leading figures (Bhīma, Arjuna, Kṛṣṇa, and the dharmic Yudhiṣṭhira) were to set aside dharma, he himself would still seek combat, emphasizing personal commitment to retributive justice. Sātyaki then affirms Sahadeva’s assessment, linking peace to the removal of Duryodhana as the condition for anger’s cessation, and recalls shared hardship in exile as a catalyst for indignation. Vaiśaṃpāyana closes the scene by describing widespread approval among the warriors, expressed through acclamation and heightened morale.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के बहुविध, धर्मयुक्त वचनों को स्मरण कर नकुल श्रीकृष्ण से निवेदन करता है—अब निर्णायक प्रयत्न का समय है, और वह प्रयत्न स्वयं केशव हैं। → नकुल बताता है कि भीम ने पहले संधि का मार्ग रखा, फिर अपने बाहुबल का संकल्प प्रकट किया; अर्जुन ने भी अपना मत बार-बार स्पष्ट किया। पर कौरव-पक्ष में अचिन्त्य पराक्रमी, शस्त्रधारी वीरों की भीड़ देखकर किसी का भी मन डगमगा सकता है—यही भय और दुविधा तनाव बढ़ाते हैं। → नकुल का निर्णायक निष्कर्ष: ‘महाबाहो! आप वहाँ केवल जाने मात्र से धर्मराज का अभीष्ट सिद्ध कर देंगे’—क्योंकि विदुर श्रोता हैं और जनार्दन वक्ता; इन दोनों की संयुक्त नीति-शक्ति किसी भी भटके हुए प्रयोजन को मार्ग पर रोक सकती है। → नकुल कृष्ण को दूत-कार्य के लिए प्रेरित करता है और आश्वस्त करता है कि भीष्म, द्रोण, विदुर आदि भी ‘श्रेय’ (कल्याणकारी समाधान) के पक्ष में होंगे; अतः कृष्ण का प्रस्थान ही शांति-प्रयास की कुंजी है। → कृष्ण के गमन से कौरव सभा में क्या परिवर्तन होगा—धृतराष्ट्र-दुर्योधन नीति के आगे झुकेंगे या युद्ध अनिवार्य होगा?
Verse 1
अपन का छा ] अतडकडज अशीतितमो<ध्याय: नकुलका निवेदन नकुल उवाच उक्त बहुविध॑ वाक््यं धर्मराजेन माधव । धर्मज्ञेन वदान्येन श्रुतं चैव हि तत् त्वया,नकुल बोले--माधव! धर्मज्ञ और उदार धर्मराजने बहुत-सी बातें कही हैं और आपने उन्हें सुना है
নকুল বলল—হে মাধব! ধর্মজ্ঞ ও দানশীল ধর্মরাজ বহু প্রকার কথা বলেছেন, আর আপনি সেগুলি শুনেছেন।
Verse 2
मतमाज्ञाय राज्ञश्न भीमसेनेन माधव । संशमो बाहुवीर्य च ख्यापितं माधवात्मन:,यदुकुलभूषण! राजाका मत जानकर भाई भीमसेनने भी पहले संधिस्थापनकी, फिर अपने बाहुबलकी बात बतायी है
হে যদুকুলভূষণ! রাজার অভিপ্রায় জেনে ভীমসেন প্রথমে সন্ধি-স্থাপনের কথা বলল, তারপর নিজের বাহুবলের পরাক্রমও প্রকাশ করল।
Verse 3
तथैव फाल्गुनेनापि यदुक्तं तत् त्वया श्रुवम् । आत्मनश्व मतं वीर कथितं भवतासकृत्
তদ্রূপ ফাল্গুন (অর্জুন) যা বলেছে, তাও আপনি শুনেছেন। আর হে বীর! আপনি নিজ মতও বারংবার প্রকাশ করেছেন।
Verse 4
वीर! इसी प्रकार अर्जुनने भी जो कुछ कहा है, वह भी आपने सुन ही लिया है। आपका जो अपना मत है, उसे भी आपने अनेक बार प्रकट किया है ।। सर्वमेतदतिक्रम्य श्रुत्वा परमतं भवान् | यत् प्राप्तकालं मन्येथास्तत् कुर्या: पुरुषोत्तम,परंतु पुरुषोत्तम! इन सब बातोंको पीछे छोड़कर और विपक्षियोंके मतको अच्छी तरह सुनकर आपको समयके अनुसार जो कर्तव्य उचित जान पड़े, वही कीजियेगा
কিন্তু হে পুরুষোত্তম! এ সব কথা অতিক্রম করে, প্রতিপক্ষের মতও ভালোভাবে শুনে, সময়োচিত যা কর্তব্য বলে আপনি মনে করবেন, তাই করুন।
Verse 5
तस्मिंस्तस्मिन् निमित्ते हि मतं भवति केशव । प्राप्तकालं मनुष्येण क्षमं कार्यमरिंदम,शत्रुओंका दमन करनेवाले केशव! भिन्न-भिन्न कारण उपस्थित होनेपर मनुष्योंके विचार भी भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं; अतः मनुष्यको वही कार्य करना चाहिये, जो उसके योग्य और समयोचित हो
