
अम्बोपाख्याने तापसानां विचारः तथा होत्रवाहनस्य उपदेशः (Ambā among ascetics; Hotravāhana directs her to Paraśurāma)
Upa-parva: Ambopākhyāna (Episode of Ambā) — Bhīṣma’s recollection within Udyoga-parva
Bhīṣma narrates how forest ascetics, concerned for Ambā’s welfare, debate appropriate action: some advise returning her to her father’s house; others consider confronting the Śālva ruler, though several reject this since she has already been refused. The ascetics argue that a young royal woman’s renunciation is exceptionally difficult and exposes her to risks in remote forests; they propose paternal protection as the most legitimate refuge, citing the normative rule that a woman’s ‘gati’ is her husband in stable circumstances and her father in adversity. Ambā counters that returning to Kāśī would bring certain disdain from kin and insists on pursuing austerity to avert lasting misfortune. At this juncture the royal sage Hotravāhana arrives, is honored by the ascetics, hears Ambā’s full account, and grieves. He urges her not to return to her paternal home, offers protection as her maternal progenitor, and proposes a remedial course: she should go to Rāma Jāmadagnya (Paraśurāma), whose authority and power can remove her sorrow and, if necessary, compel Bhīṣma through combat. Ambā agrees to proceed but asks how Paraśurāma will practically resolve her intense suffering.
Chapter Arc: भीष्म की अनुमति पाकर काशी-राजकन्या अम्बा वृद्ध ब्राह्मणों और धाय के संरक्षण में शाल्व के नगर की ओर प्रस्थान करती है—अपने अपमान और अधूरे वर-वरण को पूर्ण करने की अंतिम आशा लेकर। → अम्बा शाल्व के समक्ष अपना अभिप्राय स्पष्ट करती है—‘मैं तुम्हारे लिए आई हूँ’; पर शाल्व के मन में राजधर्म, लोकलज्जा और ‘पर-पुरुष द्वारा जीती/स्पर्श की गई’ स्त्री को स्वीकार न करने का कठोर संकल्प टकराता है। अम्बा विनय, तर्क और अनुनय से उसे मनाने का प्रयास करती है, पर शाल्व का निर्णय और कठोर होता जाता है। → शाल्व धर्मोपदेश-सा करते हुए अम्बा को लौटा देता है—‘तुम पहले ही अन्य की हो चुकी; समय व्यर्थ न करो, जहाँ उचित हो वहाँ जाओ’; और अम्बा को ‘जीर्ण त्वचा की भाँति’ त्याग देता है। → अम्बा की आशा टूटती है; वह समझती है कि न शाल्व उसे अपनाएगा, न उसका अपमान मिटेगा। उसके भीतर दोषारोपण और आत्मग्लानि की आँधी उठती है—कभी शाल्व, कभी भीष्म, कभी पिता के स्वयंवर-आयोजन, और अंततः अपने निर्णयों को वह इस दुर्दशा का कारण मानने लगती है। → अम्बा के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला आकार लेने लगती है—अब वह किसके विरुद्ध, किस मार्ग से न्याय/प्रतिशोध साधेगी, और उसका अगला आश्रय कौन होगा?