
Śikhaṇḍī-janma-nigūḍha-vṛtta (The concealed birth-account of Śikhaṇḍī) | शिखण्डी-जन्म-निगूढ-वृत्त
Upa-parva: Śikhaṇḍī-janma-vṛttānta (Account of Śikhaṇḍī’s birth and concealment)
Duryodhana questions Bhīṣma regarding how Śikhaṇḍī, once identified as a daughter connected with the Gaṅgā-lineage reference in the query, later becomes male and relevant in martial context. Bhīṣma narrates the antecedents: Drupada’s beloved queen is without a son; Drupada performs severe austerities to Śaṅkara (Śiva) seeking a child specifically for opposition against Bhīṣma. Śiva grants a conditional boon: a child will be born female yet later become male, and asserts the inevitability of this outcome. The queen conceives at the proper time; a beautiful daughter is born. To align with the boon and succession intent, the birth is publicly proclaimed as a son; Drupada performs male-coded birth rites and names the child Śikhaṇḍī. The queen and court maintain strict secrecy, known only to a limited circle (including Pārṣata), while Bhīṣma notes his own knowledge through intelligence and Nārada’s words, and by reference to Ambā’s austerities as a deeper causal backdrop.
Chapter Arc: हिरण्यवर्मा के दूत के वचनों से द्रुपद के राजभवन में भय का प्रवेश होता है—शिखण्डिनी के विषय में उठे संदेह ने एक पुराने वैवाहिक-संबंध को युद्ध की ओर धकेल दिया है। → हिरण्यवर्मा अपने मधुरभाषी दूतों से ‘ऐसा कुछ नहीं’ कहकर संबंधियों को मनाने का कठिन प्रयत्न करता है, पर भीतर-ही-भीतर अपमान और शंका की आग बढ़ती जाती है। अंततः वह सेना-संग्रह कर द्रुपद पर चढ़ाई का निश्चय करता है; उधर मित्र-राजाओं में यह घोषणा-सा फैलता है कि यदि शिखण्डिनी वास्तव में कन्या हुई तो द्रुपद दोषी ठहरेगा। → दाशार्ण देश में दूत भेजकर भी द्रुपद शोक-मूर्छित-सा होकर एकांत में महारानी से कहता है—‘मेरा जीवन संशय में पड़ गया है; शिखण्डिनी को लेकर भारी संकट आ खड़ा हुआ।’ → महारानी, द्रुपद की प्रतिष्ठा-रक्षा और लोक-निंदा से बचने के लिए, ‘प्रकाश’ में (सबके सामने) निर्दोषता सिद्ध करने की आवश्यकता समझते हुए उत्तर देती है—राजा जानते हुए भी दूसरों में शंका-निवारण हेतु उपाय पूछ रहे हैं; अब संकट-निवारण का मार्ग खोजा जाएगा। → हिरण्यवर्मा की चढ़ाई का निर्णय हो चुका है और द्रुपद के घर में उपाय-चिंतन आरंभ—पर शिखण्डिनी के रहस्य का समाधान कैसे होगा, यह अगले अध्याय पर टिका रहता है।
Verse 1
अपना बछ। अर: नवर्त्याधिकशततमो<्ध्याय: हिरण्यवमकि आक्रमणके भयसे घबराये हुए द्रुपदका अपनी महारानीसे संकटनिवारणका उपाय पूछना भीष्म उवाच एवमुक्तस्य दूतेन द्रुपदस्य तदा नृप । चोरस्येव गृहीतस्य न प्रावर्तत भारती,भीष्मजी कहते हैं-राजन्! दूतके ऐसा कहनेपर पकड़े गये चोरकी भाँति राजा ट्रपदके मुखसे सहसा कोई बात नहीं निकली
Bhishma said: O king, when the messenger had spoken thus, King Drupada—like a thief caught in the act—found no words rising to his lips; his speech did not at once proceed. The verse highlights the moral pressure of accusation and fear: when one is seized by dread and perceived guilt, even a ruler’s composure and capacity to respond can collapse.
Verse 2
स यत्नमकरोत् तीव्र सम्बन्धिन्यनुमानने । दूतैर्मधुरसम्भाषैर्न तदस्तीति संदिशन्
Bhīṣma said: He exerted himself intensely to win over and reassure his kinswoman, sending envoys who spoke with gentle, pleasing words, conveying the message, “That is not so.” In ethical terms, the verse highlights a strategy of pacification through courteous speech and intermediaries—attempting to prevent rupture within family ties by denying or dispelling a feared suspicion.
