Adhyaya 179
Udyoga ParvaAdhyaya 17943 Versesसमता और उग्रता—अस्त्र-प्रतिअस्त्र की बराबरी; निर्णायक बढ़त किसी को नहीं, प्रकृति-जनित विराम से संघर्ष क्षण भर ठहरता है।

Adhyaya 179

भीष्म–रामजामदग्न्ययुद्धप्रस्थानवर्णनम् (Bhishma’s Account of Parashurama’s Challenge and the March to Kurukshetra)

Upa-parva: Bhīṣma–Jāmadagnya Saṃvāda (Episode of Bhishma and Parashurama)

Chapter 179 presents Bhīṣma’s first-person recollection of Rāma Jāmadagnya issuing a confrontational summons, including a pledge to meet at Kurukṣetra and a severe verbal provocation involving Gaṅgā witnessing Bhīṣma’s defeat. Bhīṣma assents with formal deference, reports the matter to Satyavatī, and undergoes auspicious preparations. The narrative details his ceremonial departure—white attire, chariot, weapons, attendants—framing combat as a regulated public act rather than impulsive violence. Upon arrival at Kurukṣetra, both champions stand ready; Bhīṣma sounds the conch, while ascetics, sages, and divine beings gather as observers and omens appear (garlands, celestial instruments, cloud formations). Gaṅgā manifests and questions Bhīṣma’s intent, seeking to dissuade Rāma Jāmadagnya from fighting his disciple; she petitions him, but he redirects responsibility back to Bhīṣma. Gaṅgā returns to Bhīṣma, whose refusal is marked by anger, and the chapter closes with the appearance of the great ascetic Bhārgava, calling again for battle—tightening the ethical tension between mediation, authority, and kṣatriya resolve.

Chapter Arc: भीष्म अपने ही मुख से उस अद्भुत प्रसंग का वृत्तांत उठाते हैं—जब परशुराम (जामदग्न्य राम) ने उन्हें रणभूमि में ललकारा और सारथि, घोड़े, रथ—सब युद्ध के लिए तत्पर किए गए। → प्रभात होते ही दोनों महावीर आमने-सामने आते हैं। परशुराम दिव्यास्त्रों की वर्षा करते हैं और भीष्म उन्हें रोकते जाते हैं। रथों की गति, कवच-धारण, और प्रत्यस्त्रों की टक्कर से आकाश भरता जाता है; भीष्म घायल होकर क्षण भर के लिए कश्मल में पड़ते हैं, पर सारथि उन्हें संभाल लेता है। → भीष्म परशुराम-वध की इच्छा से एक दीप्त, काल-सम्मित बाण छोड़ते हैं; उसी के साथ दोनों ओर से अस्त्रों का ऐसा घनघोर संग्राम छिड़ता है कि बाण-समूह मेघों की तरह सूर्य को ढक देते हैं, वायु की गति रुक-सी जाती है, और परस्पर घर्षण से अग्नि प्रकट होकर बाणों को भस्म कर देती है। → अस्त्रों की टक्कर से उत्पन्न अग्नि में बाण जलकर राख हो जाते हैं और भूमि पर गिर पड़ते हैं—क्षणिक विराम-सा बनता है, मानो प्रकृति स्वयं इस उग्रता को थाम रही हो। → दोनों महावीरों का संकल्प शिथिल नहीं—अस्त्र-शस्त्र का यह विराम अगले प्रहार की भूमिका बनकर रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

नसजआा न (0) आसजअस+- अशीर्त्याधेकशततमो< ध्याय: भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध भीष्म उवाच आत्मनस्तु ततः सूतो हयानां च विशाम्पते । मम चापनयामास शल्यान्‌ कुशलसम्मतः

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তারপর আমার কর্তব্যে দক্ষ ও সম্মানিত সারথি আমার দেহে এবং অশ্বদের দেহে বিদ্ধ হয়ে থাকা তীরগুলি তুলে দিল।

Verse 2

सस्‍्नातापवृत्तैस्तुरगैर्लब्धतोयैरविद्वलै: । प्रभाते चोदिते सूर्य ततो युद्धमवर्तत