হে শত্রুদমনকারী কেশব! নানা কারণ উপস্থিত হলে মানুষের মতও নানা রূপ ধারণ করে; অতএব মানুষের উচিত নিজের যোগ্যতা ও সময়ের উপযোগী যে কর্ম, তাই করা।
Verse 6
अन्यथा चिन्तितो हार्थ: पुनर्भवति सो3न्यथा । अनित्यमतयो लोके नरा: पुरुषसत्तम,पुरुषश्रेष्ठती किसी वस्तुके विषयमें सोचा कुछ और जाता है और हो कुछ और ही जाता है। संसारके मनुष्य स्थिर विचारवाले नहीं होते हैं
হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! কোনো বিষয়ে ভাবা হয় একরকম, অথচ ফল হয় আবার অন্যরকম। এই জগতে মানুষের বিচার স্থির নয়; তাদের মত ও প্রত্যাশা অনিত্য।
Verse 7
अन्यथा बुद्धयो हासन्नस्मासु वनवासिषु । अदृश्येष्वन्यथा कृष्ण दृश्येषु पुनरन्यथा,श्रीकृष्ण! जब हम वनमें निवास करते थे, उस समय हमारे विचार कुछ और ही थे, अज्ञातवासके समय वे बदलकर कुछ और हो गये और उस अवधिको पूर्ण करके जब हम सबके सामने प्रकट हुए हैं, तबसे हमलोगोंका विचार कुछ और हो गया है
হে কৃষ্ণ! আমরা যখন বনে বাস করতাম তখন আমাদের ভাবনা ছিল একরকম; অজ্ঞাতবাসে তা বদলে আরেকরকম হলো; আর এখন সেই সময় পূর্ণ করে সকলের সামনে প্রকাশিত হয়ে আমাদের চিন্তা আবার ভিন্ন হয়ে গেছে।
Verse 8
अस्माकमपि वार्ष्णेय वने विचरतां तदा । न तथा प्रणयो राज्ये यथा सम्प्रति वर्तते
হে বার্ষ্ণেয়! সেই সময় বনে বিচরণ করতে করতে আমাদের রাজ্যের প্রতি টান এতটা ছিল না, যতটা এখন হয়েছে।
Verse 9
वृष्णिनन्दन! वनमें विचरते समय राज्यके विषयमें हमारा वैसा आकर्षण नहीं था, जैसा इस समय है ।। निवृत्तवनवासान् नः श्रुत्वा वीर समागता: । अक्षौहिण्यो हि सप्तेमास्त्वत्प्रसादाज्जनार्दन,वीर जनार्दन! हमलोग वनवासकी अवधि पूरी करके आ गये हैं; यह सुनकर आपकी कृपासे ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ यहाँ एकत्र हो गयी हैं
হে বীর জনার্দন! আমাদের বনবাস শেষ হয়েছে—এ কথা শুনে আপনার কৃপায় এই সাত অক্ষৌহিণী সেনা এখানে সমবেত হয়েছে।
Verse 10
इमान् हि पुरुषव्याप्रानचिन्त्यवलपौरुषान् । आत्तशस्त्रान् रणे दृष्टवा न व्यथेदिह कः पुमान्,यहाँ जो पुरुषसिंह वीर उपस्थित हैं, इनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। रणभूमिमें इन्हें अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित देखकर किस पुरुषका हृदय भयभीत न हो उठेगा?
এখানে উপস্থিত এই সিংহসম পুরুষবীরদের বল ও পৌরুষ অকল্পনীয়। রণক্ষেত্রে অস্ত্রশস্ত্র ধারণ করে তাদের দেখলে এমন কে আছে, যার হৃদয় ভয়ে কেঁপে উঠবে না?
Verse 11
स भवान् कुरुमध्ये तं सान्त्वपूर्व भयोत्तरम् | ब्रूयाद् वाक््यं यथा मन्दो न व्यथेत सुयोधन:,आप कौदरवोंके बीचमें उससे पहले सान्त्वनापूर्ण बातें कहियेगा और अन्तमें युद्धका भय भी दिखाइयेगा, जिससे मूर्ख दुर्योधनके मनमें व्यथा न हो
কুরুদের মধ্যেই তাকে এমন বাক্য বলুন যা প্রথমে সান্ত্বনাময়, আর শেষে যুদ্ধের ভয় দেখায়—যাতে মন্দবুদ্ধি সুয়োধন (দুর্যোধন) অন্তরে বিচলিত না হয়।
Verse 12
युधिष्ठिरं भीमसेनं बीभत्सुं चापराजितम् । सहदेवं च मां चैव त्वां च रामं च केशव,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?
হে কেশব! যুধিষ্ঠির, ভীমসেন, যুদ্ধে অপরাজিত বীভৎসু (অর্জুন), সহদেব ও আমি; আর আপনি ও রাম—এমন মহাবীরদের বিরুদ্ধে যুদ্ধে নেমে যে নিজের দেহে মাংস ও রক্তের ভার বাড়াতে চায়, সে মানুষ কে?
Verse 13
सात्यकिं च महावीर्य विराटं च सहात्मजम् । द्रपदं॑ च सहामात्य॑ धृष्टद्युम्नं च माधव,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?
