Adhyaya 32
Udyoga ParvaAdhyaya 32123 Verses

Adhyaya 32

Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition

Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Samvada (Envoy’s Return and Court Reception)

Vaiśaṃpāyana narrates Saṃjaya’s departure after being permitted by the Pāṇḍavas and his swift arrival at Hāstinapura. Saṃjaya follows court procedure: he approaches the inner palace, requests the gatekeeper to announce him as a Pāṇḍava envoy, and seeks entry if the king is awake. The gatekeeper conveys the message; Dhṛtarāṣṭra orders that Saṃjaya be welcomed and admitted without delay. Saṃjaya enters the guarded royal hall and salutes the king, reporting that Yudhiṣṭhira has inquired after Dhṛtarāṣṭra’s welfare, his sons, grandsons, allies, and dependents. Dhṛtarāṣṭra reciprocally asks about Yudhiṣṭhira’s well-being. Saṃjaya then expands into a didactic critique: Yudhiṣṭhira is portrayed as committed to dharma over wealth and comfort, while the Kuru court’s governance is examined through themes of karmic consequence, the limits of human agency versus destiny, and the reputational and social costs of policy error. The discourse warns against rulerly weakness, पुत्रवश (being led by sons), and the failure to restrain destructive counsel. The chapter closes with Saṃjaya requesting rest after travel and noting that the Kurus will convene in the assembly the next morning to hear the Pāṇḍava message.

Chapter Arc: संजय के प्रस्थान के बाद अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के भीतर शंका और आत्मरक्षा की बेचैनी उठती है; वह द्वारपाल से कहता है—“मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ, उन्हें शीघ्र बुलाओ।” → विदुर राजमहल पहुँचते हैं, पर द्वारपाल उन्हें रोक देता है—राजा ने दर्शन के योग्य नहीं कहा। यह अपमान केवल व्यक्ति का नहीं, नीति का है: सत्य-वक्ता को दरबार से बाहर रखना। इसी पृष्ठभूमि में नीति-वचन उभरते हैं—मूढ़ मनुष्य के लक्षण (अनाहूत प्रवेश, अपृष्ट वाचालता, अविश्वस्त पर विश्वास), और समाज की कटु अर्थ-व्यवस्था (चोर असावधान से, वैद्य रोगी से, कामोन्मत्त स्त्री/पुरुष से जीविका आदि) जैसे कथन, जो धृतराष्ट्र के दरबार की नैतिक गिरावट पर परोक्ष प्रहार बनते हैं। → विदुर का निर्णायक उपदेश धृतराष्ट्र के सामने (या उसके लिए) गूंजता है—नित्यकर्म (दान, होम, देवपूजन, प्रायश्चित्त, मंगल) करने वाले का ‘उत्थान’ देवता भी साधते हैं; और जो आत्मसंयम व लज्जा (आत्मनापत्रपते) धारण करता है, वह सूर्य-सा तेजस्वी होकर लोक-गुरु बनता है। फिर विदुर सीधे मूल प्रश्न पर आते हैं: पाण्डु के पाँच पुत्र—वन में पले, शापदग्ध पिता के अनाथ-से—तुम्हीं ने बाल्य में बढ़ाए-शिक्षित किए; अब उनका न्यायोचित राज्य उन्हें देकर पुत्रों सहित सुखी हो, अन्यथा देव-मानव दोनों के बीच तुम निंद्य ठहरोगे। → अध्याय का निष्कर्ष नीति-निर्णय की कसौटी पर टिकता है: धृतराष्ट्र के लिए मार्ग स्पष्ट है—धर्म के अनुसार पाण्डवों को उनका उचित राज्य सौंपना, ताकि राज्य-शांति और यश दोनों सुरक्षित रहें। विदुर का वचन ‘राजनीति’ नहीं, ‘धर्मनीति’ बनकर खड़ा होता है। → धृतराष्ट्र विदुर की बात सुनकर किस ओर झुकेगा—पुत्रमोह की ओर या धर्म की ओर? दरबार के द्वार खुलेंगे या सत्य-वक्ता फिर रोका जाएगा?

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ ई श्लोक मिलाकर कुल ३९ ६ श्लोक हैं।] भीकम (2 अमान (प्रजागरपर्व) त्रयस्त्रिंशो 5 थ्याय:- धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद वैशम्पायन उवाच द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपति: । विदुरं द्रष्टमिच्छामि तमिहानय मा चिरम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—মহাপ্রাজ্ঞ ভূমিপতি ধৃতরাষ্ট্র দ্বারস্থকে বললেন, “আমি বিদুরকে দেখতে চাই; তাকে এখানে তৎক্ষণাৎ নিয়ে এসো, বিলম্ব কোরো না।”

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! [संजयके चले जानेपर] महाबुद्धिमान्‌ राजा धृतराष्ट्रने द्वारपालसे कहा--'मैं विदुरसे मिलना चाहता हूँ। उन्हें यहाँ शीघ्र बुला लाओ' ।। प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूत: क्षत्तारमब्रवीत्‌ । ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति,विदुर और धृतराष्ट्र धृतराष्ट्रका भेजा हुआ वह दूत जाकर विदुरसे बोला--“महामते! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं!

বৈশম্পায়ন বললেন—ধৃতরাষ্ট্রের প্রেরিত দূত গিয়ে কক্ষাধ্যক্ষ বিদুরকে বলল, “হে মহামতি, আমাদের স্বামী মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র আপনাকে দেখতে চান।”

Verse 3

एवमुक्तस्तु विदुर: प्राप्प राजनिवेशनम्‌ | अब्रवीद्‌ धृतराष्ट्राय द्वा:स्थ मां प्रतिवेदय,उसके ऐसा कहनेपर विदुरजी राजमहलके पास जाकर बोले--*द्वारपाल! धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दे दो”

এভাবে সম্বোধিত হয়ে বিদুর রাজপ্রাসাদে গিয়ে দ্বাররক্ষীকে বললেন— “ধৃতরাষ্ট্রকে আমার আগমনের সংবাদ দাও।”

Verse 4

द्वाःस्थ उवाच विदुरो$यमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात्‌ | द्रष्टमिच्छति ते पादौ कि करोतु प्रशाधि माम्‌,द्वारपालने जाकर कहा--महाराज! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं। मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय?

দ্বাররক্ষী বলল— “মহারাজ! আপনার আদেশে বিদুর এখানে উপস্থিত হয়েছেন। তিনি আপনার চরণ দর্শন করতে চান। আদেশ করুন, আমি কী করব?”

Verse 5

धृतराष्ट उवाच प्रवेशय महाप्राज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम्‌ अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने,धृतराष्ट्रने कहा--महाबुद्धिमान्‌ दूरदर्शी विदुरको भीतर ले आओ, मुझे इस विदुरसे मिलनेमें कभी भी अड़चन नहीं है

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— “মহাপ্রাজ্ঞ, দূরদর্শী বিদুরকে ভিতরে প্রবেশ করাও। বিদুরের সঙ্গে সাক্ষাতে আমার কখনও কোনো বাধা নেই।”

Verse 6

द्वाःस्थ उवाच प्रविशान्त:पुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमत: । नहि ते दर्शनेडकल्पो जातु राजाब्रवीद्धि माम्‌,द्वारपाल विदुरके पास आकर बोला--विदुरजी! आप बुद्धिमान्‌ महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरमें प्रवेश कीजिये। महाराजने मुझसे कहा है कि मुझे विदुरसे मिलनेमें कभी अड़चन नहीं है

দ্বাররক্ষী বিদুরকে বলল— “হে ক্ষত্তর! প্রজ্ঞাবান মহারাজের অন্তঃপুরে প্রবেশ করুন। রাজা আমাকে বলেছেন, আপনার দর্শনে কখনও কোনো নিষেধ নেই।”

Verse 7

वैशम्पायन उवाच तत:ः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम्‌ । अब्रवीत्‌ प्राञ्जलिवरवक्यं चिन्तयानं नराधिपम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्रके महलके भीतर जाकर चिन्तामें पड़े हुए राजासे हाथ जोड़कर बोले--

বৈশম্পায়ন বললেন— তারপর বিদুর ধৃতরাষ্ট্রের নিবাসে প্রবেশ করে, চিন্তায় নিমগ্ন নরাধিপকে করজোড়ে সম্বোধন করলেন।

Verse 8

विदुरो<हं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात्‌ । यदि किंचन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम्‌,“महा प्राज्ञ! मैं विदुर हूँ, आपकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ। यदि मेरे करनेयोग्य कुछ काम हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा कीजिये”

বৈশম্পায়ন বললেন— “মহাপ্রাজ্ঞ! আমি বিদুর; আপনার আদেশে এখানে এসেছি। যদি আমার করণীয় কোনো কাজ থাকে, আমি প্রস্তুত; আমাকে নির্দেশ দিন।”

Verse 9

धृतराष्ट उवाच संजयो विदुर प्राज्ञो गहयित्वा च मां गतः । अजाततशत्रो: श्वो वाक्‍्यं सभामध्ये स वक्ष्यति,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! बुद्धिमान्‌ संजय आया था, वह मुझे बुरा-भला कहकर चला गया है। कल सभामें वह अजातशत्रु युधिष्ठिरके वचन सुनायेगा

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— “বিদুর! প্রাজ্ঞ সঞ্জয় এসে আমাকে তিরস্কার করে চলে গেছে। আগামীকাল সভামধ্যে সে অজাতশত্রু (যুধিষ্ঠির)-এর বার্তা—তার বাক্য—উচ্চারণ করবে।”

Verse 10

तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया । तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत्‌ प्रजागरम्‌,आज मैं उस कुरुवीर युधिष्ठिरकी बात न जान सका--यही मेरे अंगोंको जला रहा है और इसीने मुझे अबतक जगा रखा है

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— “আজও আমি সেই কুরুবীর (যুধিষ্ঠির)-এর বাক্যের মর্ম বুঝতে পারিনি। সেই ব্যর্থতাই আমার অঙ্গপ্রত্যঙ্গ দগ্ধ করছে, আর সেটাই আমাকে এতক্ষণ জাগিয়ে রেখেছে।”

Verse 11

जाग्रतो दहुमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि । तद्‌ ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो हासि,तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जग रहा हूँ। मेरे लिये जो कल्याणकी बात समझो, वह कहो; क्योंकि हमलोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— “বৎস! আমি উদ্বেগে দগ্ধ হয়ে জেগে আছি। আমার জন্য যা কল্যাণকর বলে তুমি দেখ, তাই বলো; কারণ আমাদের মধ্যে তুমিই ধর্ম ও অর্থের জ্ঞানে নিপুণ।”

Verse 12

यतः प्राप्त: संजय: पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनस: प्रशान्तिः । सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि कि वक्ष्यतीत्येव मेडद्य प्रचिन्‍्ता,संजय जबसे पाण्डवोंके यहाँसे लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भारी चिन्ता हो रही है

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— “পাণ্ডবদের কাছ থেকে সঞ্জয় ফিরে আসার পর থেকে আমার মনে যথার্থ শান্তি নেই। আমার সব ইন্দ্রিয় অস্থির ও বিপর্যস্ত। আগামীকাল সে কী বলবে—এই চিন্তাই আজ আমাকে ভারীভাবে পীড়া দিচ্ছে।”

Verse 13

विदुर उवाच अभियुक्त बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्‌ | हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागरा:,विदुरजी बोले--राजन! जिसका बलवानके साथ विरोध हो गया है, उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको, जिसका सब कुछ हर लिया गया है, उसको, कामीको तथा चोरको रातमें नींद नहीं आती

বিদুর বললেন—হে রাজন! যে দুর্বল ব্যক্তি শক্তিশালী প্রতিদ্বন্দ্বীর দ্বারা অভিযুক্ত/চ্যালেঞ্জিত, যে সম্পদ-সাধনহীন, যার ধন হরণ হয়েছে, যে কামাসক্ত, এবং যে চোর—এদের সকলেরই রাত্রিতে নিদ্রা আসে না।

Verse 14

कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोडसि नराधिप । कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन्‌ न परितप्यसे,नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान्‌ दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप वष्ट नहीं पा रहे हैं?