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अमग्बोपाख्यानपर्वमें अग्बावाक्यविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७४ ॥/ जज बक। अफि्--"ऋाझ पजञज्चसप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: अम्बाका शाल्वके यहाँ जाना और उससे परित्यक्त होकर तापसोंके आश्रममें आना, वहाँ शैखावत्य और अम्बाका संवाद भीष्म उवाच ततो<हं समनुज्ञाप्य कालीं गन्धवतीं तदा । मन्सत्रिण श्चर्विजश्चैव तथैव च पुरोहितान्
ভীষ্ম বললেন—তখন আমি কালী (গন্ধবতী)-র নিকট যথাবিধি অনুমতি নিয়ে, মন্ত্রীদের, ব্রাহ্মণদের এবং পুরোহিতদের কাছ থেকেও তদ্রূপ বিদায় নিলাম।
Verse 2
अनुज्ञाता ययौ सा तु कन्या शाल्वपते: पुरम्,आज्ञा पाकर राजकन्या अम्बा वृद्ध ब्राह्मणोंके संरक्षणमें रहकर शाल्वराजके नगरकी ओर गयी। उसके साथ उसकी धाय भी थी। उस मार्गको लाँचधचकर वह राजाके यहाँ पहुँच गयी और शाल्वराजसे मिलकर इस प्रकार बोली--“महाबाहो! महामते! मैं तुम्हारे पास ही आयी हूँ
অনুমতি পেয়ে সেই কন্যা অম্বা শাল্বপতির নগরের দিকে রওনা হল। তখন সে বৃদ্ধ ব্রাহ্মণদের রক্ষায় এবং ধাত্রীসহ সেই পথ অতিক্রম করে সেখানে পৌঁছাল। পরে শাল্বের কাছে গিয়ে সে বলল—“হে মহাবাহু, হে মহানমতি, আমি তোমাকেই শরণ করে এসেছি।”
Verse 3
वृद्धैर्दधिजातिभिगुप्ता धात्रया चानुगता तदा । अतीत्य च तमध्वानमासाद्य नृपतिं तथा,आज्ञा पाकर राजकन्या अम्बा वृद्ध ब्राह्मणोंके संरक्षणमें रहकर शाल्वराजके नगरकी ओर गयी। उसके साथ उसकी धाय भी थी। उस मार्गको लाँचधचकर वह राजाके यहाँ पहुँच गयी और शाल्वराजसे मिलकर इस प्रकार बोली--“महाबाहो! महामते! मैं तुम्हारे पास ही आयी हूँ
তখন সে বৃদ্ধ ব্রাহ্মণদের দ্বারা রক্ষিত ছিল এবং ধাত্রীও তার সঙ্গে ছিল। সেই দীর্ঘ পথ অতিক্রম করে সে যথারীতি রাজার কাছে পৌঁছাল।
Verse 4
सा तमासाद्य राजानं शाल्वं वचनमत्रवीत् | आगताहं महाबाहो त्वामुद्दिश्य महामते,आज्ञा पाकर राजकन्या अम्बा वृद्ध ब्राह्मणोंके संरक्षणमें रहकर शाल्वराजके नगरकी ओर गयी। उसके साथ उसकी धाय भी थी। उस मार्गको लाँचधचकर वह राजाके यहाँ पहुँच गयी और शाल्वराजसे मिलकर इस प्रकार बोली--“महाबाहो! महामते! मैं तुम्हारे पास ही आयी हूँ
তিনি শাল্বরাজের কাছে পৌঁছে বললেন— “মহাবাহো, মহামতে! তোমাকেই উদ্দেশ্য করে আমি এখানে এসেছি।”
Verse 5