অশ্বদের হাঁটানো হলো, গড়াগড়ি দিয়ে স্নান করানো হলো, তারপর জল পান করানো হলো। এভাবে তারা সতেজ ও শান্ত হলে, প্রভাতে সূর্যোদয়ের সঙ্গে সঙ্গে যুদ্ধ আবার শুরু হলো।

Verse 3

दृष्टवा मां तूर्णमायान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम्‌ । अकरोद्‌ रथमत्यर्थ राम: सज्जं प्रतापवान्‌,मुझे रथपर बैठकर कवच धारण किये शीघ्रता-पूर्वक आते देख प्रतापी परशुरामजीने अपने रथको अत्यन्त सुसज्जित किया

আমাকে রথে স্থিত, বর্মধারী হয়ে দ্রুত এগিয়ে আসতে দেখে প্রতাপবান রাম (পরশুরাম) নিজের রথকে অত্যন্ত সুসজ্জিত করলেন।

Verse 4

ततो<हं राममायान्तं दृष्टवा समरकाड्क्षिणम्‌ । धनु: श्रेष्ठ समुत्सूज्य सहसावतरं रथात्‌,तदनन्तर युद्धकी इच्छावाले परशुरामजीको आते देख मैं अपना श्रेष्ठ धनुष छोड़कर सहसा रथसे उतर पड़ा

তারপর যুদ্ধকামী রাম (পরশুরাম) কে এগিয়ে আসতে দেখে আমি আমার শ্রেষ্ঠ ধনুক ত্যাগ করে হঠাৎই রথ থেকে নেমে পড়লাম।

Verse 5

अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्म भारत । युयुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभी: स्थित:,भारत! पूर्ववत्‌ गुरुको प्रणाम करके अपने रथपर आखरूढ़ हो युद्धकी इच्छासे परशुरामजीके सामने मैं निर्भय होकर डट गया

হে ভারত! পূর্বের মতোই গুরুকে প্রণাম করে আমি রথে উঠলাম; তারপর যুদ্ধকামী হয়ে জামদগ্ন্য (পরশুরাম)-এর সম্মুখে নির্ভয়ে স্থির হয়ে দাঁড়ালাম।

Verse 6

ततो<हं शरवर्षेण महता समवाकिरम्‌ | सच मां शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरत्‌,तदनन्तर मैंने उनपर बाणोंकी भारी वर्षा की। फिर उन्होंने भी बाणोंकी वर्षा करनेवाले मुझ भीष्मपर बहुत-से बाण बरसाये

তখন আমি তাঁর উপর প্রবল তীরবৃষ্টি বর্ষণ করলাম। এরপর তিনি পাল্টা তীরবৃষ্টি করে, তীরঝড় ছড়াতে থাকা আমাকে—ভীষ্মকে—অসংখ্য শরে আচ্ছন্ন করলেন।

Verse 7

संक़्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव सुतेजितान्‌ । सम्प्रैषीन्मे शरान्‌ घोरान्‌ दीप्तास्थानुरगानिव

তারপর জামদগ্ন্য পরশুরাম আবার প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠে, জ্বলন্ত মুখবিশিষ্ট সাপের মতো দীপ্তিতে শানিত ভয়ংকর তীর আমার দিকে নিক্ষেপ করলেন।

Verse 8

ततो<हं निशितैर्भल्लै: शतशो5थ सहस्रश: । अच्छिदं सहसा राजजन्नन्तरिक्षे पुन: पुन:

হে রাজন, তখন আমি ক্ষুরধার ভল্ল তীরে মুহূর্তে আকাশেই সেগুলিকে শত শত, সহস্র সহস্র খণ্ডে খণ্ডে কেটে দিলাম—বারবার।

Verse 9

ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्य: प्रतापवान्‌ । मयि प्रयोजयामास तान्यहं प्रत्यषेधयम्‌

তারপর পরাক্রান্ত জামদগ্ন্য আমার বিরুদ্ধে দিব্য অস্ত্র প্রয়োগ করলেন; আর আমি সেগুলি প্রতিহত করে নিবৃত্ত করলাম।

Verse 10

ततो दिवि महान्‌ नाद: प्रादुरासीत्‌ू समन्ततः

তখন আকাশে চারদিকে এক মহা গর্জন উঠল। সেই মুহূর্তে আমি জামদগ্ন্যের বিরুদ্ধে বায়ব্য অস্ত্র প্রয়োগ করলাম। হে ভারত, পরশুরাম গুহূক অস্ত্র দ্বারা আমার সেই অস্ত্রকে শান্ত করে দিলেন।