বিদুর বললেন—হে নরাধিপ! এই মহাদোষগুলি কি আপনাকে স্পর্শ করেনি? আর পরের ধনে লোভ করে কি আপনি অন্তরে দগ্ধ হচ্ছেন না তো?

Verse 15

धृतराष्ट उवाच श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्य पर॑ं नै:श्रेयसं वच: । अस्मिन्‌ राजर्षिवंशे हि त्वमेकः: प्राज्ञलसम्मत:,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करनेवाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस राजर्षिवंशमें केवल तुम्हीं विद्वानोंक भी माननीय हो

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“বিদুর! আমি তোমার ধর্মসম্মত ও পরম কল্যাণকর বাক্য শুনতে চাই। কারণ এই রাজর্ষি-বংশে জ্ঞানীরা একমাত্র তোমাকেই প্রকৃত প্রজ্ঞাবান বলে মান্য করেন।”

Verse 16

विदुर उवाच (राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत्‌ । प्रेष्यस्ते प्रेषितश्वैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिर: ।। विदुरजी बोले--महाराज धुृतराष्ट्र! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके विपरीततरकश्न त्वं भागधेये न सम्मतः । आर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविद: ।। आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंकी ज्योतिसे हीन होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई। आनृशंस्यादनुक्रोशाद्‌ धर्मात्‌ सत्यात्‌ पराक्रमात्‌ । गुरुत्वात्‌ त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून्‌ क्लेशांस्तितिक्षते ।। युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम है; वे आपकमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सदगुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं। दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ।। आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियोंपर राज्यका भार रखकर कैसे कल्याण चाहते हैं? आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ।। ) अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान, उद्योग, दुःख सहनेकी शक्ति और धर्ममें स्थिरता--ये गुण जिस मनुष्यको पुरुषार्थसे च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है। निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिक: श्रद्धधान एतत्‌ पण्डितलक्षणम्‌,जो अच्छे कर्मोका सेवन करता और बुरे कर्मोसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सदगुण पण्डित होनेके लक्षण हैं

বিদুর বললেন—“হে মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র! যুধিষ্ঠির রাজোচিত শ্রেষ্ঠ লক্ষণে ভূষিত; এমন রাজা যেন ত্রিলোকের অধিপতি হয়। তিনি আপনার অনুগত সেবক এবং আপনার আদেশেই চলেন—তবু আপনি তাঁকে প্রতিপক্ষের মতো গণ্য করেছেন।”

Verse 17

क्रोधो हर्षश्न दर्पश्ष ही: स्तम्भो मान्यमानिता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते,क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्ण्डता तथा अपनेको पूज्य समझना--ये भाव जिसको पुरुषार्थसे भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है

বিদুর বললেন—ক্রোধ, হর্ষ, দম্ভ, লজ্জা, জেদ এবং সম্মান-প্রত্যাশাজনিত আত্মগর্ব—এগুলি যাকে তার লক্ষ্য ও ধর্মাচরণ থেকে টলাতে পারে না, সেই-ই প্রকৃত পণ্ডিত।

Verse 18

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्र वा मन्त्रितं परे । कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते,दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहलेसे किये हुए विचारको नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है

যার করণীয়, পরামর্শ বা পূর্ব-পরিকল্পনা অন্যেরা জানে না, কাজ সম্পন্ন হলে তবেই জানে—সেই-ই সত্য পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 19

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रति: । समृद्धिरसमृद्धिर्वां स वै पण्डित उच्यते,सर्दी-गरमी, भय-अनुराग, सम्पत्ति अथवा दरिद्रता--ये जिसके कार्यमें विघ्न नहीं डालते, वही पण्डित कहलाता है

শীত-উষ্ণ, ভয়-আসক্তি, সমৃদ্ধি বা দারিদ্র্য—এগুলি যার কর্মে বাধা দেয় না, সেই-ই সত্য পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 20

यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते । कामादर्थ वृणीते य: स वै पण्डित उच्यते,जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करती है और जो भोगको छोड़कर पुरुषार्थका ही वरण करता है, वही पण्डित कहलाता है

যার সংসার-চালিত বুদ্ধি ধর্ম ও অর্থেরই অনুসরণ করে, এবং যে কামনা-সুখ ত্যাগ করে অর্থপূর্ণ পুরুষার্থ বেছে নেয়—সেই-ই পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 21

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते । न किंचिदवमन्यन्ते नरा: पण्डितबुद्धय:

পণ্ডিতবুদ্ধি মানুষ নিজের সামর্থ্য অনুযায়ী কাজ করতে চায় এবং সেই সামর্থ্য অনুযায়ীই করে; তারা কোনো কিছু বা কাউকে তুচ্ছ জ্ঞান করে অবমাননা করে না।

Verse 22

विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथा किसी वस्तुको तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना नहीं करते,क्षिप्रं विजानाति चिरं शुणोति विज्ञाय चार्थ भजते न कामात्‌ । नासम्पृष्टो व्युपयुद्धक्ते परार्थे तत्‌ प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य विद्वान्‌ पुरुष किसी विषयको देरतक सुनता है; किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धिसे पुरुषार्थमें प्रवृत्त होता है--कामनासे नहीं, बिना पूछे दूसरेके विषयमें व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डितकी मुख्य पहचान है

পণ্ডিত ব্যক্তি কোনো বিষয় দীর্ঘক্ষণ শোনে, কিন্তু দ্রুতই বুঝে ফেলে। বুঝে নিয়ে সে কামনা থেকে নয়, কর্তব্যবুদ্ধি থেকে কল্যাণকর পুরুষার্থে প্রবৃত্ত হয়। আর না জিজ্ঞাসিত হয়ে অন্যের বিষয়ে বৃথা কথা বলে না—এটাই পণ্ডিতের প্রধান লক্ষণ।

Verse 23

नाप्राप्यमभिवाउछन्ति नष्ट नेच्छन्ति शोचितुम्‌ । आपत्सु च न मुहान्ति नरा: पण्डितबुद्धय:,पण्डितोंकी-सी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभ वस्तुकी कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तुके विषयमें शोक करना नहीं चाहते और विपत्तिमें पड़कर घबराते नहीं हैं

পণ্ডিতবুদ্ধিসম্পন্ন মানুষ অপ্রাপ্য বস্তুর আকাঙ্ক্ষা করে না; যা হারিয়ে গেছে তার জন্য শোক করতে চায় না; আর বিপদে পড়লেও বিচলিত হয় না।

Verse 24

निश्चित्य यः प्रक्रमते नानतर्वसति कर्मण: । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते,जो पहले निश्चय करके फिर कार्यका आरम्भ करता है, कार्यके बीचमें नहीं रुकता, समयको व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्तको वशमें रखता है, वही पण्डित कहलाता है

যে আগে স্থির সিদ্ধান্ত করে তারপর কাজে প্রবৃত্ত হয়, কর্মের মাঝপথে থেমে যায় না, সময় বৃথা নষ্ট করে না, এবং নিজের মনকে বশে রাখে—সেই-ই পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 25

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते । हित॑ च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठ कर्मोमें रुचि रखते हैं, उन्नतिके कार्य करते हैं तथा भलाई करनेवालोंमें दोष नहीं निकालते

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পণ্ডিতেরা আর্য-ধর্মসম্মত শ্রেষ্ঠ কর্মে আসক্ত থাকে, উন্নতি ও সমৃদ্ধির কর্ম করে, এবং পরহিতকারীদের প্রতি দোষারোপ বা ঈর্ষা করে না।

Verse 26

न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तृप्यते । गाड़ो हृद इवाक्षोभ्यो य: स पण्डित उच्यते,जो अपना आदर होनेपर हर्षके मारे फ़ूल नहीं उठता, अनादरसे संतप्त नहीं होता तथा गंगाजीके हृद (गहरे गर्त)-के समान जिसके चित्तको क्षोभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है

যে নিজের সম্মান পেলে উল্লসিত হয়ে ওঠে না, অন্যের অপমানে অন্তরে তৃপ্ত হয় না, এবং যার চিত্ত গভীর হ্রদের মতো অচঞ্চল ও অক্ষুব্ধ থাকে—সেই পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 27

तत्त्वज्ञ: सर्वभूतानां योगज्ञ: सर्वकर्मणाम्‌ । उपायज्ञो मनुष्याणां नर: पण्डित उच्यते,जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थोकी असलियतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढ़कर उपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है

যে সকল জীবের তত্ত্ব জানে, সকল কর্মের যোগ—অর্থাৎ যথাযথ বিধি ও শৃঙ্খলা—বোঝে, এবং মানুষের মধ্যে উপায়-জ্ঞানেও শ্রেষ্ঠ—সেই মানুষ পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 28

प्रवृत्तवाक्‌ चित्रकथ ऊहवान्‌ प्रतिभानवान्‌ | आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते,जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं, जो विचित्र ढंगसे बातचीत करता है, तर्कमें निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थके तात्पर्यको शीघ्र बता सकता है, वह पण्डित कहलाता है

যার বাক্য অবিরাম প্রবাহিত, যে বিচিত্র ভঙ্গিতে যথাযথ দৃষ্টান্তসহ কথা বলতে পারে, যে তর্কে পারদর্শী ও তীক্ষ্ণবুদ্ধিসম্পন্ন, এবং যে গ্রন্থের তাত্পর্য দ্রুত প্রকাশ করতে পারে—তাকেই পণ্ডিত বলা হয়।

Verse 29

श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा । असम्भिन्नार्यमर्याद: पण्डिताख्यां लभेत सः,जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है और बुद्धि विद्याका तथा जो शिष्ट पुरुषोंकी मर्यादाका उल्लंघन नहीं करता, वही पण्डितकी संज्ञा पा सकता है

যার বিদ্যা প্রজ্ঞার অনুসারী এবং যার প্রজ্ঞা আবার বিদ্যার অনুসারী; যে ভদ্রজনের আচরণ-সীমা লঙ্ঘন করে না—সেই পণ্ডিত-নামে অভিহিত হওয়ার যোগ্য।