(अभिनन्दस्व मां राजन् सदा प्रियहिते रताम् । प्रतिपादय मां राजन् धर्मार्थ चैव धर्मतः ।। त्वं हि मनसा ध्यातस्त्वया चाप्युपमन्त्रिता ।। ) “राजन! मैं सदा तुम्हारे प्रिय और हितमें तत्पर रहनेवाली हूँ। मुझे अपनाकर आनन्दित करो। नरेश्वर! मुझे धर्मानुसार ग्रहण करके धर्मके लिये ही अपने चरणोंमें स्थान दो। मैंने मन-ही-मन सदा तुम्हारा ही चिन्तन किया है और तुमने भी एकान्तमें मेरे साथ विवाहका प्रस्ताव किया था!। तामब्रवीच्छाल्वपति: स्मयन्निव विशाम्पते । त्वयान्यपूर्वया नाहं भार्यार्थी वरवर्णिनि,प्रजानाथ! अम्बाकी बात सुनकर शाल्वराजने मुसकराते हुए-से कहा--'सुन्दरी! तुम पहले दूसरेकी हो चुकी हो; अतः तुम्हारी-जैसी स्त्रीके साथ विवाह करनेकी मेरी इच्छा नहीं है
“রাজন! আমি সর্বদা তোমার প্রিয় ও হিতসাধনে নিবিষ্ট; আমাকে গ্রহণ করে আনন্দিত হও। নরেশ্বর! ধর্মানুসারে, ধর্মের জন্যই আমাকে গ্রহণ করে তোমার চরণে স্থান দাও। আমি মনে মনে সর্বদা তোমাকেই ধ্যান করেছি, আর তুমিও একান্তে আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিয়েছিলে।” এ কথা শুনে শাল্বপতি মৃদু হাসি হেসে বললেন— “সুন্দরী! তুমি পূর্বে অন্যের হয়েছ; তাই তোমাকে স্ত্রী করতে আমার ইচ্ছা নেই।”
Verse 6
गच्छ भद्रे पुनस्तत्र सकाशं भीष्मकस्य वै । नाहमिच्छामि भीष्मेण गृहीतां त्वां प्रसह वै,'भद्रे! तुम पुनः वहाँ भीष्मके ही पास जाओ। भीष्मने तुम्हें बलपूर्वक पकड़ लिया था, अतः अब तुम्हें मैं अपनी पत्नी बनाना नहीं चाहता
“ভদ্রে! তুমি আবার সেখানে ভীষ্মের নিকট ফিরে যাও। ভীষ্ম বলপূর্বক তোমাকে গ্রহণ করেছিল; তাই আমি তোমাকে স্ত্রী হিসেবে গ্রহণ করতে চাই না।”
Verse 7
त्वं हि भीष्मेण निर्जित्य नीता प्रीतिमती तदा । परामृश्य महायुद्धे निर्जित्य पृथिवीपतीन्,'भीष्मने उस महायुद्धमें समस्त भूपालोंको हराकर तुम्हें जीता और तुम्हें उठाकर वे अपने साथ ले गये। तुम उस समय उनके साथ प्रसन्न थीं
“ভীষ্ম সেই মহাযুদ্ধে পৃথিবীর রাজাদের পরাজিত করে তোমাকে জয় করেছিল এবং তোমাকে নিয়ে গিয়েছিল; আর তখন তুমি আনন্দিতচিত্তে তার সঙ্গে গিয়েছিলে।”
Verse 8
नाहं त्वय्यन्यपूर्वायां भार्यार्थी वरवर्णिनि | कथमस्मद्विधो राजा परपूर्वा प्रवेशयेत्,“वरवर्णिनि! जो पहले औरकी हो चुकी हो, ऐसी स्त्रीको मैं अपनी पत्नी बनाऊँ, यह मेरी इच्छा नहीं है। जिस नारीपर पहले किसी दूसरे पुरुषका अधिकार हो गया हो, उसे सारी बातोंको ठीक-ठीक जाननेवाला मेरे-जैसा राजा जो दूसरोंको धर्मका उपदेश करता है, कैसे अपने घरमें प्रविष्ट करायेगा। भद्रे! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुम्हारा यह समय यहाँ व्यर्थ न बीते”