Verse 11

ततो5हमस्त्र॑ वायव्यं जामदग्न्ये प्रयुक्तवान्‌ । प्रत्याजघ्ने च तद्‌ रामो गुह्मुकास्त्रेण भारत

তখন আমি জামদগ্নিপুত্রের বিরুদ্ধে বায়ব্যাস্ত্র নিক্ষেপ করলাম। কিন্তু, হে ভারত! রাম (পরশুরাম) গুহ্মুকাস্ত্র দ্বারা তা প্রতিহত করে নিস্তেজ করে দিলেন।

Verse 12

ततो5हमस्त्रमाग्नेयमनुमन्त्र्य प्रयुक्तवान्‌ । वारुणेनैव तद्‌ रामो वारयामास मे विभु:

তারপর মন্ত্রবলে অভিমন্ত্রিত করে আমি আগ্নেয়াস্ত্র নিক্ষেপ করলাম; কিন্তু সর্বশক্তিমান রাম (পরশুরাম) বরুণাস্ত্র দ্বারা তৎক্ষণাৎ তা রোধ করলেন।

Verse 13

एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारयम्‌ । रामश्न मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिंदम:

এইভাবে আমি রাম (পরশুরাম)-এর দিব্যাস্ত্রসমূহ প্রতিহত করতাম; আর সেই তেজস্বী, দিব্যাস্ত্রবিদ্‌ ও শত্রুদমন রামও আমার অস্ত্রসমূহ নিষ্ফল করে দিতেন।

Verse 14

ततो मां सव्यतो राजन्‌ राम: कुर्वन्‌ द्विजोत्तम: । उरस्यविध्यत्‌ संक़्रुद्धो जामदग्न्य: प्रतापवान्‌

তখন, হে রাজন! ক্রোধে উন্মত্ত প্রতাপশালী দ্বিজশ্রেষ্ঠ জামদগ্ন্য রাম আমার বাম দিক থেকে এসে বক্ষে বাণ বিদ্ধ করলেন।

Verse 15

ततो<हं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे । ततो मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमुदावहत्‌

তখন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আহত হয়ে আমি সেই উৎকৃষ্ট রথে ঢলে পড়লাম। আমাকে মূর্ছা ও বিভ্রান্তিতে আচ্ছন্ন দেখে সারথি দ্রুত আমাকে সেখান থেকে সরিয়ে নিল।

Verse 16

ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम्‌ । ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, পরশুরামের বাণে পীড়িত হয়ে আমি ক্লান্তিতে আচ্ছন্ন হলাম। তারপর গুরুতর আহত ও অচেতন অবস্থায় আমি রণভূমি থেকে সরে গেলাম। আমাকে সেই অবস্থায় দেখে পরশুরামের অনুচররা—অকৃতব্রণ প্রমুখ—এবং কাশীরাজার কন্যা অম্বা আনন্দে উচ্চ কোলাহল তুলল।

Verse 17

रामस्यानुचरा हृष्टा: सर्वे दृष्टवा विचुक्रुशु: । अकृतब्रणप्रभूतयः काशिकन्या च भारत

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত, আমাকে দেখে রামের (পরশুরামের) সব অনুচর আনন্দে চিৎকার করে উঠল—অকৃতব্রণ প্রমুখ এবং কাশীর রাজকন্যাও। কারণ পরশুরামের বাণে আমি ভীষণ পীড়িত হয়ে আহত ও অচেতন অবস্থায় রণভূমি থেকে সরে গিয়েছিলাম। আমাকে এমন দেখে তারা প্রভুর বিজয়ের লক্ষণ মনে করে উচ্চ কোলাহল তুলল।

Verse 18

ततस्तु लब्धसंज्ञो5हं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम्‌ । याहि सूत यतो राम: सज्जो5हं गतवेदन:

তখন আমার জ্ঞান ফিরে এল। সব বুঝে আমি সারথিকে বললাম—“হে সূত, যেখানে রাম (পরশুরাম) আছেন, সেখানেই চলো। আমার বেদনা দূর হয়েছে; আমি এখন যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত।”

Verse 19

ततो मामवहत्‌ सूतो हयै: परमशोभि तै: । नृत्यद्धिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गती