Verse 3
उन्होंने मधुरभाषी दूतोंके द्वारा यह संदेश देकर कि "ऐसी बात नहीं है (आपको धोखा नहीं दिया गया है)” अपने सम्बन्धीको मनानेका दुष्कर प्रयत्न किया ।। स राजा भूय एवाथ ज्ञात्वा तत्त्वमथागमत् | कन्येति पाञज्चालसुतां त्वरमाणो विनिर्ययौ,राजा हिरण्यवर्माने जब पुनः पता लगाया तो पांचालराजकी पुत्री शिखण्डिनी कन्या ही है, यह बात ठीक जान पड़ी। इससे रुष्ट होकर उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ द्रुपदपर आक्रमण करनेका निश्चय किया
Bhishma said: That king, having once again investigated and come to know the true facts, realized that Drupada’s child—Shikhaṇḍinī, the offspring of the Pāñcālas—was indeed a girl. Enraged by this discovery and feeling deceived despite the earlier soothing messages sent through sweet-speaking envoys, he hastened to set out, intent on attacking Drupada. The episode highlights how wounded honor and suspicion, when not restrained by discernment and dharma, can quickly harden into violent resolve.
Verse 4
ततः सम्प्रेषषामास मित्राणाममितौजसाम् | दुहितुर्विप्रलम्भं तं धात्रीणां वचनात् तदा,तदनन्तर राजाने धायोंके कथनानुसार अपनी कन्याको द्रुपदके द्वारा धोखा दिये जानेका समाचार अमिततेजस्वी मित्र राजाओंके पास भेजा
তখন ধাত্রীদের কথামতো তিনি অমিততেজস্বী মিত্ররাজাদের কাছে সংবাদ পাঠালেন—দ্রুপদ তাঁর কন্যাকে প্রতারণা করে অপমানিত করেছে।
Verse 5
ततः समुदयं कृत्वा बलानां राजसत्तम: | अभियाने मतिं चक्रे द्रुपदं प्रति भारत,भारत! इसके बाद नृपश्रेष्ठ हिरण्यवर्मानि सैन्य-संग्रह करके राजा द्रपदके ऊपर चढ़ाई करनेका निश्चय किया
এরপর নৃপশ্রেষ্ঠ, হে ভারত, সৈন্যসমাবেশ করে দ্ৰুপদের বিরুদ্ধে অভিযানে মন স্থির করলেন।
Verse 6
तत: सम्मन्त्रयामास मन्त्रिभि: स महीपति: । हिरण्यवर्मा राजेन्द्र पाञ्चाल्यं पार्थिवं प्रति,राजेन्द्र! फिर राजा हिरण्यवर्माने अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर परामर्श किया कि मुझे पांचालनरेशके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये
তারপর সেই নৃপতি মন্ত্রীদের সঙ্গে পরামর্শ করলেন—হে রাজেন্দ্র, পাঁচাল-নৃপতির প্রতি কীভাবে আচরণ করা উচিত।
Verse 7
तत्र वै निश्चितं तेषाम भूद् राज्ञां महात्मनाम् | तथ्यं भवति चेदेतत् कन्या राजन् शिखण्डिनी,वहाँ महामना मित्र राजाओंका यह निश्चय घोषित हुआ कि राजन! यदि यह सत्य सिद्ध हुआ कि शिखण्डी वास्तवमें पुत्र नहीं कन्या है, तब हमलोग पांचालराजको कैद करके अपने घरको ले आयेंगे और पांचालदेशके राज्यपर दूसरे किसी राजाको बिठाकर शिखण्डीसहित द्रुपदको मरवा डालेंगे
সেখানে সেই মহাত্মা রাজাদের স্থির সিদ্ধান্ত হল—হে রাজন! যদি সত্য প্রমাণিত হয় যে শিখণ্ডিনী পুত্র নয়, কন্যাই, তবে আমরা পাঁচালরাজাকে বন্দি করে নিজ গৃহে নিয়ে আসব; পাঁচালে অন্য এক নরেশকে বসিয়ে দ্ৰুপদকে শিখণ্ডিনীসহ বিনাশ করব।
Verse 8