“সুন্দরী! যে নারী পূর্বে অন্যের হয়েছে, তাকে স্ত্রী করতে আমার ইচ্ছা নেই। যে নারীর উপর আগে অন্য পুরুষের অধিকার ছিল, তাকে ধর্মের উপদেশদাতা ও বিষয়বুদ্ধিসম্পন্ন আমার মতো রাজা কীভাবে নিজের গৃহে প্রবেশ করাবে? ভদ্রে! তোমার যেখানে ইচ্ছা, সেখানে যাও; এখানে তোমার সময় বৃথা যাক না।”
Verse 9
नारीं विदितविज्ञान: परेषां धर्ममादिशन् । यथेष्टं गम्यतां भद्ठे मा त्वां कालो5त्यगादयम्,“वरवर्णिनि! जो पहले औरकी हो चुकी हो, ऐसी स्त्रीको मैं अपनी पत्नी बनाऊँ, यह मेरी इच्छा नहीं है। जिस नारीपर पहले किसी दूसरे पुरुषका अधिकार हो गया हो, उसे सारी बातोंको ठीक-ठीक जाननेवाला मेरे-जैसा राजा जो दूसरोंको धर्मका उपदेश करता है, कैसे अपने घरमें प्रविष्ट करायेगा। भद्रे! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। तुम्हारा यह समय यहाँ व्यर्थ न बीते”
ভীষ্ম বললেন—“ধর্মাধর্ম জেনে এবং অন্যকে ধর্মোপদেশ দিই যে আমি, সে আমি কী করে এমন নারীকে গৃহে আনব, যে পূর্বে অন্য পুরুষের অধিকারভুক্ত হয়েছে? এ আমার অভিপ্রায় নয়। ভদ্রে, তোমার ইচ্ছামতো যেখানে খুশি যাও; তোমার সময় যেন এখানে বৃথা না যায়।”
Verse 10
अम्बा तमब्रवीद् राजन्ननड्रशरपीडिता । नैवं वद महीपाल नैतदेवं कथंचन,राजन! यह सुनकर कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हुई अम्बा शाल्वराजसे बोली --'भूपाल! तुम किसी तरह भी ऐसी बात मुहसे न निकालो। शत्रुसूदन! मैं भीष्मके साथ प्रसन्नतापूर्वक नहीं गयी थी। उन्होंने समस्त राजाओंको खदेड़कर बलपूर्वक मेरा अपहरण किया था और मैं रोती हुई ही उनके साथ गयी थी
অঙ্গহীন কামদেবের শরবিদ্ধ হয়ে অম্বা বলল—“রাজন, এমন কথা বলো না। হে পৃথিবীপাল, এ কথা কোনোভাবেই সত্য নয়। আমি ভীষ্মের সঙ্গে না আনন্দে, না স্বেচ্ছায় গিয়েছিলাম; তিনি সমবেত রাজাদের তাড়িয়ে দিয়ে বলপূর্বক আমাকে অপহরণ করেছিলেন, আর আমি কাঁদতে কাঁদতেই তাঁর সঙ্গে গিয়েছিলাম।”
Verse 11
नास्मि प्रीतिमती नीता भीष्मेणामित्रकर्शन । बलान्नीतास्मि रुदती विद्राव्य पृथिवीपतीन्,राजन! यह सुनकर कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हुई अम्बा शाल्वराजसे बोली --'भूपाल! तुम किसी तरह भी ऐसी बात मुहसे न निकालो। शत्रुसूदन! मैं भीष्मके साथ प्रसन्नतापूर्वक नहीं गयी थी। उन्होंने समस्त राजाओंको खदेड़कर बलपूर्वक मेरा अपहरण किया था और मैं रोती हुई ही उनके साथ गयी थी
অম্বা বলল—“হে শত্রুকর্ষণ, ভীষ্ম আমাকে আনন্দে নিয়ে যাননি। সমগ্র পৃথিবীপতিদের তাড়িয়ে দিয়ে তিনি বলপূর্বক আমাকে নিয়ে গিয়েছিলেন; আমি কাঁদতে কাঁদতেই তাঁর সঙ্গে গিয়েছিলাম।”
Verse 12