Verse 30

अश्रुतश्न समुन्नद्धो दरिद्रश्न महामना: । अर्थाश्वाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधै:,बिना पढ़े ही गर्व करनेवाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनोरथ करनेवाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको पण्डितलोग मूर्ख कहते हैं

যে অশিক্ষিত হয়েও অহংকারে ফেঁপে ওঠে, যে দরিদ্র হয়েও মহৎ মহৎ বাসনা পোষে, এবং যে কর্ম না করেই অর্থ পেতে চায়—বুদ্ধিমানরা তাকে ‘মূঢ়’ বলে।

Verse 31

स्वमर्थ यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति । मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च॒ मूढ: स उच्यते,जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरेके कर्तव्यका पालन करता है तथा मित्रके साथ असत्‌ आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है

যে নিজের কর্তব্য ত্যাগ করে অন্যের কর্তব্য পালন করে, এবং যে বন্ধুর জন্যও মিথ্যা আচরণ করে—তাকে মূঢ় বলা হয়।

Verse 32

अकामान्‌ कामयति य: कामयानान्‌ परित्यजेत्‌ | बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूडचेतसम्‌,जो न चाहनेवालोंको चाहता है और चाहनेवालोंको त्याग देता है तथा जो अपनेसे बलवानके साथ वैर बाँधता है, उसे मूढ़ विचारका मनुष्य कहते हैं

যে অনিচ্ছুকদের অনুরাগ করে, আর যারা সত্যিই অনুরাগী তাদের ত্যাগ করে; এবং যে নিজের চেয়ে বলবান ব্যক্তির সঙ্গে বৈর বাঁধে—তাকে মূঢ়চিত্ত বলা হয়।

Verse 33

अमित्र कुरुते मित्र मित्र द्वेष्टि हिनस्ति च । कर्म चारभते दुष्ट तमाहुर्मूठडचेतसम्‌,जो शत्रुको मित्र बनाता और मित्रसे द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मोका आरम्भ किया करता है, उसे मूढ़ चित्तवाला कहते हैं इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये त्रय॒स्त्रिंशो ध्याय: ।। ३३ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

যে শত্রুকে বন্ধু করে তোলে, অথচ নিজের সত্য বন্ধুকে দ্বেষ করে তাকে আঘাত করে, এবং বারবার দুষ্কর্মে প্রবৃত্ত হয়—তাকে মূঢ়চিত্ত বলা হয়।

Verse 34

संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते । चिरं करो ति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ। जो अपने कामोंको व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र संदेह करता है तथा शीघ्र होनेवाले काममें भी देर लगाता है, वह मूठ है

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে অকারণে নিজের কাজ টেনে বাড়ায়, সর্বত্র সন্দেহ করে, এবং যা দ্রুত করা উচিত তাতেও দেরি করে—সে মূঢ়।

Verse 35

श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि न चार्चति । सुहन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूठडचेतसम्‌,जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद्‌ मित्र नहीं मिलता, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं

যে পিতৃদের উদ্দেশে শ্রাদ্ধ দেয় না, দেবতাদের পূজা করে না, এবং যে সৎহৃদয় বন্ধু লাভ করতে পারে না—তাকে মূঢ়চিত্ত বলা হয়।

Verse 36

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते । अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधम:,मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्यपर भी विश्वास करता है

মূঢ়চিত্ত অধম ব্যক্তি ডাকা না থাকলেও ভিতরে ঢুকে পড়ে, জিজ্ঞেস না করলেও অনেক কথা বলে, এবং অবিশ্বাস্য লোকের উপরও বিশ্বাস স্থাপন করে।

Verse 37

परं क्षिपति दोषेण वर्तमान: स्वयं तथा | यश्च क्रुध्यत्यनीशान: स च मूढतमो नर:,स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरेपर उसके दोष बताकर आशक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थका क्रोध करता है, वह मनुष्य महामूर्ख है

যে নিজে দোষে বর্তমান থেকেও অন্যের দোষ দেখিয়ে তাকে নিন্দা করে, এবং যে অক্ষম হয়েও বৃথা ক্রোধ করে—সে মানুষ মহামূঢ়।

Verse 38

आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम्‌ | अलभ्यमिच्छन्‌ नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरिहोच्यते

যে নিজের শক্তি না জেনে, ধর্ম ও অর্থ ত্যাগ করে, অপ্রাপ্য বস্তু কামনা করে এবং কর্মবিমুখ হয়—সে এখানে মূঢ়বুদ্ধি বলে কথিত।

Verse 39

जो अपने बलको न समझकर बिना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसारमें मूढबुद्धि कहलाता है ।। अशिष्यं शास्ति यो राजन्‌ यश्च शून्यमुपासते- । कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मूठडचेतसम्‌,राजन! जो अनधिकारीको उपदेश देता और शून्यकी उपासना करता है तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं

যে নিজের শক্তি না বুঝে, প্রয়োজনীয় কর্ম না করে, ধর্ম ও অর্থের বিরুদ্ধ এবং অপ্রাপ্য বস্তু কামনা করে—সে এই জগতে মূঢ়বুদ্ধি বলে পরিচিত। আর হে রাজন, যে অযোগ্য শিষ্যকে উপদেশ দেয়, যে শূন্যের উপাসনা করে, এবং যে কৃপণের আশ্রয় নেয়—তাকও মূঢ়চিত্ত বলা হয়।

Verse 40

अर्थ महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा | विचरत्यसमुन्नद्धों यः स पण्डित उच्यते,जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नहीं चलता, वह पण्डित कहलाता है

যে মহাধন, বিদ্যা বা ঐশ্বর্য লাভ করেও অহংকারহীনভাবে বিচরণ করে—সেই পণ্ডিত বলে কথিত।

Verse 41

एक: सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्न॒ शोभनम्‌ | यो5संविभज्य भृत्येभ्य: को नृशंसतरस्तत:,जो अपनेद्वारा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंको बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन करता और अच्छा वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन होगा?

যে সমৃদ্ধ হয়েও, নিজের আশ্রিতদের সঙ্গে ভাগ না করে একাই উৎকৃষ্ট আহার করে ও সুন্দর বস্ত্র পরে—তার চেয়ে অধিক নিষ্ঠুর আর কে হতে পারে?

Verse 42

एक: पापानि कुरुते फल भुड्क्ते महाजन: । भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते,मनुष्य अकेला पाप कर (-के धन कमा)-ता है और (उस धनका) उपभोग बहुत-से लोग करते हैं। उपभोग करनेवाले तो दोषसे छूट जाते हैं, पर उसका कर्ता दोषका भागी होता है

পাপকর্ম একজনই করে, কিন্তু তার ফল বহুজন ভোগ করে। ভোগকারীরা দোষ থেকে মুক্ত হয়ে যায়, আর কর্তা দোষে লিপ্ত থাকে।

Verse 43

एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्‌ राष्ट्र सराजकम्‌,किसी धनुर्धर वीरके द्वारा छोड़ा हुआ बाण सम्भव है, एकको भी मारे या न मारे। परन्तु बुद्धिमानद्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्रका विनाश कर सकती है

দক্ষ ধনুর্ধরের ছোড়া একটিমাত্র তীর একজনকে মারতে পারে—অথবা নাও মারতে পারে। কিন্তু প্রকৃত বুদ্ধিমান যে বুদ্ধি প্রয়োগ করে, তা রাজাসহ সমগ্র রাষ্ট্রকে ধ্বংস করতে সক্ষম।

Verse 44

एकयाद्े विनिश्िव्य त्री क्षतुर्भिवेशे कुरु । पजञ्च जित्वा विदित्वा षट्‌ सप्त हित्वा सुखी भव,एक (बुद्धि)-से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य)का निश्चय करके चार (साम, दान, भेद, दण्ड)-से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन)-को वशमें कीजिये। पाँच (इन्द्रियों)-को जीतकर छः (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप) गुणोंको जानकर तथा सात (स्त्री, जूआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्डकी कठोरता और अन्यायसे धनोपार्जन)-को छोड़कर सुखी हो जाइये

একাগ্র বুদ্ধি দিয়ে আগে দুইটি নির্ণয় করো—কর্তব্য ও অকর্তব্য। তারপর চার উপায়ে (সাম, দান, ভেদ, দণ্ড) তিন প্রকার লোককে (শত্রু, মিত্র, উদাসীন) বশে আনো। পাঁচ ইন্দ্রিয় জয় করো, রাষ্ট্রনীতির ছয় গুণ (সন্ধি, বিগ্রহ, যান, আসন, দ্বৈধীভাব, সমাশ্রয়) জেনে নাও, আর সাত ব্যসন ত্যাগ করে সুখী হও।

Verse 45

एक॑ विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्न वध्यते । सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति राजानं मन्त्रविप्लव:,विषका रस एक (पीनेवाले)-को ही मारता है, शस्त्रसे एकका ही वध होता है; किंतु (गुप्त) मन्त्रणाका प्रकाशित होना राष्ट्र और प्रजाके साथ ही राजाका भी विनाश कर डालता है

বিষের রস কেবল পানকারী একজনকেই মারে, অস্ত্রেও একজনই নিহত হয়; কিন্তু গোপন পরামর্শ ভেঙে পড়া বা ফাঁস হয়ে যাওয়া রাজাসহ রাষ্ট্র ও প্রজাকে ধ্বংস করে।

Verse 46

एक: स्वादु न भुज्जीत एकश्चार्थान्‌ न चिन्तयेत्‌ । एको न गच्छेदध्वानं नैक: सुप्तेषु जागूयात्‌,अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेला किसी विषयका निश्चय न करे, अकेला रास्ता न चले और बहुत-से लोग सोये हों तो उनमें अकेला न जागता रहे

একলা সুস্বাদু ভোজন করবে না, একলা গুরুত্বপূর্ণ বিষয়ে চিন্তা-পরামর্শ করবে না, একলা পথে চলবে না, আর অনেকেই ঘুমিয়ে থাকলে তাদের মধ্যে একলা জেগে থাকবে না।

Verse 47

एकमेवाद्धितीयं तद्‌ यद्‌ राजन्‌ नावबुध्यसे । सत्यं स्वर्गस्यथ सोपानं पारावारस्य नौरिव,राजन! जैसे समुद्रके पार जानेके लिये नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्गके लिये सत्य ही एकमात्र सोपान है, दूसरा नहीं; किंतु आप इसे नहीं समझ रहे हैं

রাজন! একটি কথাই—দ্বিতীয় নেই—আপনি বুঝতে পারছেন না: যেমন সমুদ্র পার হতে নৌকাই একমাত্র অবলম্বন, তেমনি স্বর্গলাভের একমাত্র সোপান হলো সত্য।

Verse 48

एक: क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते | यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्‍न्यते जन:

বিদুর বললেন—ক্ষমাশীলদের মধ্যে একটিই দোষ গণ্য হয়, দ্বিতীয়টি নয়: যে ব্যক্তি ক্ষমায় যুক্ত, লোকেরা তাকে দুর্বল মনে করে। এইভাবে ক্ষমার গুণকেই জগৎ প্রায়ই শক্তিহীনতা বলে ভুল বোঝে।

Verse 49

क्षमाशील पुरुषोंमें एक ही दोषका आरोप होता है, दूसरेकी तो सम्भावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्यको लोग असमर्थ समझ लेते हैं ।। सो<स्य दोषो न मन्तव्य: क्षमा हि परमं बलम्‌ | क्षमा गुणो हाशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा,किंतु क्षमाशील पुरुषका वह दोष नहीं मानना चाहिये; क्योंकि क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्योंका गुण तथा समर्थोका भूषण है

বিদুর বললেন—ক্ষমাশীল ব্যক্তির সেই ‘দোষ’কে দোষ বলে গণ্য করা উচিত নয়; কারণ ক্ষমাই পরম বল। অক্ষমের কাছে ক্ষমা গুণ, আর সক্ষমের কাছে ক্ষমাই অলংকার—শক্তিকে ধর্মে সংযত রাখে।

Verse 50

क्षमा वशीकृतिलेोंके क्षमया कि न साध्यते । शान्तिखड्ग: करे यस्य कि करिष्यति दुर्जन:,इस जगत्‌में क्षमा वशीकरणरूप है। भला, क्षमासे क्‍या नहीं सिद्ध होता? जिसके हाथमें शान्तिरूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लेंगे?