बद्ध्वा पज्चालराजानमानयिष्यामहे गृहम् । अन्यं राजानमाधाय पज्चालेषु नरेश्वरम्,वहाँ महामना मित्र राजाओंका यह निश्चय घोषित हुआ कि राजन! यदि यह सत्य सिद्ध हुआ कि शिखण्डी वास्तवमें पुत्र नहीं कन्या है, तब हमलोग पांचालराजको कैद करके अपने घरको ले आयेंगे और पांचालदेशके राज्यपर दूसरे किसी राजाको बिठाकर शिखण्डीसहित द्रुपदको मरवा डालेंगे
আমরা পাঁচালরাজাকে বেঁধে নিজ গৃহে নিয়ে আসব; আর পাঁচালে অন্য এক নরেশকে প্রতিষ্ঠা করব।
Verse 9
घातयिष्याम नृपतिं पाउ्चालं सशिखण्डिनम्,वहाँ महामना मित्र राजाओंका यह निश्चय घोषित हुआ कि राजन! यदि यह सत्य सिद्ध हुआ कि शिखण्डी वास्तवमें पुत्र नहीं कन्या है, तब हमलोग पांचालराजको कैद करके अपने घरको ले आयेंगे और पांचालदेशके राज्यपर दूसरे किसी राजाको बिठाकर शिखण्डीसहित द्रुपदको मरवा डालेंगे
ভীষ্ম বললেন—“আমরা শিখণ্ডীসহ পাঞ্চাল-রাজাকে বধ করাব।” সেখানে মহাত্মা মিত্ররাজাদের সভায় এই সংকল্প প্রকাশিত হল—“রাজন, যদি প্রমাণিত হয় যে শিখণ্ডী প্রকৃতপক্ষে পুত্র নয়, কন্যা, তবে আমরা পাঞ্চালাধিপতিকে বন্দি করে নিজেদের গৃহে নিয়ে যাব, পাঞ্চালরাজ্যে অন্য এক রাজাকে প্রতিষ্ঠা করব, এবং শিখণ্ডীসহ দ্রুপদকে হত্যা করাব।”
Verse 10
तत् तथाभूतमाज्ञाय पुनर्दूतान्नराधिप: । प्रास्थापयत् पार्षताय निहन्मीति स्थिरो भव,फिर दूतके मुखसे उस समाचारको यथार्थ जानकर राजा हिरण्यवर्माने ट्रपदके पास दूत भेजा। स्थिर रहो (सावधान हो जाओ), मैं कुछ ही दिनोंमें तुम्हारा संहार कर डालूँगा
বিষয়টি সত্যিই তেমন হয়েছে জেনে সেই নৃপতি আবার পৃষতপুত্র দ্রুপদের কাছে দূত পাঠালেন এবং বলালেন—“দৃঢ় থাকো, সতর্ক হও; অল্প কয়েক দিনের মধ্যেই আমি তোমাকে বিনাশ করব।”
Verse 11
भीष्म उवाच स हि प्रकृत्या वै भीतः किल्विषी च नराधिप: । भयं तीव्रमनुप्राप्तो द्रपद: पृथिवीपति:,भीष्म कहते हैं--राजा द्रुपद उन दिनों स्वभावसे ही भीरु थे। फिर उनके द्वारा अपराध भी बन गया था। अतः उन्होंने बड़े भारी भयका अनुभव किया
ভীষ্ম বললেন—সেই নৃপতি স্বভাবতই ভীরু ছিলেন এবং তিনি অপরাধও করেছিলেন; তাই পৃথিবীপতি দ্রুপদ তীব্র ভয়ে আচ্ছন্ন হলেন।
Verse 12
विसृज्य दूतान् दाशार्णे द्रपद: शोकमूर्छित: । समेत्य भार्या रहिते वाक्यमाह नराधिप:,राजा द्रुपदने दशार्णनरेशके पास दूतोंको भेजकर शोकसे अधीर हो एकान्त स्थानमें अपनी पत्नीसे मिलकर इस विषयमें बातचीत करनेकी इच्छा की
দাশার্ণের রাজার কাছে দূত পাঠিয়ে দ্রুপদ শোকে মূর্ছিতপ্রায় হলেন। তারপর তিনি স্ত্রীকে সঙ্গে নিয়ে একান্ত স্থানে গিয়ে তার সঙ্গে কথা বললেন।
Verse 13
भयेन महता<5<विष्टो हृदि शोकेन चाहत: । पाज्चालराजो दयितां मातरं वै शिखण्डिन:,पांचालराजके हृदयमें बड़ा भारी भय समा गया था। वे शोकसे पीड़ित थे। अतः उन्होंने अपनी प्यारी पत्नी शिखण्डीकी मातासे इस प्रकार कहा--
হৃদয়ে মহাভয়ে আচ্ছন্ন এবং শোকে বিদ্ধ পাঞ্চাল-রাজা শিখণ্ডীর জননী, তাঁর প্রিয় পত্নীকে এইভাবে বললেন।
Verse 14