भजस्व मां शाल्वपते भक्तां बालामनागसम् | भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते,'शाल्वराज! मैं निरपराध अबला हूँ। तुम्हारे प्रति अनुरक्त हूँ। मुझे स्वीकार करो; क्योंकि भक्तोंका परित्याग किसी भी धर्ममें अच्छा नहीं बताया गया है
“হে শাল্বপতি, আমাকে গ্রহণ করো। আমি নির্দোষ, অসহায় এবং তোমার প্রতি ভক্ত; কারণ ভক্ত-শরণাগতকে ত্যাগ করা কোনো ধর্মেই প্রশংসিত নয়।”
Verse 13
साहमामन्त्र्य गाड़ेयं समरेष्वनिवर्तिनम् । अनुज्ञाता च तेनैव ततो5हं भूशमागता,'युद्धमोें कभी पीठ न दिखानेवाले गंगानन्दन भीष्मसे पूछकर, उनकी आज्ञा लेकर अत्यन्त उत्कण्ठाके साथ मैं यहाँ आयी हूँ
“সমরে কখনো পৃষ্ঠ না দেখানো গঙ্গানন্দন ভীষ্মকে আমি নিবেদন করেছিলাম; তাঁরই অনুমতি পেয়ে, সেই সম্মতিসহ, আমি গভীর উৎকণ্ঠায় এখানে এসেছি।”
Verse 14
न स भीष्मो महाबाहुर्मामिच्छति विशाम्पते । भ्रातृहेतो: समारम्भो भीष्मस्येति श्रुतं मया,“राजन! महाबाहु भीष्म मुझे नहीं चाहते। उनका यह आयोजन अपने भाईके विवाहके लिये था, ऐसा मैंने सुना है
ভীষ্ম বললেন— “হে প্রজাপতি! সেই মহাবাহু ভীষ্ম আমাকে চান না। আমি শুনেছি, ভীষ্মের এই উদ্যোগ ছিল তাঁর ভ্রাতার জন্য—ভ্রাতার বিবাহ-ব্যবস্থার উদ্দেশ্যে করা প্রচেষ্টা।”
Verse 15
भगिन्यौ मम ये नीते अम्बिकाम्बालिके नृप । प्रादाद् विचित्रवीर्याय गाड़ेयो हि यवीयसे,“नरेश्वर! भीष्म जिन मेरी दो बहिनों--अम्बिका और अम्बालिकाको हरकर ले गये थे, उन्हें उन्होंने अपने छोटे भाई विचित्रवीर्यको ब्याह दिया है
ভীষ্ম বললেন— “হে নৃপ! আমার দুই বোন—অম্বিকা ও অম্বালিকা—যাদের আমি নিয়ে এসেছিলাম, গাঙ্গেয় ভীষ্ম তাদের তাঁর কনিষ্ঠ ভ্রাতা বিচিত্রবীর্যকে বিবাহে প্রদান করেছিলেন।”
Verse 16
समनुज्ञासिषं कन्यामम्बां ज्येष्ठां नराधिप । भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! तब मैंने माता गन्धवती कालीसे आज्ञा ले मन्त्रियों, ऋत्विजों तथा पुरोहितोंसे पूछकर बड़ी राजकुमारी अम्बाको जानेकी आज्ञा दे दी,यथा शाल्वपते नानयं॑ वरं ध्यामि कथंचन । त्वामृते पुरुषव्याप्र तथा मूर्धानमालभे 'पुरुषसिंह शाल्वराज! मैं अपना मस्तक छूकर कहती हूँ; तुम्हारे सिवा दूसरे किसी वरका मैं किसी प्रकार भी चिन्तन नहीं करती हूँ
ভীষ্ম বললেন— “হে নরাধিপ! রাজমাতার অনুমতি নিয়ে এবং মন্ত্রী, ঋত্বিক ও পুরোহিতদের সঙ্গে পরামর্শ করে আমি জ্যেষ্ঠা রাজকন্যা অম্বাকে প্রস্থান করতে অনুমতি দিলাম। তখন সে শাল্বপতিকে বলল— ‘হে পুরুষব্যাঘ্র! তোমাকে ছাড়া অন্য কোনো বরকে আমি কোনোভাবেই চিন্তা করি না; এবং তোমাকে ব্যতীত আর কারও জন্য নয়—আমি মস্তক স্পর্শ করে এই দৃঢ় শপথ করছি।’”
Verse 17