তারপর, হে কৌরব্য, আমার সারথি আমাকে সেই অতিশয় শোভন অশ্বদের দ্বারা এগিয়ে নিয়ে গেল—যাদের বায়ুর মতো বেগে চলার ভঙ্গি নৃত্যরত বলেই মনে হচ্ছিল।

Verse 20

ततो<हं राममासाद्य बाणवर्षैक्ष॒ कौरव । अवाकिरं सुसंरब्ध: संरब्धं च जिगीषया

তারপর, হে কৌরব, আমি রামের (পরশুরামের) কাছে পৌঁছে, জয়ের সংকল্পে নিজেও ক্রোধে দগ্ধ হয়ে, তাঁর উপর বাণের বর্ষা আরম্ভ করলাম।

Verse 21

तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्ागान्‌ । बाणैरेवाच्छिनत्‌ तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे,किंतु परशुरामजीने सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले उन बाणोंके आते ही एक-एकको तीन-तीन बाणोंसे तुरंत काट दिया

রামের সেই সাপের মতো বাণগুলি যখন সোজা তার দিকে ধেয়ে এল, তখন তিনি যুদ্ধক্ষেত্রে তৎক্ষণাৎ নিজের বাণে—প্রতিটি বাণকে তিনটি করে বাণ দিয়ে—কেটে ফেললেন।

Verse 22

ततस्ते सूदिता: सर्वे मम बाणा: सुसंशिता: । रामबाणैदविधा छिन्ना: शतशो5थ सहसत्रश:,इस प्रकार मेरे चलाये हुए वे सब सैकड़ों और हजारों तीखे बाण परशुरामजीके सायकोंसे कटकर दो-दो टूक हो नष्ट हो गये

তখন আমার ছোড়া সেই সব অত্যন্ত ধারালো বাণ রামের বাণে কেটে দু’টুকরো হয়ে গেল—শত শত নয়, সহস্র সহস্র—এবং নিষ্ফল হয়ে পড়ল।

Verse 23

ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसम्मितम्‌ । असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया,तब मैंने पुनः जमदग्निनन्दन परशुरामकी ओर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे एक कालाग्निके समान प्रज्वलित तथा तेजस्वी बाण छोड़ा

তারপর আবার, তাঁকে নিধন করার অভিপ্রায়ে, আমি জামদগ্ন্য রাম (পরশুরাম)-এর দিকে এক দীপ্তিমান, অতি উজ্জ্বল বাণ নিক্ষেপ করলাম—যেন কাল (মৃত্যু)-সম শক্তিতে মাপা।

Verse 24

तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः । मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह,उसकी गहरी चोट खाकर परशुरामजी उस बाणके वेगके अधीन हो समरभूमिमें मूर्च्छित हो गये और धरतीपर गिर पड़े

সেই বাণের গভীর আঘাতে আহত হয়ে, তার বেগের বশবর্তী হয়ে, রাম (পরশুরাম) যুদ্ধক্ষেত্রে মূর্ছিত হলেন এবং ভূমিতে লুটিয়ে পড়লেন।

Verse 25

ततो हाहाकृतं सर्व रामे भूतलमश्रिते । जगदू भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत्‌,परशुरामके पृथ्वीपर गिरते ही मानो आकाशसे सूर्य टूटकर गिरे हों, ऐसा समझकर सारा जगत्‌ भयभीत हो हाहाकार करने लगा

রাম (পরশুরাম) ভূমিতে পতিত হতেই সর্বত্র হাহাকার উঠল। হে ভারত! সমগ্র জগৎ ভয়ে কেঁপে উঠল—যেন আকাশ থেকে সূর্যই পড়ে গেল।

Verse 26

तत एनं समुद्विग्ना: सर्व एवाभिदुद्रुवु: । तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन

তখন সকলেই গভীর উদ্বেগে একযোগে তার দিকে ছুটে এল। হে কুরু-নন্দন! সেই তপোধন ঋষিগণ এবং কাশীরাজার কন্যাও তাড়াতাড়ি কাছে এসে তাকে বুকে জড়িয়ে ধরল, স্নিগ্ধ হাতে সান্ত্বনা দিল, শীতল জল ছিটিয়ে বিজয়সূচক আশীর্বাদ করে তার দুঃখ প্রশমিত করতে লাগল।