अभियास्यति मां कोपात् सम्बन्धी सुमहाबल: । हिरण्यवर्मा नृपति: कर्षमाणो वरूथिनीम्,'देवि! मेरे महाबली सम्बन्धी हिरण्यवर्मा क्रोधवश अपनी विशाल सेना लाकर मेरे ऊपर आक्रमण करेंगे
ক্রোধে উন্মত্ত আমার অতিমহাবলী আত্মীয়—নৃপতি হিরণ্যবর্মা—মহাসেনা সাজিয়ে টেনে এনে আমার উপর আক্রমণ করবে।
Verse 15
किमिदानीं करिष्यावो मूढौ कन्यामिमां प्रति । शिखण्डी किल पुत्रस्ते कन््येति परिशड्कित:,“इस समय हम दोनों क्या करें? इस कन्याके प्रश्नको लेकर हमलोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं। सम्बन्धीके मनमें यह शंका दृढ़मूल हो गयी है कि तुम्हारा पुत्र शिखण्डी वास्तवमें कन्या है
এখন আমরা দু’জন কী করব? এই কন্যাকে নিয়ে আমরা কিংকর্তব্যবিমূঢ়। (সবার মনে) দৃঢ় সন্দেহ জন্মেছে যে তোমার পুত্র শিখণ্ডী আসলে কন্যা।
Verse 16
इति संचिन्त्य यत्नेन समित्र: सबलानुग: । वज्चितो<स्मीति मन्वानो मां किलोद्धर्तुमिच्छति,“यह सोचकर वे ऐसा मानने लगे हैं कि मेरे साथ धोखा किया गया है और इसलिये वे अपने मित्रों, सैनिकों तथा सेवकोंसहित आकर मुझे यत्नपूर्वक उखाड़ फेंकना चाहते हैं। सुश्रोणि! यहाँ क्या सच है और क्या झूठ? शोभने! इस बातको तुम्हीं बताओ। तुम्हारे मुखसे निकले हुए शुभ वचनको सुनकर मैं वैसा ही करूँगा
এভাবে যত্ন করে চিন্তা করে, বন্ধুদের সঙ্গে এবং সৈন্যদলকে অনুসরণ করিয়ে, সে মনে করছে—‘আমাকে প্রতারিত করা হয়েছে’; তাই সে আমাকে উপড়ে ফেলতে আসতে চায়।
Verse 17
किमत्र तथ्यं सुश्रोणि मिथ्या कि ब्रूहि शोभने । श्र॒त्वा त्वत्त: शुभं वाक््यं संविधास्याम्यहं तथा,“यह सोचकर वे ऐसा मानने लगे हैं कि मेरे साथ धोखा किया गया है और इसलिये वे अपने मित्रों, सैनिकों तथा सेवकोंसहित आकर मुझे यत्नपूर्वक उखाड़ फेंकना चाहते हैं। सुश्रोणि! यहाँ क्या सच है और क्या झूठ? शोभने! इस बातको तुम्हीं बताओ। तुम्हारे मुखसे निकले हुए शुभ वचनको सुनकर मैं वैसा ही करूँगा
সুশ্রোণী, এ বিষয়ে কী সত্য আর কী মিথ্যা—হে শোভনে, আমাকে বলো। তোমার মুখনিঃসৃত শুভ বাক্য শুনে আমি তদনুযায়ী করব।
Verse 18
अहं हि संशयं प्राप्तो बाला चेयं शिखण्डिनी । त्वं च राज्ञि महत् कृच्छूं सम्प्राप्ता वरवर्णिनि,“रानी! मेरा जीवन संशयमें पड़ गया है। यह शिखण्डिनी भी बालिका ही है। सुन्दरि! तुम भी महान् संकटमें फँस गयी हो
হে রাণী, আমি গভীর সংশয়ে পড়েছি—এই শিখণ্ডিনী তো কেবল বালিকাই। আর হে সুন্দরবর্ণা, তুমিও মহাসঙ্কটে এসে পড়েছ।
Verse 19
सा त्वं सर्वविमोक्षाय तत्त्वमाख्याहि पूच्छत: । तथा विदध्यां सुश्रोणि कृत्यमाशु शुचिस्मिते,सुश्रोणि! मैं पूछ रहा हूँ। सबको संकटसे छुड़ानेके लिये कोई यथार्थ उपाय बताओ। शुचिस्मिते! मैं उस उपायको शीघ्र ही काममें लाऊँगा
অতএব, সুশ্রোণি! আমি জিজ্ঞাসা করছি—সকলকে এই বিপদ থেকে মুক্ত করার সত্য উপায় বলো। শুচিস্মিতে! তুমি বললেই আমি সেই প্রয়োজনীয় কর্ম শীঘ্রই সম্পাদন করব।
Verse 20
शिखण्डिनि च मा भैस्त्वं विधास्ये तत्र तत्त्वतः । कृपयाहं वरारोहे वज्चित: पुत्रधर्मत:
আর শিখণ্ডিনী সম্পর্কে তুমি ভয় কোরো না। সেখানে আমি তত্ত্ব বিচার করে যথাযথই আচরণ করব। বরারোহে! করুণার বশে আমি পুত্রধর্মের দ্বারা আবদ্ধ—প্রতারণার মতো—হয়ে পড়েছি।