न चान्यपूर्वा राजेन्द्र त्वामहं समुपस्थिता । सत्यं ब्रवीमि शाल्वैतत् सत्येनात्मानमालभे,'राजेन्द्र शाल्व! मुझपर किसी भी दूसरे पुरुषका पहले कभी अधिकार नहीं रहा है। मैं स्वेच्छापूर्वक पहले-पहल तुम्हारी ही सेवामें उपस्थित हुई हूँ। यह मैं सत्य कहती हूँ और इस सत्यके द्वारा ही इस शरीरकी शपथ खाती हूँ
ভীষ্ম বললেন— “হে রাজেন্দ্র! হে শাল্ব! এর আগে আমি কোনো অন্য পুরুষের অধীন হইনি। স্বেচ্ছায় আমি প্রথমবার তোমারই সেবায় উপস্থিত হয়েছি। হে শাল্ব! এ কথা আমি সত্য বলছি; এবং এই সত্যের বলেই আমি নিজের দেহের শপথ করছি।”
Verse 18
भजस्व मां विशालाक्ष स्वयं कन्यामुपस्थिताम् । अनन्यपूर्वा राजेन्द्र त्वत्प्रसादाभिकड्क्षणीम्,“विशाल नेत्रोंवाले महाराज! मैंने आजसे पहले किसी दूसरे पुरुषको अपना पति नहीं समझा है। मैं तुम्हारी कृपाकी अभिलाषा रखती हूँ। स्वयं ही अपनी सेवामें उपस्थित हुई मुझ कुमारी कन्याको धर्मपत्नीके रूपमें स्वीकार कीजिये”
ভীষ্ম বললেন— “হে বিশালাক্ষ মহারাজ! স্বয়ং উপস্থিত এই কুমারীকে গ্রহণ করুন। আমি আগে কখনও অন্য কারও হইনি; আমি কেবল আপনার অনুগ্রহই কামনা করি। আমাকে ধর্মপত্নী রূপে গ্রহণ করুন।”
Verse 19
तामेवं भाषमाणां तु शाल्वः काशिपते: सुताम् । अत्यजद् भरतश्रेष्ठ जीर्णा त्वचमिवोरग:,भरतश्रेष्ठ) इस प्रकार अनुनय-विनय करती हुई काशिराजकी उस कन्याको शाल्वने उसी प्रकार त्याग दिया, जैसे सर्प पुरानी केंचुलको छोड़ देता है
ভারতশ্রেষ্ঠ! কাশীরাজার কন্যা এভাবে বিনীতভাবে মিনতি করলেও শাল্ব তাকে ত্যাগ করল—যেমন সাপ জীর্ণ খোলস ফেলে দেয়।
Verse 20
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानस्तया नृपः । नाश्रददथच्छाल्वपति: कन्यायां भरतर्षभ,भरतभूषण! इस तरह नाना प्रकारके वचनोंद्वारा बार-बार याचना करनेपर भी शाल्वराजने उस कन्याकी बातोंपर विश्वास नहीं किया
হে ভরতবৃষভ! নানাবিধ কথায় বারবার অনুনয় করলেও শাল্বরাজ সেই কন্যার কথায় বিশ্বাস স্থাপন করল না।
Verse 21
ततः सा मन्युना5<विष्टा ज्येष्ठा काशिपते: सुता । अब्रवीत् साश्रुनयना बाष्पविप्लुतया गिरा,तब काशिराजकी ्येष्ठ पुत्री अम्बा क्रोध एवं दुःखसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई अश्रुगदगद वाणीमें बोली--
তখন কাশিপতির জ্যেষ্ঠা কন্যা অম্বা ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে, অশ্রুসজল নয়নে ও কান্নায় ভেজা রুদ্ধ কণ্ঠে বলল।
Verse 22
त्वया त्यक्ता गमिष्यामि यत्र तत्र विशाम्पते । तत्र मे गतय: सन्तु सन्त: सत्यं यथा ध्रुवम्,“राजन! यदि मेरी कही बात निश्चितरूपसे सत्य हो तो तुमसे परित्यक्त होनेपर मैं जहाँ- जहाँ जाऊँ, वहाँ-वहाँ साधु पुरुष मुझे सहारा देनेवाले हों”
হে প্রজাপতি! যদি আমার বলা কথা নিশ্চিত সত্য হয়, তবে তোমার দ্বারা পরিত্যক্ত হয়ে আমি যেখানে-সেখানে যাই, সেখানে-সেখানে সজ্জনেরা আমার আশ্রয় হোক—যেমন সত্য অচল।