বিদুর বললেন—এই জগতে ক্ষমা হৃদয় জয় করার শক্তি; ক্ষমা দিয়ে কী অসাধ্য? যার হাতে শান্তিরূপী খড়্গ, দুষ্টজন তার কীই বা করতে পারে?

Verse 51

अतृणे पतितो वदह्नलिः स्वयमेवोपशाम्यति | अक्षमावान्‌ परं दोषैरात्मानं चैव योजयेत्‌,तृणरहित स्थानमें गिरी हुई आग अपने-आप बुझ जाती है। क्षमाहीन पुरुष अपनेको तथा दूसरेको भी दोषका भागी बना लेता है

বিদুর বললেন—ঘাসহীন স্থানে পড়া আগুন আপনিই নিভে যায়; কিন্তু যে ক্ষমাহীন, সে নিজেকেও এবং অন্যকেও দোষে জড়িয়ে ফেলে।

Verse 52

एको धर्म: परं श्रेय: क्षमैका शान्तिरुत्तमा । विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसेका सुखावहा,केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शान्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देनेवाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देनेवाली है

বিদুর বললেন—একটিই ধর্ম পরম কল্যাণ; শান্তির শ্রেষ্ঠ উপায় একমাত্র ক্ষমা। পরম তৃপ্তি দেয় একমাত্র বিদ্যা, আর সুখ আনে একমাত্র অহিংসা।

Verse 53

(पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ । गृहस्थश्न निरारम्भ: सारम्भश्नैव भिक्षुकः ।। ) समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीमें ये दो प्रकारके अधम पुरुष हैं--अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मोमें लगा हुआ संन्यासी। द्वाविमौ ग्रसते भूमि: सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्‌,बिलमें रहनेवाले जीवोंको जैसे साँप खा जाता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी शत्रुसे विरोध न करनेवाले राजा और परदेश सेवन न करनेवाले ब्राह्मण--इन दोनोंको खा जाती है

বিদুর বললেন—সমুদ্র-পর্যন্ত এই পৃথিবীতে দুই প্রকার অধম পুরুষ আছে: এক, যে গৃহস্থ কোনো উদ্যোগ করে না; আর দুই, যে ভিক্ষুক-সন্ন্যাসী সংসারী কর্মে ব্যস্ত থাকে। যেমন গর্তবাসী প্রাণীদের সাপ গ্রাস করে, তেমনি পৃথিবীও দুই জনকে গ্রাস করে—যে রাজা শত্রুর প্রতিরোধ করে না, এবং যে ব্রাহ্মণ কর্তব্য হলে বিদেশে (অধ্যয়ন, শিক্ষা বা জীবিকার জন্য) গমন করে না।

Verse 54

द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिललोके विरोचते । अब्रुवन्‌ परुषं किंचिदसतो<नर्चयंस्तथा,जरा भी कठोर न बोलना और दुष्ट पुरुषोंका आदर न करना--इन दो कर्मोंका करनेवाला मनुष्य इस लोकमें विशेष शोभा पाता है

বিদুর বললেন—মানুষ এই জগতে দুইটি আচরণে বিশেষ দীপ্তি লাভ করে: (১) সামান্যও কঠোর বাক্য না বলা, এবং (২) অসৎ ও দুষ্ট লোককে সম্মান না করা।

Verse 55

द्वाविमौ पुरुषव्याप्र परप्रत्ययकारिणौ । स्त्रियः कामितकामिन्यो लोक: पूजितपूजक:,दूसरी स्त्रीद्वारा चाहे गये पुरुषकी कामना करनेवाली स्त्रियाँ तथा दूसरोंके द्वारा पूजित मनुष्यका आदर करनेवाले पुरुष--ये दो प्रकारके लोग दूसरोंपर विश्वास करके चलनेवाले होते हैं

হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! দুই প্রকার লোক পরের বিশ্বাস ও ভরসায় চলে: (১) যে নারীরা অন্য নারীর কাম্য পুরুষকেই কামনা করে, এবং (২) যে পুরুষেরা লোকের দ্বারা পূর্বেই পূজিত ব্যক্তিকেই পূজা করে।

Verse 56

द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणौ । यश्चाधन: कामयते यश्च कुप्यत्यनी श्वरः,जो निर्धन होकर भी बहुमूल्य वस्तुकी इच्छा रखता और असमर्थ होकर भी क्रोध करता है--ये दोनों ही अपने लिये तीक्ष्ण काँटोंके समान हैं एवं अपने शरीरको सुखानेवाले हैं

বিদুর বললেন—দুটি বিষয় তীক্ষ্ণ কাঁটার মতো, যা দেহকে শুষ্ক করে দেয়: (১) যে দরিদ্র হয়েও দামী বস্তু কামনা করে, এবং (২) যে ক্ষমতাহীন হয়েও ক্রোধে ফেটে পড়ে। উভয়েই নিজেরই দেহবল ক্ষয় করে।

Verse 57

द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । गृहस्थश्व निरारम्भ: कार्यवांश्वैव भिक्षुक:

বিদুর বললেন—নিজ নিজ কর্তব্যের বিপরীত কর্ম করলে কেবল দুই জনই শোভা পায় না: উদ্যোগহীন গৃহস্থ এবং সংসারী কাজে ব্যস্ত ভিক্ষুক। আশ্রমধর্ম উল্টে দিলে উভয়েরই মর্যাদা ক্ষয় হয়।

Verse 58

दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते--अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंचमें लगा हुआ संन्यासी ।। द्वाविमौ पुरुषौ राजन्‌ स्वर्गस्योपरि तिष्ठत: । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्न प्रदानवान्‌,राजन! ये दो प्रकारके पुरुष स्वर्गके भी ऊपर स्थान पाते हैं--शक्तिशाली होनेपर भी क्षमा करनेवाला और निर्धन होनेपर भी दान देनेवाला

বিদুর বললেন—হে রাজন, দুই প্রকার পুরুষ স্বর্গেরও ঊর্ধ্বে স্থান লাভ করে—যিনি শক্তিমান হয়েও ক্ষমাশীল, এবং যিনি দরিদ্র হয়েও দানশীল।

Verse 59

न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ । अपात्रे प्रतिपत्तिश्व पात्रे चाप्रतिपादनम्‌,न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए धनके दो ही दुरुपयोग समझने चाहिये--अपात्रको देना और सत्पात्रको न देना

ন্যায়পথে অর্জিত ধনের দুইটিই প্রধান অপব্যবহার—অপাত্রকে দান করা, আর যোগ্য পাত্রকে না দেওয়া।

Verse 60

द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्‌ | धनवन्तमदातारं दरिद्रंं चातपस्विनम्‌,जो धनी होनेपर भी दान न दे और दरिद्र होनेपर भी कष्ट सहन न कर सके--इन दो प्रकारके मनुष्योंको गलेमें मजबूत पत्थर बाँधकर पानीमें डुबा देना चाहिये

দুই ধরনের মানুষকে গলায় ভারী পাথর বেঁধে জলে ডুবিয়ে দেওয়া উচিত—যে ধনী হয়েও দান করে না, আর যে দরিদ্র হয়েও তপস্যার মতো কষ্ট সহ্য করতে পারে না।

Verse 61

द्वाविमौ पुरुषव्याप्र सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड्‌ योगयुक्तश्व रणे चाभिमुखो हत:,पुरुषश्रेष्ठ) ये दो प्रकारके पुरुष सूर्यमण्डलको भेदकर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होते हैं-- योगयुक्त संन्‍्यासी और संग्राममें शत्रुओंके सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा

হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! দুই ধরনের মানুষ সূর্যমণ্ডল ভেদ করে ঊর্ধ্বগতি লাভ করে—যোগে সংযত পরিব্রাজক সন্ন্যাসী, এবং রণে শত্রুর সম্মুখে যুদ্ধ করতে করতে নিহত বীর।

Verse 62

त्रयो न्‍्याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ । कनीयान्‌ मध्यम: श्रेष्ठ इति वेदविदो विदु:ः,भरतश्रेष्ठ! मनुष्योंकी कार्यसिद्धिके लिये उत्तम, मध्यम और अधम--ये तीन प्रकारके न्यायानुकूल उपाय सुने जाते हैं, ऐसा वेदवेत्ता विद्वान्‌ जानते हैं

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! মানুষের কার্যসিদ্ধির জন্য তিন প্রকার নীতি শোনা যায়—অধম, মধ্যম ও শ্রেষ্ঠ; এ কথা বেদজ্ঞরা জানেন।

Verse 63

त्रिविधा: पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमा: । नियोजयेद्‌ यथावत्‌ तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु,राजन! उत्तम, मध्यम और अधम--ये तीन प्रकारके पुरुष होते हैं; इनको यथायोग्य तीन ही प्रकारके कर्मोमें लगाना चाहिये

বিদুর বললেন—হে রাজন! মানুষ তিন প্রকার—উত্তম, মধ্যম ও অধম। তাদের যোগ্যতা অনুযায়ী যথাবিধি সেই তিন প্রকার কর্মেই নিয়োজিত করা উচিত।

Verse 64

त्रय एवाधना राजन्‌ भार्या दासस्तथा सुत: । यत्‌ ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्‌ धनम्‌,राजन! तीन ही धनके अधिकारी नहीं माने जाते--स्त्री, पुत्र तथा दास। ये जो कुछ कमाते हैं, वह धन उसीका होता है, जिसके अधीन ये रहते हैं

বিদুর বললেন—হে রাজন! তিনজনকে স্বতন্ত্র সম্পত্তির অধিকারী বলা হয় না—স্ত্রী, পুত্র ও দাস। তারা যা কিছু অর্জন করে, তা যার অধীন তারা থাকে, সেই কর্তৃপক্ষেরই ধন বলে গণ্য।