Verse 27

तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा । पाणिभिर्जलशीतैश्न जयाशीर्भिक्ष कौरव

তারপর তারা তাকে আলিঙ্গন করে ধীরে ধীরে আশ্বাস দিতে লাগল। জলে শীতল করা হাতে তাকে স্নিগ্ধভাবে ছুঁয়ে সান্ত্বনা দিল, শীতল জল ছিটাল, আর বলল—“কৌরব, জয়লাভ করো”—এইরূপ বিজয়সূচক আশীর্বাদে, হে কুরু-নন্দন, তার অস্থিরতা প্রশমিত করল।

Verse 28

ततः स विह्लं वाक्‍्यं राम उत्थाय चाब्रवीत्‌ | तिष्ठ भीष्म हतो$सीति बाणं संधाय कार्मुके

তারপর কিছুটা সামলে পরশুরাম (রাম) উঠে দাঁড়ালেন এবং ধনুকে তীর জুড়ে কাঁপা কণ্ঠে বললেন—“ভীষ্ম! দাঁড়াও; এখন তুমি নিহত।”

Verse 29

स मुक्तो न्‍्यपतत्‌ तूर्ण सब्ये पाश्वे महाहवे । येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुम:

সেই মহাযুদ্ধে তাঁর ধনুক থেকে ছোড়া তীরটি দ্রুত এসে আমার বাঁ দিকের পাঁজরে বিঁধল; সেই আঘাতে আমি প্রবলভাবে বিচলিত হয়ে ঝড়ে দুলতে থাকা বৃক্ষের মতো টলতে লাগলাম।

Verse 30

हत्वा हयांस्ततो राम: शीघ्रास्त्रेण महाहवे । अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैलोमवाहिभि:

তারপর সেই মহাসমরে রাম (পরশুরাম) দ্রুতাস্ত্র প্রয়োগ করে আমার ঘোড়াগুলোকে হত্যা করলেন; এরপর নির্ভীক ও অবিচল হয়ে ডানায় ভর করে উড়ে আসা তীরের মতো অসংখ্য বাণে আমাকে আচ্ছন্ন করে দিলেন।

Verse 31

ततो5हमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम्‌ | अवासूजं महाबाहो तेडन्तराधिछिता: शतः

তখন আমিও, হে মহাবাহু, সমরের অগ্রগতি রোধকারী এক দ্রুত অস্ত্র নিক্ষেপ করলাম; আর তার মধ্যবর্তী পরিসরে পড়ে থাকা সেই যোদ্ধাদের মধ্যে শতজন বিদ্ধ হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 32

रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः । महाबाहो! तत्पश्चात्‌ मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे। मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ।।

তারপর, হে মহাবাহু, আমিও দ্রুত এমন অস্ত্র প্রয়োগ করতে লাগলাম যা রণক্ষেত্রে প্রতিপক্ষের গতি রুদ্ধ করে। আমার ও পরশুরামের বাণ চারদিকে আকাশে ছড়িয়ে পড়ল, তবু তারা মাঝখানেই স্থির হয়ে রইল—যেন শরের জালে আকাশ আচ্ছন্ন, আর সূর্যও সেই জালের আড়ালে ম্লান তাপে জ্বলছে।

Verse 33

ततो वायो: प्रकम्पाच्च सूर्यस्थ च गभस्तिभि:

তখন বায়ুর কম্পন থেকে এবং সূর্যের কিরণ থেকেও অশান্তির লক্ষণ প্রকাশ পেল—যেন আসন্ন ধর্মসংকটের টানে প্রকৃতির তত্ত্বসমূহও বিচলিত হয়ে উঠল।

Verse 34

ते शरा: स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना

সেই শরগুলি নিজেদেরই তেজে প্রজ্বলিত হয়ে উঠল এবং আশ্চর্য দীপ্তিতে দাউদাউ করে জ্বলতে লাগল—যেন স্বয়ং অগ্নিময় হয়ে গেছে।

Verse 35

तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च

তখন সংখ্যা ক্রমে বেড়ে উঠল—লক্ষ লক্ষ, দশ হাজারের দশ হাজার, এমনকি অর্বুদ পর্যন্ত—যেন গণনার সীমাও সেই বিরাট দৃশ্যের সামনে হার মানল।