Verse 23
एवं तां भाषमाणां तु कन््यां शाल्वपतिस्तदा । परितत्याज कौरव्य करुणं परिदेवतीम्,कुरुनन्दन! राजकन्या अम्बा करुणस्वरसे विलाप करती हुई इसी प्रकार कितनी ही बातें कहती रही; परंतु शाल्वराजने उसे सर्वथा त्याग दिया
হে কৌরব্য! করুণ স্বরে বিলাপ করতে করতে সেই কন্যা এভাবেই বহু কথা বলল, কিন্তু তখন শাল্বরাজ তাকে সম্পূর্ণরূপে প্রত্যাখ্যান করল।
Verse 24
गच्छ गच्छेति तां शाल्व: पुन: पुनरभाषत । बिभेमि भीष्मात् सुश्रोणि त्वं च भीष्मपरिग्रह:,शाल्वने बारंबार उससे कहा--'सुश्रोणि! तुम जाओ, चली जाओ, मैं भीष्मसे डरता हूँ। तुम भीष्मके द्वारा ग्रहण की हुई हो”
শাল্ব তাকে বারবার বলল—“যাও, যাও, হে সুশ্রোণি! আমি ভীষ্মকে ভয় করি; আর তুমিও তো ভীষ্মের দ্বারা গৃহীতা।”
Verse 25
एवमुक्ता तु सा तेन शाल्वेनादीर्घदर्शिना । निश्चक्राम पुराद् दीना रूदती कुररी यथा,अदूरदर्शी शाल्वके ऐसा कहनेपर अम्बा कुररीकी भाँति दीनभावसे रुदन करती हुई उस नगरसे निकल गयी
দূরদর্শী শাল্ব এভাবে বলায় অম্বা কুররী পাখির মতো দীন হয়ে কাঁদতে কাঁদতে নগর থেকে বেরিয়ে গেল।
Verse 26
भीष्म उवाच निष्क्रामन्ती तु नगराच्चिन्तयामास दुःखिता । पृथिव्यां नास्ति युवतिर्विषमस्थतरा मया,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! नगरसे निकलते समय वह दु:खिनी नारी इस प्रकार चिन्ता करने लगी--“इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसी युवती नहीं होगी, जो मेरे समान भारी संकटमें पड़ गयी हो
ভীষ্ম বললেন—“রাজন! নগর থেকে বেরোতে বেরোতে সেই দুঃখিতা নারী ভাবতে লাগল—‘এই পৃথিবীতে আমার মতো এমন বিষম অবস্থায় পড়া আর কোনো যুবতী নেই।’”
Verse 27
बन्धुभिवरप्रहीणास्मि शाल्वेन च निराकृता । न च शक्यं पुनर्गन्तुं मया वारणसाह्नयम्,'भाई-बन्धुओंसे तो दूर हो ही गयी हूँ। राजा शाल्वने भी मुझे त्याग दिया है। अब मैं हस्तिनापुरमें भी नहीं जा सकती
‘আমি আত্মীয়স্বজনদের আশ্রয় হারিয়েছি; আর রাজা শাল্বও আমাকে প্রত্যাখ্যান করেছে। এখন আমার পক্ষে আবার বারণসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) ফিরে যাওয়াও সম্ভব নয়।’
Verse 28
अनुज्ञाता तु भीष्मेण शाल्वमुद्दिश्य कारणम् । कि नु गहम्यथात्मानमथ भीष्म दुरासदम्,“क्योंकि शाल्वके अनुरागको कारण बताकर मैंने भीष्मसे यहाँ आनेकी आज्ञा ली थी। अब मैं अपनी ही निन्दा करूँ या उस दुर्जय वीर भीष्मको कोसूँ?
‘শাল্বের অনুরাগকে কারণ দেখিয়ে আমি ভীষ্মের কাছ থেকে এখানে আসার অনুমতি নিয়েছিলাম। এখন আমি কী করব—নিজেকেই নিন্দা করব, না সেই দুর্জয় ভীষ্মকে ধিক্কার দেব?’