Verse 65

हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम्‌ । सुहृदश्न परित्यागस्त्रयो दोषा: क्षयावहा:,दूसरेके धनका हरण, दूसरेकी स्त्रीका संसर्ग तथा सुहृद्‌ मित्रका परित्याग--ये तीनों ही दोष (मनुष्यके आयु, धर्म तथा कीर्तिका) क्षय करनेवाले होते हैं

বিদুর বললেন—অন্যের ধন হরণ, পরস্ত্রী-অভিগমন, এবং সুহৃদ্‌ বন্ধুকে ত্যাগ—এই তিন দোষ মানুষের আয়ু, ধর্ম ও কীর্তিকে ক্ষয় করে।

Verse 66

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: । काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्‌ त्रयं त्यजेत्‌,काम, क्रोध और लोभ--ये आत्माका नाश करनेवाले नरकके तीन दरवाजे हैं; अतः इन तीनोंको त्याग देना चाहिये

বিদুর বললেন—কাম, ক্রোধ ও লোভ—এগুলি আত্মবিনাশকারী নরকের তিন দ্বার; অতএব এই তিনটিই ত্যাগ করা উচিত।

Verse 67

वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत | शत्रोश्व मोक्षणं कृच्छात्‌ त्रीणि चैके च तत्समम्‌

বিদুর বললেন—হে ভারত! বর দান, রাজ্যলাভ এবং পুত্রজন্ম—এই তিনটি মহাবর বলে গণ্য; কিন্তু কষ্টসাধ্যভাবে শত্রুর বন্ধন থেকে মুক্ত হওয়া—এই একটিই সেই তিনটির সমান।

Verse 68

भारत! वरदान पाना, राज्यकी प्राप्ति और पुत्रका जन्म--ये तीन एक ओर और शत्रुके कष्टसे छूटना--यह एक ओर; वे तीन और यह एक बराबर ही हैं ।। भक्त च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम्‌ | त्रीनेतांश्छरणं प्राप्तान्‌ विषमेडपि न संत्यजेत्‌,भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसा कहनेवाले--इन तीन प्रकारके शरणागत मनुष्योंको संकट पड़नेपर भी नहीं छोड़ना चाहिये

বিদুর বললেন—হে ভারত! বরলাভ, রাজ্যপ্রাপ্তি ও পুত্রজন্ম—এই তিনটি একদিকে; আর শত্রুর উৎপীড়ন থেকে মুক্তি—এটি একদিকে। মূল্যবোধে সেই একটিই ওই তিনটির সমান। অতএব বিপদেও আশ্রয়প্রার্থীদের কখনও ত্যাগ করা উচিত নয়—(১) ভক্ত, (২) সেবক ও রক্ষাপ্রার্থী, এবং (৩) যে প্রকাশ্যে বলে, “আমি তোমারই।”

Verse 69

चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन वर्ज्यान्याहु: पण्डितस्तानि विद्यात्‌ । अल्पप्रज्जैः सह मन्त्र न कुर्या- न्न दीर्घसूत्र रभसैश्चारणैश्व,थोड़ी बुद्धिवाले, दीर्घसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करनेवाले लोगोंके साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। ये चारों महाबली राजाके लिये त्यागनेयोग्य बताये गये हैं। विद्वान पुरुष ऐसे लोगोंको पहचान ले

বিদুর বললেন—মহাবলী রাজার উচিত চার প্রকার লোককে বর্জন করা—এ কথা পণ্ডিতেরা বলেন; বিচক্ষণ ব্যক্তি তাদের চিনে নেবে। অল্পবুদ্ধি, দীর্ঘসূত্রী, হঠকারী এবং চাটুকার—এদের সঙ্গে গোপন পরামর্শ করা উচিত নয়।

Verse 70

चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे । वृद्धो ज्ञातिरवसन्न: कुलीन: सदा दरिद्रो भगिनी चानपत्या,तात! गृहस्थधर्ममें स्थित आप लक्ष्मीवानके घरमें चार प्रकारके मनुष्योंको सदा रहना चाहिये--अपने कुटुम्बका बूढ़ा, संकटमें पड़ा हुआ उच्च कुलका मनुष्य, धनहीन मित्र और बिना संतानकी बहिन

বিদুর বললেন—হে তাত! গৃহস্থধর্মে প্রতিষ্ঠিত সমৃদ্ধ ব্যক্তির গৃহে চার প্রকার লোককে সর্বদা আশ্রয় দেওয়া উচিত—বংশের বৃদ্ধ আত্মীয়, বিপদে পতিত কুলীন ব্যক্তি, সদা দরিদ্র বন্ধু, এবং সন্তানহীনা ভগিনী।

Verse 71

चत्वार्याह महाराज साद्यस्कानि बृहस्पति: । पृच्छते त्रिदशेन्द्राय तानीमानि निबोध मे,महाराज! इन्द्रके पूछनेपर उनसे बृहस्पतिजीने जिन चारोंको तत्काल फल देनेवाला बताया था, उन्हें आप मुझसे सुनिये--

বিদুর বললেন—হে মহারাজ! বৃহস্পতি চারটি কর্মকে তৎক্ষণাৎ ফলদায়ক বলেছেন। ত্রিদশেন্দ্র ইন্দ্র জিজ্ঞাসা করলে তিনি সেগুলি বলেছিলেন। এখন আমার কাছ থেকে সেগুলি শুনুন।

Verse 72

देवतानां च संकल्पमनुभावं च धीमताम्‌ । विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम्‌,देवताओंका संकल्प, बुद्धिमानोंका प्रभाव, विद्वानों-की नम्रनता और पापियोंका विनाश

দেবতাদের অটল সংকল্প, জ্ঞানীদের কার্যকর প্রভাব, সত্যবিদ্যাবানদের বিনয়, এবং পাপকর্মীদের অবশ্যম্ভাবী বিনাশ—এই চারটি জগতে ধর্মের তৎক্ষণাৎ ফলপ্রদ শাসনকে প্রকাশ করে।

Verse 73

चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञ:,चार कर्म भयको दूर करनेवाले हैं; किंतु वे ही यदि ठीक तरहसे सम्पादित न हों, तो भय प्रदान करते हैं। वे कर्म हैं--आदरके साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान

বিদুর বলেন—চারটি কর্ম ভয় নাশ করে; কিন্তু বিধিমতো না হলে সেই কর্মই ভয় ও অনিষ্ট ডেকে আনে। সেগুলি হল—শ্রদ্ধাসহ অগ্নিহোত্র, শ্রদ্ধাসহ মৌন পালন, শ্রদ্ধাসহ স্বাধ্যায় এবং শ্রদ্ধাসহ যজ্ঞ সম্পাদন।

Verse 74

पञ्चाग्नयो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्न भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु-मनुष्यको इन पाँच अग्नियोंकी बड़े यत्नसे सेवा करनी चाहिये

বিদুর উপদেশ দেন—মানুষকে যত্নসহকারে পাঁচ ‘অগ্নি’র সেবা করতে হয়: পিতা, মাতা, গৃহাগ্নি, নিজের আত্মা, এবং গুরু।

Verse 75

पज्चैव पूजयॉँलल्‍लोके यश: प्राप्नोति केवलम्‌ | देवान्‌ पितृन्‌ मनुष्यांश्व भिक्षूनतिथिपठ्चमान्‌,देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि--इन पाँचोंकी पूजा करनेवाला मनुष्य शुद्ध यश प्राप्त करता है

বিদুর বলেন—দেবতা, পিতৃগণ, মানুষ, সন্ন্যাসী-ভিক্ষু এবং অতিথি—এই পাঁচজনকে যে পূজা করে, সে জগতে নির্মল ও অমিশ্র যশ লাভ করে।

Verse 76

पउ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि । मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविन:,राजन्‌! आप जहाँ-जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँ मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रय देनेवाले तथा आश्रय पानेवाले--ये पाँच आपके पीछे लगे रहेंगे

বিদুর বললেন—হে রাজন! আপনি যেখানে-যেখানে যাবেন, সেখানে-সেখানে পাঁচ প্রকার লোক আপনার পিছু নেবে—মিত্র, শত্রু, নিরপেক্ষ, আশ্রয়দাতা এবং আপনার আশ্রয়ে জীবিকা নির্বাহকারী।

Verse 77

पज्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्यच्छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम्‌ । ततोडस्य ख्रवति प्रज्ञा दृते: पात्रादिवोदकम्‌,पाँच ज्ञानेन्द्रियोंवाले पुछुषकी यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र (दोष)-युक्त हो जाय तो उससे उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशकके छेदसे पानी

বিদুর বললেন—পাঁচ ইন্দ্রিয়সম্পন্ন মর্ত্যের যদি একটি ইন্দ্রিয়ও ছিদ্রযুক্ত (দোষগ্রস্ত) হয়, তবে তার প্রজ্ঞা সেখান দিয়ে এমনভাবে ঝরে পড়ে, যেমন ফাটা পাত্র থেকে জল বেরিয়ে যায়।

Verse 78

षड्‌ दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता,ऐश्वर्य या उन्नति चाहनेवाले पुरुषोंको नींद, तन्द्रा (ऊँचना), डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (जल्दी हो जानेवाले काममें अधिक देर लगानेकी आदत)--इन छह: दुर्गुणोंको त्याग देना चाहिये

বিদুর বলেন—যে ব্যক্তি ঐশ্বর্য ও প্রকৃত উন্নতি কামনা করে, তাকে এই ছয় দোষ ত্যাগ করতেই হবে: নিদ্রালুতা, তন্দ্রা, ভয়, ক্রোধ, আলস্য এবং দীর্ঘসূত্রতা।

Verse 79

षडिमान्‌ पुरुषो जह्याद्‌ भिन्नां नावमिवार्णवे | अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम्‌,उपदेश न देनेवाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करनेमें असमर्थ राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, ग्राममें रहनेकी इच्छावाले ग्वाले तथा वनमें रहनेकी इच्छावाले नाई--इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्रकी सैर करनेवाला मनुष्य छिद्रयुक्त नावका परित्याग कर देता है

বিদুর বলেন—সমুদ্রে যেমন ছিদ্রযুক্ত নৌকা ত্যাগ করা হয়, তেমনি মানুষকে এই ছয়জনকে ত্যাগ করা উচিত: যে আচার্য উপদেশ দেন না, যে ঋত্বিজ অধ্যয়ন করে না, যে রাজা রক্ষা করতে অক্ষম, যে স্ত্রী কটু বাক্য বলে, যে গোপাল গ্রামেই থাকতে চায়, এবং যে নাপিত বনে থাকতে চায়।

Verse 80

अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम्‌ | ग्रामकामं च गोपालं वनकाम॑ च नापितम्‌,उपदेश न देनेवाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करनेमें असमर्थ राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, ग्राममें रहनेकी इच्छावाले ग्वाले तथा वनमें रहनेकी इच्छावाले नाई--इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्रकी सैर करनेवाला मनुष्य छिद्रयुक्त नावका परित्याग कर देता है