Verse 21
“सुन्दर अंगोंवाली महारानी! तुम शिखण्डीके विषयमें भय मत करो। मैं दया करके वही कार्य करूँगा, जो वस्तुतः हितकारक होगा, मैं स्वयं पुत्रधर्मसे वंचित हो गया हूँ ।। मया दाशार्णको राजा वज्चित: स महीपति: । तदाचक्ष्व महाभागे विधास्ये तत्र यद्धितम्,“और मैंने दशार्णनरेश महाराज हिरण्यवर्माको भी वंचित किया है। अतः महाभागे! इस अवसरपर तुम्हारी दृष्टिमें जो हितकारक कार्य हो, उसे बताओ। मैं उसका अनुष्ठान करूँगा”
সুন্দর অঙ্গের মহারানী! শিখণ্ডীর কারণে তুমি ভয় কোরো না। করুণাবশে আমি সেই কাজই করব যা সত্যিই কল্যাণকর। আমি নিজেই পুত্রধর্ম থেকে বঞ্চিত হয়েছি। আর দশার্ণের রাজা—সেই ভূস্বামীকেও—আমি বঞ্চিত করেছি। অতএব, মহাভাগে! এ বিষয়ে তোমার দৃষ্টিতে যা হিতকর, তা বলো; আমি তাই করব।
Verse 22
जानता हि नरेन्द्रेण ख्यापनार्थ परस्य वै | प्रकाशं चोदिता देवी प्रत्युवाच महीपतिम्,यद्यपि राजा द्रुपद सब कुछ जानते थे तो भी दूसरे लोगोंमें अपनी निर्दोषता सिद्ध करनेके लिये महारानीसे स्पष्ट शब्दोंमें पूछा। उनके प्रश्न करनेपर रानीने राजाको इस प्रकार उत्तर दिया
যদিও নরেন্দ্র সবই জানতেন, তবু অন্যদের কাছে নিজের নির্দোষতা প্রকাশ করার জন্য তিনি মহারানীকে স্পষ্ট ভাষায় প্রশ্ন করলেন। প্রশ্নে প্ররোচিত হয়ে রাণী রাজাকে এইভাবে উত্তর দিলেন—
Verse 189
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अग्बोपाख्यानपर्वमें हिरण्यवमाकि दूतका आगमनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অগ্বোপাখ্যানপর্বে হিরণ্যবর্মার দূতের আগমন-বিষয়ক একশো ঊননব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 190
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि ट्रुपदप्रश्ने नवत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অম্বোপাখ্যানপর্বে দ্রুপদ-প্রশ্ন-প্রসঙ্গে একশো নব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The tension lies between social truthfulness and dynastic necessity: the royal household publicly asserts a son to secure succession aims and fulfill a divine condition, while privately maintaining secrecy—raising questions about legitimacy, disclosure, and duty-driven expedients.
Bhīṣma’s narrative frames outcomes as shaped by intertwined human policy (austerity, concealment, rites) and daiva-niyati (the declared inevitability of the boon), emphasizing that strategic realities in governance often arise from earlier vows, rituals, and carefully managed public narratives.
No explicit phalaśruti appears in this chapter-unit; its meta-function is explanatory rather than devotional, supplying causal background (including reference to Nārada and Ambā’s tapas) to contextualize later constraints in the epic’s conflict-logic.