Verse 36

अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव । राम: शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्ण न्‍्यपातयत्‌

হে কৌরব! তখন ক্রোধে দগ্ধ রাম (পরশুরাম) অতি দ্রুত আমার উপর অসংখ্য শরবর্ষণ করলেন—অযুত থেকে খর্ব-নিখর্ব পর্যন্ত—শুধু প্রবল বেগে আমাকে পর্যুদস্ত করবার অভিপ্রায়ে।

Verse 37

कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ।।

তখন, হে নৃপতি! রণে আমি বিষধর সাপসম ভয়ংকর আমার শর দ্বারা সেই সকল শর ছিন্ন করে বনভূমিতে গাছ কাটা পড়ার মতো ভূমিতে ফেলে দিলাম। এভাবে পরশুরামের উন্মত্ত শরবর্ষা নিষ্ফল করে অস্ত্রঝড়ের মধ্যেও স্থৈর্য রক্ষা করলাম।

Verse 38

एवं तदभवद्‌ युद्ध तदा भरतसत्तम । संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात्‌ स च मे गुरु:,भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा। संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এইরূপে তখন যুদ্ধ চলতে থাকল। কিন্তু সন্ধ্যাকাল অতিবাহিত হলে আমার গুরু (পরশুরাম)ও রণক্ষেত্র থেকে সরে গেলেন।

Verse 96

अस्त्रैरेव महाबाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रियाम्‌ इसके पश्चात्‌ प्रतापी परशुरामजीने मेरे ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया; परंतु महाबाहो! मैंने उनसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेकी इच्छा रखकर उन सब अस्त्रोंका दिव्यास्त्रोंद्ारा ही निवारण कर दिया

এরপর, হে মহাবাহো! প্রতাপশালী পরশুরাম আমার উপর দিব্যাস্ত্র প্রয়োগ করতে আরম্ভ করলেন। কিন্তু অধিক বীর্য প্রদর্শনের অভিপ্রায়ে আমি সেই সকল অস্ত্রকে দিব্যাস্ত্র দ্বারাই প্রতিহত করে নিষ্ফল করলাম।

Verse 180

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे अशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অম্বোপাখ্যানপর্বে রাম-ভীষ্ম-যুদ্ধবর্ণনাসংক্রান্ত একশো আশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 326

मातरिश्वा ततस्तस्मिन्‌ मेघरुद्ध इवाभवत्‌ । उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो

তখন সেই সংঘর্ষে মাতরিশ্বান (বায়ু) যেন মেঘে রুদ্ধ হয়ে পড়ল। তীরের ঘন বর্ষায় আকাশ আচ্ছন্ন হওয়ায় সূর্যের তাপও পৌঁছাত না, আর বায়ুর গতিও এমন স্তব্ধ হয়ে গেল, যেন মেঘই তাকে আটকে দিয়েছে।

Verse 336

अभिषातप्रभावाच्च पावक: समजायत | उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे। उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी

আর আঘাতের প্রবলতায় সেখানেই অগ্নি উদ্ভূত হল। তখন বায়ুর কম্পন ও সূর্যকিরণের প্রভাবে সব তীর পরস্পর সংঘর্ষে লিপ্ত হল; তাদের ঘর্ষণ থেকেই সেখানে আগুন জ্বলে উঠল।

Verse 346

भूमौ सर्वे तदा राजन्‌ भस्म भूता: प्रपेदिरे । राजन! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े

রাজন! তখন সেই সব তীর নিজেদেরই সংঘর্ষে উৎপন্ন অগ্নিতে দগ্ধ হয়ে ভস্মীভূত হল এবং ভূমিতে পড়ে গেল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is the collision between obedience/constraint within guru–disciple norms and the kṣatriya obligation to answer a public challenge tied to honor, vows, and prior contested events—tested further by maternal mediation urging de-escalation.

The chapter models how epic actors frame conflict as accountable action: decisions are made publicly, through ritual readiness and articulated reasons, while recognizing that authority (guru, kin, ascetic prestige) can compete without yielding an easy hierarchy.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter’s meta-function is structural—establishing Bhīṣma’s stature, clarifying causal memory, and embedding the war’s approach within a broader ethic of vows, procedure, and contested authority.