বিদুর উপদেশ দেন—যে রাজা রক্ষা করতে পারে না, যে স্ত্রী কটু কথা বলে, যে গোপাল গ্রামেই থাকতে চায়, এবং যে নাপিত বনে থাকতে চায়—এদের দ্বিধা না করে ত্যাগ করা উচিত, যেমন সমুদ্রযাত্রায় ছিদ্রযুক্ত নৌকা ত্যাগ করা হয়।

Verse 81

षडेव तु गुणा: पुंसा न हातव्या: कदाचन । सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृति:,मनुष्यको कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणोंमें दोष दिखानेकी प्रवृत्तिका अभाव), क्षमा तथा धैर्य--इन छ: गुणोंका त्याग नहीं करना चाहिये

বিদুর বলেন—মানুষের কখনোই এই ছয় গুণ ত্যাগ করা উচিত নয়: সত্য, দান, অক্লান্ত কর্মপ্রবণতা, অনসূয়া (দোষদর্শন ও ঈর্ষাহীনতা), ক্ষমা এবং ধৃতি (ধৈর্য-স্থৈর্য)।

Verse 82

अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्न पुत्रो$र्थकरी च विद्या षड़्‌ जीवलोकस्य सुखानि राजन्‌,राजन! धनकी प्राप्ति, नित्य नीरोग रहना, स्त्रीका अनुकूल तथा प्रियवादिनी होना, पुत्रका आज्ञाके अंदर रहना तथा धन पैदा करानेवाली विद्याका ज्ञान--ये छः बातें इस मनुष्यलोकमें सुखदायिनी होती हैं

বিদুর বললেন—হে রাজন, এই মানবলোকে ছয়টি বিষয়কে সুখ বলা হয়: ধনের নিরবচ্ছিন্ন প্রাপ্তি, নিত্য আরোগ্য, প্রিয় ও মধুভাষিণী স্ত্রী, শাসনে থাকা অনুগত পুত্র, এবং অর্থসাধক বিদ্যা।

Verse 83

षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्य योडथिगच्छति । न स पापै: कुतो<नर्थर्युज्यते विजितेन्द्रिय:,मनमें नित्य रहनेवाले छ: शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य)-को जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंसे ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थोंसे युक्त होनेकी तो बात ही क्या है?

বিদুর বললেন—যে ব্যক্তি নিজের অন্তরে সদা-বাসী ছয় শত্রু (কাম, ক্রোধ, লোভ, মোহ, মদ ও মাত্সর্য) দমন করে ইন্দ্রিয়সংযম লাভ করে, সে পাপে লিপ্ত হয় না; তবে পাপজাত অনর্থ-দুর্ভাগ্যে সে কীভাবে জড়াবে?

Verse 84

षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते । चौरा: प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सका:

বিদুর বললেন—ছয় প্রকার লোক ছয় প্রকার অবস্থার উপর জীবিকা নির্বাহ করে; সপ্তমটি দেখা যায় না। অসতর্কের উপর চোর বাঁচে, আর রোগাক্রান্তের উপর চিকিৎসক বাঁচে।

Verse 85

प्रमदा: कामयानेषु यजमानेषु याजका: । राजा विवदमानेषु नित्यं॑ मूर्खेषु पण्डिता:

কামাসক্তদের কাছে নারী, যজ্ঞকারীদের কাছে যাজক, বিবাদীদের মাঝে রাজা, আর মূর্খদের মাঝে সর্বদা পণ্ডিত—এমনই দেখা যায়।

Verse 86

निम्नांकित छः प्रकारके मनुष्य छ: प्रकारके लोगोंसे अपनी जीविका चलाते हैं, सातवेंकी उपलब्धि नहीं होती। चोर असावधान पुरुषसे, वैद्य रोगीसे, कामोन्मत्त स्त्रियाँ कामियोंसे, पुरोहित यजमानोंसे, राजा झगड़नेवालोंसे तथा विद्वान्‌ पुरुष मूर्शोंसे अपनी जीविका चलाते हैं ।। षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात्‌ । गाव: सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसंगति:,मुहूर्त- भर भी देख-रेख न करनेसे गौ, सेवा, खेती, स्त्री, विद्या तथा शूद्रोंसे मेल--ये छः चीजें नष्ट हो जाती हैं

বিদুর বললেন—মুহূর্তমাত্র অবহেলায় এই ছয়টি নষ্ট হয়: গরু, সেবা/চাকরি, কৃষিকর্ম, স্ত্রী (গৃহশৃঙ্খলা), বিদ্যা এবং নীচজনের সঙ্গ।

Verse 87

षडेते हावमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्‌ । आचार्य शिक्षिता: शिष्या: कृतदाराश्ष मातरम्‌,ये छ: प्रायः सदा अपने पूर्व उपकारीका सम्मान नहीं करते हैं--शिक्षा समाप्त हो जानेपर शिष्य आचार्यका, विवाहित बेटे माताका, कामवासनाकी शान्ति हो जानेपर पुरुष स्त्रीका, कृतकार्य मनुष्य सहायकका, नदीकी दुर्गम धारा पार कर लेनेवाले पुरुष नावका तथा रोगी पुरुष रोग छूटनेके बाद वैद्यका

বিদুর বললেন—এই ছয়জন প্রায়ই পূর্ব-উপকারীর প্রতি অবজ্ঞা করে: শিক্ষা সম্পন্ন শিষ্য আচার্যের প্রতি, আর বিবাহিত পুত্র মাতার প্রতি।

Verse 88

नारीं विगतकामास्तु कृतार्थाश्व प्रयोजकम्‌ | नावं निस्तीर्णकान्तारा आतुपराश्न चिकित्सकम्‌,ये छ: प्रायः सदा अपने पूर्व उपकारीका सम्मान नहीं करते हैं--शिक्षा समाप्त हो जानेपर शिष्य आचार्यका, विवाहित बेटे माताका, कामवासनाकी शान्ति हो जानेपर पुरुष स्त्रीका, कृतकार्य मनुष्य सहायकका, नदीकी दुर्गम धारा पार कर लेनेवाले पुरुष नावका तथा रोगी पुरुष रोग छूटनेके बाद वैद्यका

বিদুর বললেন— কামনা প্রশমিত হলে মানুষ নারীর, উদ্দেশ্য সিদ্ধ হলে সহায়কের, বিপদসংকুল পথ পার হলে নৌকার, আর রোগ সেরে গেলে চিকিৎসকের অবজ্ঞা করে। এইভাবে অনেকেই পূর্বে যাঁরা উপকার করেছিলেন তাঁদের সম্মান করে না—শিক্ষা শেষ হলে শিষ্য আচার্যকে, বিবাহের পরে পুত্র মাতাকে, কামশান্তির পরে পুরুষ স্ত্রীকে, কাজ সম্পন্ন হলে মানুষ সহকারীকে, দুর্ধর্ষ স্রোত পার হলে নৌকাকে, আর আরোগ্য লাভের পরে রোগী বৈদ্যকে ভুলে যায়।

Verse 89

आरोग्यमानृण्यमविप्रवास: सद्धिर्मनुष्यै:ः सह सम्प्रयोग: । स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवास: षड्‌ जीवलोकस्य सुखानि राजन्‌,राजन! नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेशमें न रहना, अच्छे लोगोंके साथ मेल होना, अपनी वृत्तिसे जीविका चलाना और निर्भय होकर रहना-ये छ: मनुष्यलोकके सुख हैं

রাজন! নিরোগ থাকা, ঋণমুক্ত থাকা, পরদেশে না থাকা, সজ্জনদের সঙ্গে সঙ্গ করা, নিজের উপার্জনে জীবিকা চালানো এবং নির্ভয়ে বাস করা—এই ছয়টি মানবলোকে সুখ।

Verse 90

ईर्षी घृणी नसंतुष्ट: क्रोधनो नित्यशड्कित: । परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदु:खिता:

বিদুর বললেন—ঈর্ষাপরায়ণ, বিদ্বেষী, অসন্তুষ্ট, ক্রোধী, সদা সন্দেহপ্রবণ এবং অন্যের ভাগ্যের ওপর জীবিকা নির্বাহকারী—এই ছয়জন সর্বদা দুঃখী।

Verse 91

ईर्ष्या करनेवाला, घृणा करनेवाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहनेवाला और दूसरेके भाग्यपर जीवन-निर्वाह करनेवाला--ये छ: सदा दु:खी रहते हैं ।। सप्त दोषा: सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदया: । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वरा:,सत्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना--ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देने चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्राय: नष्ट हो जाते हैं

বিদুর বললেন—ঈর্ষাপরায়ণ, বিদ্বেষী, অসন্তুষ্ট, ক্রোধী, সদা সন্দেহপ্রবণ এবং অন্যের ভাগ্যের ওপর জীবিকা নির্বাহকারী—এই ছয়জন সর্বদা দুঃখী। আর রাজন! ব্যসনজাত সাত দোষ রাজাকে সর্বদা ত্যাগ করা উচিত; এগুলির দ্বারা দৃঢ়মূল রাজাও প্রায়ই বিনষ্ট হয়—স্ত্রী-আসক্তি, জুয়া, শিকার, মদ্যপান, কঠোর বাক্য, দণ্ডে অতিরিক্ত নিষ্ঠুরতা, এবং ধনের অপব্যবহার।

Verse 92

स्त्रियो$क्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञजचमम्‌ | महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च,सत्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना--ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देने चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्राय: नष्ट हो जाते हैं

বিদুর বললেন—স্ত্রী-আসক্তি, জুয়া, শিকার, মদ্যপান, (পঞ্চম) কঠোর বাক্য, দণ্ডে অতিরিক্ত নিষ্ঠুরতা, এবং ধনের দূষণ/অপব্যবহার—এই সাতটি দুঃখদায়ক দোষ; রাজাকে এগুলি সর্বদা ত্যাগ করা উচিত।

Verse 93

अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यत: । ब्राह्मणान्‌ प्रथम द्वेष्टि ब्राह्मणैश्व विरुध्यते,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान्‌ मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे

বিনাশের পথে অগ্রসর মানুষের আটটি পূর্বলক্ষণ দেখা যায়—সবার আগে সে ব্রাহ্মণদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করে, তারপর ব্রাহ্মণদের সঙ্গে প্রকাশ্য বিরোধে জড়িয়ে পড়ে।

Verse 94

ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्न जिघांसति । रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान्‌ मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे

বিনাশের পথে থাকা মানুষ ব্রাহ্মণদের সম্পদ কেড়ে নেয়, এমনকি ব্রাহ্মণদের হত্যা করতে চায়; তাদের নিন্দায় আনন্দ পায় এবং তাদের প্রশংসা শুনেও সন্তুষ্ট হয় না।

Verse 95

नैनान्‌ स्मरति कृत्येषु याचितश्नाभ्यसूयति । एतान्‌ दोषान्‌ नर: प्राज्ञो बुध्येद्‌ बुद्ध्वा विसर्जयेत्‌,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान्‌ मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे

কর্তব্যকর্মে সে তাদের স্মরণ করে না; আর কিছু চাইলে সে সন্দেহ ও দোষারোপে জ্বলে ওঠে। জ্ঞানী ব্যক্তি এই দোষগুলি চিনে নিয়ে, চিনলেই ত্যাগ করুক।

Verse 96

अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत | वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखान्यपि,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं

হে ভারত! আনন্দের এই আটটি ‘নবনীত’—অর্থাৎ সার—এই জগতে প্রত্যক্ষ দেখা যায়; আর এগুলিই পার্থিব সুখেরও উপায়।

Verse 97

समागमश्न सखिभिर्महांश्षैव धनागम: । पुत्रेण च परिष्वज्भ: संनिपातश्न मैथुने,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं

বন্ধুদের সঙ্গে মিলন, প্রচুর ধনলাভ, পুত্রকে আলিঙ্গন, এবং মৈথুনে মিলিত হওয়া—এগুলোই (আনন্দের সার)।

Verse 98

समये च प्रियालाप: स्वयूथ्येषु समुन्नति: । अभिप्रेतस्य लाभश्व॒ पूजा च जनसंसदि,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं

বিদুর বললেন—হে ভারত! বন্ধুদের সঙ্গে মিলন, অধিক ধনলাভ, পুত্রকে আলিঙ্গন, মৈথুন-সংযোগে প্রবৃত্ত হওয়া, যথাসময়ে প্রিয় বাক্য বলা, নিজের গোষ্ঠীতে উন্নতি, অভীষ্ট বস্তু লাভ এবং জনসমাজে সম্মান—এই আটটি আনন্দের সার বলে দেখা যায়; এবং এগুলিই পার্থিব সুখের উপায়ও বটে।

Verse 99

अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च,बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्तिके अनुसार दान और कृतज्ञता--ये आठ गुण पुरुषकी ख्याति बढ़ा देते हैं

বিদুর বললেন—আটটি গুণ মানুষকে দীপ্ত করে ও খ্যাতিমান করে: প্রজ্ঞা, কুলীনতা ও সদাচার, ইন্দ্রিয়সংযম, শাস্ত্রশ্রবণজাত বিদ্যা, পরাক্রম, মিতভাষিতা, সামর্থ্য অনুযায়ী দান, এবং কৃতজ্ঞতা।

Verse 100

नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पठचसाक्षिकम्‌ | क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान्‌ यो वेद स पर: कवि:,जो विद्वान्‌ पुरुष [आँख, कान आदि] नौ दरवाजे-वाले, तीन (सत्त्व, रज तथा तमरूपी) खंभोंवाले, पाँच (ज्ञानेन्द्रियरूप) साक्षीवाले, आत्माके निवासस्थान इस शरीररूपी गृहको तत्त्वसे जानता है, वह बहुत बड़ा ज्ञानी है

বিদুর বললেন—এই দেহটি নয় দ্বারবিশিষ্ট গৃহ, তিন স্তম্ভে (সত্ত্ব-রজ-তম) স্থিত, এবং পাঁচ সাক্ষী (জ্ঞানেন্দ্রিয়) দ্বারা পর্যবেক্ষিত। যে জ্ঞানী একে ক্ষেত্রজ্ঞ (আত্মা) দ্বারা অধিষ্ঠিত ‘ক্ষেত্র’ রূপে তত্ত্বত জানে, সেই-ই পরম দ্রষ্টা।

Verse 101

दश धर्म न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान्‌ । मत्त: प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धों बुभुक्षित:,महाराज धृतराष्ट्र! दस प्रकारके लोग धर्मके तत्त्वको नहीं जानते, उनके नाम सुनो। नशेमें मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस हैं। अतः इन सब लोगोंमें विद्वान्‌ पुरुष आसक्त न होवे

বিদুর বললেন—হে ধৃতরাষ্ট্র! বুঝে নাও: দশ প্রকার লোক ধর্মের তত্ত্ব জানে না—মত্ত (মদমত্ত), প্রমত্ত (অসতর্ক), উন্মত্ত (বিভ্রান্ত), শ্রান্ত (ক্লান্ত), ক্রুদ্ধ (ক্রোধগ্রস্ত) এবং বুভুক্ষিত (ক্ষুধার্ত)।

Verse 102

त्वरमाणश्न लुब्धश्न भीत: कामी च ते दश । तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डित:,महाराज धृतराष्ट्र! दस प्रकारके लोग धर्मके तत्त्वको नहीं जानते, उनके नाम सुनो। नशेमें मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस हैं। अतः इन सब लोगोंमें विद्वान्‌ पुरुष आसक्त न होवे

বিদুর বললেন—ত্বরিত (তাড়াহুড়োকারী), লুব্ধ (লোভী), ভীত (ভয়গ্রস্ত) এবং কামী (কামাসক্ত)—এরা সেই দশের অন্তর্গত। অতএব জ্ঞানী ব্যক্তি এদের কারও সঙ্গে আসক্তি বা নির্ভরতা স্থাপন করবে না।

Verse 103

अन्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीत॑ चैव सुधन्वना,इसी विषयमें असुरोंके राजा प्रह्नादने सुधन्वाके साथ अपने पुत्रके प्रति कुछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञलोग उस पुरातन इतिहासका उदाहरण देते हैं

বিদুর বললেন—নীতিজ্ঞেরা এই বিষয়ে এক প্রাচীন ইতিবৃত্তের দৃষ্টান্ত দেন। পুত্রের কল্যাণার্থে অসুররাজ প্রহ্লাদ এই প্রসঙ্গেই সুধন্বাকে উপদেশ দিয়েছিলেন।

Verse 104

य:ः काममन्यू प्रजहाति राजा पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च । विशेषविच्छुतवान्‌ क्षिप्रकारी त॑ सर्वलोक: कुरुते प्रमाणम्‌,जो राजा काम और क्रोधका त्याग करता है और सुपात्रको धन देता है, विशेषज्ञ है, शास्त्रोंका ज्ञाता और कर्तव्यको शीघ्र पूरा करनेवाला है, उस (-के व्यवहार और वचनों)-को सब लोग प्रमाण मानते हैं

যে রাজা কাম ও ক্রোধ ত্যাগ করে, যোগ্য পাত্রে ধন অর্পণ করে, বিচক্ষণ, শাস্ত্রজ্ঞ এবং কর্তব্যে তৎপর—সকল লোক তার আচরণ ও বাক্যকে প্রমাণ মানে।

Verse 105

जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान्‌ विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम्‌ | जानाति मात्रां च तथा क्षमां च त॑ तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा,जो मनुष्योंमें विश्वास उत्पन्न करना जानता है, जिनका अपराध प्रमाणित हो गया है उन्हींको जो दण्ड देता है, जो दण्ड देनेकी न्यूनाधिक मात्रा तथा क्षमाका उपयोग जानता है, उस राजाकी सेवामें सम्पूर्ण सम्पत्ति चली आती है

যে শাসক মানুষের মনে বিশ্বাস জাগাতে জানে, অপরাধ প্রমাণিত হলে তবেই দণ্ড দেয়, দণ্ডের যথাযথ মাত্রা ও সময়োচিত ক্ষমা—উভয়ই বোঝে, তার সেবায় সম্পূর্ণ সমৃদ্ধি নিজে এসে উপস্থিত হয়।

Verse 106

सुदुर्बल॑ नावजानाति कंचिद्‌ युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्‌ । न विग्रहं रोचयते बलस्थै: काले च यो विक्रमते स धीर:,जो किसी दुर्बलका अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रुके साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानोंके साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आनेपर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है

যে কেউ দুর্বলের প্রতি অবজ্ঞা করে না, সংযত থেকে শত্রুর সঙ্গে বুদ্ধিপূর্বক আচরণ করে, শক্তিশালীদের সঙ্গে অকারণে বিবাদ পছন্দ করে না, আর সময় এলে বীরত্ব প্রকাশ করে—সেই-ই ধীর।

Verse 107

प्राप्पापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्त: । दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिता: सपत्ना:,जो धुरन्धर महापुरुष आपत्ति पड़नेपर कभी दुःखी नहीं होता, बल्कि सावधानीके साथ उद्योगका आश्रय लेता है तथा समयपर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं

যে ধুরন্ধর মহাত্মা বিপদে কখনও বিচলিত হয় না, অসতর্ক না হয়ে উদ্যোগ অবলম্বন করে, আর সময় এলে দুঃখ সহ্য করে—তার প্রতিদ্বন্দ্বীরা তো পরাজিতই।

Verse 108

अनर्थक विप्रवासं गृहे भ्य: पापै: सन्धिं परदाराभिमर्शम्‌ । दम्भं स्तैन्यं पैशुनं मद्यपानं न सेवते यश्च सुखी सदैव,जो घर छोड़कर निरर्थक विदेशवास, पापियोंसे मेल, परस्त्रीगमन, पाखण्ड, चोरी, चुगलखोरी तथा मदिरापान--इन सबका सेवन नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है

যে গৃহ ত্যাগ করে অনর্থক প্রবাসে যায় না, পাপীদের সঙ্গে সখ্য করে না, পরস্ত্রী-স্পর্শে লিপ্ত হয় না, ভণ্ডামি, চুরি, পরনিন্দা ও মদ্যপান করে না—সে সর্বদা সুখী থাকে।

Verse 109

न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग- माकारित: शंसति तत्त्वमेव । न मित्रार्थे रोचयते विवादं नापूजित: कुप्यति चाप्यमूढ:,जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता, आदर न पानेपर क्ुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है

যে ক্রোধ বা তাড়াহুড়োয় ধর্ম-অর্থ-কাম—এই ত্রিবর্গের কর্মে প্রবৃত্ত হয় না, জিজ্ঞাসিত হলে কেবল সত্যই বলে, বন্ধুর জন্যও বিবাদ পছন্দ করে না, আর সম্মান না পেলেও ক্রুদ্ধ হয় না—সে স্থিরবুদ্ধি জ্ঞানী।

Verse 110

न यो5भ्यसूयत्यनुकम्पते च न दुर्बल: प्रातिभाव्यं करोति । नात्याह किंचित्‌ क्षमते विवादं सर्वत्र तादूगू लभते प्रशंसाम्‌,जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता, आदर न पानेपर क्ुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है

যে ঈর্ষা করে না এবং করুণাশীল, যে অক্ষম হয়েও কারও জামিনদার হয় না, যে অতিরিক্ত কথা বলে না এবং বিবাদ সহ্য করতে জানে—সে সর্বত্র প্রশংসা লাভ করে।

Verse 111

यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पौरुषेणापि विकत्थते<न्यान्‌ । न मूर्च्छित: कटुकान्याह किंचित्‌ प्रियं सदा त॑ कुरुते जनो हि,जो कभी उद्ण्डका-सा वेष नहीं बनाता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघा भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं

যে কখনও উদ্ধত ভঙ্গি ধারণ করে না, অন্যদের সামনে নিজের বীরত্বের ঢাক পেটায় না, আর ক্রোধে উন্মত্ত হলেও তিক্ত বাক্য বলে না—লোকেরা তাকে সর্বদা প্রিয় করে রাখে।