হে মাধব! মহাবীর্য সাত্যকি, পুত্রসহ বিরাট, মন্ত্রীসহ দ্রুপদ, এবং ধৃষ্টদ্যুম্ন—এরা সকলেই যখন আমাদের পক্ষে, তখন যে নিজের দেহে মাংস ও রক্তের ভার বাড়াতে চায়, এমন কে আছে যে যুদ্ধে আপনার ও আমার মোকাবিলা করতে পারে?
Verse 14
काशिराजं च विक्रान्तं धृष्टकेतुं च चेदिपम् । मांसशोणित भभन्मर्त्य: प्रतियुध्येत को युधि,केशव! अपने शरीरमें मांस और रक्तका बोझ बढ़ानेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो युद्धमें युधिष्ठि, भीमसेन, किसीसे पराजित न होनेवाले अर्जुन, सहदेव, बलराम, महापराक्रमी सात्यकि, पुत्रोंसहित विराट, मन्त्रियोंसहित द्रुपद, धृष्टद्युम्न, पराक्रमी काशिराज, चेदिनरेश धृष्टकेतु तथा आपका और मेरा सामना कर सके?
হে কেশব! বিক্রান্ত কাশীরাজ ও চেদির অধিপতি ধৃষ্টকেতুর মতো বীরদের সম্মুখে, যে নিজের দেহে মাংস ও রক্তের ভার বহন করে—এমন কোন মর্ত্য যুদ্ধে প্রতিযুদ্ধ করবে?
Verse 15
स भवान् गमनादेव साधयिष्यत्यसंशयम् | इष्टमर्थ महाबाहो धर्मराजस्य केवलम्
নকুল বললেন—মহাবাহো! আপনি কেবল যাত্রা করলেই নিঃসন্দেহে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের একমাত্র অভীষ্ট উদ্দেশ্য সিদ্ধ হবে।
Verse 16
महाबाहो! आप वहाँ केवल जानेमात्रसे धर्मराजके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर देंगे; इसमें संशय नहीं है ।। विदुरश्नैव भीष्मश्न द्रोणश्न सहबाह्विक: । श्रेय: समर्था विज्ञातुमुच्यमानास्त्वयानघ,निष्पाप श्रीकृष्ण! विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा बाह्नीक--ये आपके बतानेपर कल्याणकारी मार्गको समझनेमें समर्थ हैं
নকুল বললেন—মহাবাহো! আপনি সেখানে কেবল গমন করলেই ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের অভীষ্ট মনোরথ সিদ্ধ হবে; এতে সন্দেহ নেই। আর বিদুর, ভীষ্ম, দ্রোণাচার্য ও বাহ্লীক—হে অনঘ, নিষ্পাপ শ্রীকৃষ্ণ—আপনি ব্যাখ্যা করলে কল্যাণের পথ (শ্রেয়স) বুঝতে সক্ষম।
Verse 17
ते चैनमनुनेष्यन्ति धृतराष्ट्र जनाधिपम् | त॑ च पापसमाचारं सहामात्यं सुयोधनम्,ये लोग राजा धूृतराष्ट्र तथा मन्त्रियोंसहित पापाचारी दुर्योधनको (समझा-बुझाकर) राहपर लायँगे
তাঁরা মনুষ্যাধিপতি রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে বুঝিয়ে সঠিক পথে ফিরিয়ে আনবেন; আর পাপাচারী সুয়োধনকেও তার মন্ত্রীদেরসহ উপদেশ দিয়ে নিবৃত্ত করবেন।
Verse 18
श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दन । कमिवार्थ निवर्तन्तं स्थापयेतां न वर्त्मनि,जनार्दन! जहाँ विदुरजी किसी प्रयोजनको सुनें और आप उसका प्रतिपादन करें, वहाँ आप दोनों मिलकर किस बिगड़ते हुए कार्यको सिद्धिके मार्गपर नहीं ला देंगे?
হে জনার্দন! বিদুর উদ্দেশ্যের মর্মগ্রাহী শ্রোতা, আর আপনি তার প্রতিপাদক বক্তা; আপনারা দু’জন মিললে কোন বিপথগামী কার্যকে সঠিক পথে স্থাপন করতে পারবেন না?
Verse 79
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक उन्नासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণের বচনবিষয়ক ঊনআশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 80
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि नकुलवाक्ये अशीतितमो<ध्याय: ।। ८० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें नकुलवाक्यविषयक असीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে নকুলবাক্য-বিষয়ক আশিতিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The dilemma is whether reconciliation (śama) remains ethically credible after severe public wrongdoing; Sahadeva frames peace as insufficient without enforceable justice, asserting that mere verbal settlement cannot resolve moral injury.
The chapter emphasizes that ethical governance requires enforceability: when institutional remedies fail, leaders may prioritize coordinated preparedness and accountability, while still acknowledging the language of dharma.
No explicit phalaśruti is presented here; the meta-level closure is narrative—Vaiśaṃpāyana notes collective acclamation, functioning as an internal validation of the counsel’s persuasive force within the coalition.