Verse 112

न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतो5स्मीति करोत्यकार्य तमार्यशीलं परमाहुरार्या:,जो शान्त हुई वैरकी आगको फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा “मैं विपत्तिमें पड़ा हूँ” ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते हैं

যে প্রশমিত বৈরকে আবার জাগিয়ে তোলে না, অহংকারে ওঠে না, হতাশায় ডুবে যায় না; আর ‘আমি বিপদে পড়েছি’ ভেবে অনুচিত কাজ করে না—এমন আর্য-শীল পুরুষকে জ্ঞানীরা শ্রেষ্ঠ বলেন।

Verse 113

न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्ष नान्यस्य दु:खे भवति प्रह्ृष्ट: । दत्त्वा न पश्चात्‌ कुरुतेडनुतापं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशील:,जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरेके दुःखके समय हर्ष नहीं मानता और दान देकर पश्चात्ताप नहीं करता, वह सज्जनोंमें सदाचारी कहलाता है

যে নিজের সুখে উল্লসিত হয় না, অন্যের দুঃখে আনন্দিত হয় না, আর দান করে পরে অনুতাপ করে না—সেই সজ্জনদের মধ্যে আর্যশীল, সদাচারী বলে কথিত।

Verse 114

देशाचारान्‌ समयाञ्जातिधर्मान्‌ बुभूषते यः: स परावरज्ञ: । स यत्र तत्राभिगत: सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति,जो मनुष्य देशके व्यवहार, अवसर तथा जातियोंके धर्मोको तत्त्वसे जानना चाहता है, उसे उत्तम-अधमका विवेक हो जाता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, सदा महान्‌ जनसमूहपर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है

যে দেশাচার, সময়োচিত বিধি এবং বিভিন্ন জাতিগোষ্ঠীর ধর্মকে তাদের প্রকৃত মর্মে জানতে চায়, সে উচ্চ-নীচের বিচারবুদ্ধি লাভ করে। সে যেখানে যায়, সেখানেই মহাজনের সমাবেশে স্বভাবতই প্রভাব ও কর্তৃত্ব স্থাপন করে।

Verse 115

दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं राजद्विष्ट॑ पैशुनं पूगवैरम्‌ । मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्वापि वाद॑ यः प्रज्ञावान्‌ वर्जयेत्‌ स प्रधान:,जो बुद्धिमान्‌ दम्भ, मोह, मात्सर्य, पापकर्म, राजद्रोह, चुगलखोरी, समूहसे वैर और मतवाले, पागल तथा दुर्जनोंसे विवाद छोड़ देता है, वह श्रेष्ठ है

যে প্রজ্ঞাবান ব্যক্তি দম্ভ, মোহ, ঈর্ষা, পাপকর্ম, রাজার প্রতি বিদ্বেষ, পরনিন্দা, দলগত বৈর এবং মত্ত, উন্মত্ত ও দুর্জনের সঙ্গে বিবাদ—এসব পরিহার করে, সেই-ই শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য।

Verse 116

दानं होम॑ देवतं मड़़लानि प्रायश्चित्तान विविधाँललोकवादान्‌ । एतानि यः कुरुते नैत्यकानि तस्योत्थानं देवता राधयन्ति,जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कर्म, प्रायश्चित्त तथा अनेक प्रकारके लौकिक आचार--इन नित्य किये जानेयोग्य कर्मोंको करता है, देवतालोग उसके अभ्युदयकी सिद्धि करते हैं

যে দান, হোম, দেবপূজা, মঙ্গলকর্ম, প্রায়শ্চিত্ত এবং নানাবিধ লোকসম্মত আচার—এই নিত্যকর্মগুলি পালন করে, দেবতাগণ তার উন্নতি ও সমৃদ্ধি সাধন করেন।

Verse 117

समैर्विवाहं कुरुते न हीनै: समै: सख्यं व्यवहारं कथां च । गुणैविशिष्टांश्न पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नया: सुनीता:,जो अपने बराबरवालोंके साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत करता है, हीन पुरुषोंके साथ नहीं और गुणोंमें बढ़े-चढ़े पुरुषोंको सदा आगे रखता है, उस विद्वान्‌की नीति श्रेष्ठ नीति है

যে সমমানের সঙ্গে বিবাহবন্ধন করে, হীনদের সঙ্গে নয়; সমমানের সঙ্গেই মৈত্রী, লেনদেন ও কথাবার্তা রাখে; এবং গুণে শ্রেষ্ঠদের সর্বদা অগ্রে স্থান দেয়—সেই বিচক্ষণ ব্যক্তির নীতি সুপথে পরিচালিত, সত্যিই উত্তম।

Verse 118

मितं भुड्क्ते संविभज्यश्रितेभ्यो मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा । ददात्यमित्रेष्वपि याचित: सं- स्तमात्मवन्तं प्रजहत्यनर्था:

বিদুর বললেন—যে ব্যক্তি আশ্রিতদের সঙ্গে ভাগ করে সংযমে আহার করে, অল্প নিদ্রা নিয়েও ধর্মসঙ্গত মহৎ কর্মে প্রবল পরিশ্রম করে, এবং প্রার্থিত হলে শত্রুকেও দান করে—এমন আত্মসংযত, স্থিতপ্রজ্ঞ পুরুষকে দুর্ভাগ্য গ্রাস করতে পারে না।

Verse 119

जो अपने आश्रितजनोंको बाँटकर थोड़ा ही भोजन करता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा माँगनेपर जो मित्र नहीं है, उन्हें भी धन देता है, उस मनस्वी पुरुषको सारे अनर्थ दूरसे ही छोड़ देते हैं ।। चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य नान्ये जना: कर्म जानन्ति किंचित्‌ | मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुछिते च नाल्‍पो<प्यस्य च्यवते कक्रिदर्थ:,जिसके अपनी इच्छाके अनुकूल और दूसरोंकी इच्छाके विरुद्ध कार्यको दूसरे लोग कुछ भी नहीं जान पाते, मन्त्र गुप्त रहने और अभीष्ट कार्यका ठीक-ठीक सम्पादन होनेके कारण उसका थोड़ा भी काम बिगड़ने नहीं पाता

বিদুর বললেন—যে আশ্রিতদের মধ্যে ভাগ করে নিজে অল্প আহার করে, বহু কাজ করেও অল্প নিদ্রা নেয়, এবং প্রার্থিত হলে অমিত্রকেও ধন দান করে—তাকে অনর্থ দূর থেকেই পরিত্যাগ করে। আর যার অভিপ্রেত কর্ম—নিজ উদ্দেশ্যের অনুকূল হোক বা অন্যের ইচ্ছার বিরুদ্ধ—অন্যেরা কিছুই জানতে পারে না; যার মন্ত্র গোপন থাকে এবং পরিকল্পনা যথাযথভাবে সম্পন্ন হয়—তার উদ্যোগের সামান্য অংশও ব্যর্থ হয় না।

Verse 120

यः सर्वभूतप्रशमे निविष्ट: सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्ध भाव: । अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये महामणिर्जात्य इव प्रसन्न:,जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंको शान्ति प्रदान करनेमें तत्पर, सत्यवादी, कोमल, दूसरोंको आदर देनेवाला तथा पवित्र विचारवाला होता है, वह अच्छी खानसे निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रत्नकी भाँति अपनी जातिवालोंमें अधिक प्रसिद्धि पाता है

বিদুর বললেন—যে সর্বভূতের প্রশমনেই নিবিষ্ট, সত্যভাষী, কোমল, পরকে মান দেয় এবং যার অন্তঃভাব শুদ্ধ—সে নিজ বংশের মধ্যে তেমনই বিশেষভাবে খ্যাত হয়, যেমন উত্তম খনি থেকে সদ্য উত্তোলিত উজ্জ্বল মহামণি।

Verse 121

य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत । अनन्ततेजा: सुमना: समाहित: स तेजसा सूर्य इवावभासते,जो स्वयं ही अधिक लज्जाशील है, वह सब लोगोंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रतासे युक्त होनेके कारण कान्तिमें सूर्यके समान शोभा पाता है

বিদুর বললেন—যে মানুষ নিজের আত্মার সামনে গভীর লজ্জা অনুভব করে, সেই-ই সমগ্র লোকের গুরু হয়। অনন্ত তেজস্বী, নির্মলচিত্ত ও সমাহিত সে নৈতিক দীপ্তিতে সূর্যের মতোই প্রকাশিত হয়।

Verse 122

वने जाता: शापदग्धस्य राज्ञ: पाण्डो: पुत्रा: पउच पउ्चेन्द्रकल्पा: । त्वयैव बाला वर्धिता: शिक्षिताश्र तवादेशं पालयन्त्यम्बिकेय,अम्बिकानन्दन! (मृगरूपधारी किंदम ऋषिके) शापसे दग्ध राजा पाण्डुके जो पाँच पुत्र वनमें उत्पन्न हुए, वे पाँच इन्दोंके समान शक्तिशाली हैं, उन्हें आपने ही बचपनसे पाला और शिक्षा दी है; वे भी आपकी आज्ञाका पालन करते रहते हैं

বিদুর বললেন—হে অম্বিকার নন্দন! শাপে দগ্ধ রাজা পাণ্ডুর যে পাঁচ পুত্র অরণ্যে জন্মেছিল, তারা পাঁচজনই ইন্দ্রসম পরাক্রমশালী। তুমি নিজেই তাদের শৈশব থেকে লালন-পালন ও শিক্ষা দিয়েছ; আর তারা তোমার আদেশ পালন করে চলে।

Verse 123

प्रदायैषामुचितं तात राज्यं सुखी पुत्रै: सहितो मोदमान: । न देवानां नापि च मानुषाणां भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र,तात! उन्हें उनका न्‍्यायोचित राज्यभाग देकर आप अपने पुत्रोंक साथ आनन्दित होते हुए सुख भोगिये। नरेन्द्र! ऐसा करनेपर आप देवताओं तथा मनुष्योंकी आलोचनाके विषय नहीं रह जायँगे

হে তাত! তাদের ন্যায্য রাজ্যাংশ প্রদান করে তুমি পুত্রদের সঙ্গে আনন্দিত ও সুখী হয়ে শান্তি ভোগ করো। হে নরেন্দ্র! এভাবে করলে দেবলোকেও নয়, মানবসমাজেও নয়—তুমি আর নিন্দা ও তিরস্কারের লক্ষ্য হবে না।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a ruler prioritizes dharma-driven restraint and fair settlement or permits partisan attachment and weak oversight to normalize harmful policy—thereby transferring private bias into public catastrophe.

That ethical governance requires disciplined counsel and accountability: dharma is treated as superior to wealth-accumulation and comfort, while karmic outcomes and social judgment follow rulers who ignore corrective advice.

No explicit phalaśruti is presented; the meta-function is structural and didactic—positioning the envoy’s report as a moral audit of kingship and preparing the next day’s sabhā hearing as the decisive interpretive forum.