Verse 29
अथवा पितरं मूढं यो मे5कार्षीत् स्वयंवरम् । मयायं स्वकृतो दोषो याहं भीष्मरथात् तदा
অথবা আমাকে আমার সেই মোহগ্রস্ত পিতাকে নিবৃত্ত করা উচিত ছিল, যিনি আমার জন্য স্বয়ংবর আয়োজন করেছিলেন। এ দোষ আমারই—আমি, ভীষ্ম, তখন রথে বসেই এমন কর্ম করেছিলাম, যার ফলে এই অন্যায় ঘটল।
Verse 30
तस्येयं फलनिर्व त्तियदापन्नास्मि मूढवत्,“उसीका यह फल प्राप्त हुआ है कि मैं एक मूर्ख स्त्री-की भाँति भारी आपत्तिमें पड़ गयी हूँ। भीष्मको धिक््कार है, विवेकशून्य हृदयवाले मेरे मन्दबुद्धि पिताको भी धिक्कार है, जिन्होंने पराक्रमका शुल्क नियत करके मुझे बाजारू स्त्रीकी भाँति जनसमूहमें निकलनेकी आज्ञा दी
এরই ফল এই—আমি এক মোহগ্রস্ত নারীর মতো ভয়ংকর বিপদে পতিত হয়েছি। ভীষ্মকে ধিক্; আর ধিক্ আমার সেই মন্দবুদ্ধি, বিবেকহীন পিতাকে, যে বীর্যের ‘মূল্য’ স্থির করে আমাকে বিক্রয়যোগ্য নারীর মতো জনসমক্ষে আনতে আদেশ দিয়েছিল।
Verse 31
धिग् भीष्म घधिक् च मे मन्दं पितरं मूढचेतसम् । येनाहं वीर्यशुल्केन पण्यस्त्रीव प्रचोदिता,“उसीका यह फल प्राप्त हुआ है कि मैं एक मूर्ख स्त्री-की भाँति भारी आपत्तिमें पड़ गयी हूँ। भीष्मको धिक््कार है, विवेकशून्य हृदयवाले मेरे मन्दबुद्धि पिताको भी धिक्कार है, जिन्होंने पराक्रमका शुल्क नियत करके मुझे बाजारू स्त्रीकी भाँति जनसमूहमें निकलनेकी आज्ञा दी
ভীষ্ম বললেন: “ভীষ্মকে ধিক্—আর ধিক্ আমার সেই মন্দবুদ্ধি, বিবেকহীন পিতাকে। তারই স্থির করা বীর্যের ‘মূল্য’-এর কারণে আমি বিক্রয়যোগ্য নারীর মতো জনসমক্ষে ঠেলে দেওয়া হয়েছি।”
Verse 32
धिड्मां धिक् शाल्वराजानं धिग् धातारमथापि वा | येषां दुर्नीतभावेन प्राप्तास्म्यापदमुत्तमाम्,“मुझे धिक्कार है, शाल्वराजको धिक्कार है और विधाताको भी धिक््कार है, जिनकी दुर्नीतियोंसे मैं इस भारी विपत्तिमें फँस गयी हूँ
ধিক্ আমাকে, ধিক্ শাল্বরাজকে, আর ধিক্ বিধাতাকেও—যাদের কুনীতি ও কুশাসিত আচরণের ফলে আমি এই মহাবিপদে পতিত হয়েছি।
Verse 33
सर्वथा भागधेयानि स्वानि प्राप्रोति मानव: । अनयस्यास्य तु मुखं भीष्म: शान्तनवो मम,“मनुष्य सर्वथा वही पाता है जो उसके भाग्यमें होता है। मुझपर जो यह अन्याय हुआ है, उसका मुख्य कारण शान्तनुनन्दन भीष्म हैं
ভীষ্ম বললেন: “মানুষ সর্বতোভাবে নিজের ভাগ্যে যা নির্দিষ্ট, তাই লাভ করে। কিন্তু আমার ওপর যে অন্যায় ঘটেছে, তার প্রধান কারণ শান্তনুনন্দন ভীষ্ম—আমি নিজেই।”
Verse 34
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम् । तपसा वा युधा वापि दु:खहेतु: स मे मतः,“अत: इस समय तपस्या अथवा युद्धके द्वारा भीष्मसे ही बदला लेना मुझे उचित दिखायी देता है; क्योंकि मेरे दुःखके प्रधान कारण वे ही हैं
অতএব এখন আমি মনে করি—তপস্যা বা যুদ্ধ, যে কোনো উপায়ে ভীষ্মের প্রতিশোধ নেওয়াই যথোচিত; কারণ আমার দুঃখের প্রধান কারণ তিনিই।
Verse 35
को नु भीष्म॑ युधा जेतुमुत्सहेत महीपति: । एवं सा परिनिश्चित्य जगाम नगराद् बहि:,'परंतु कौन ऐसा राजा है जो युद्धके द्वारा भीष्मको परास्त कर सके।' ऐसा निश्चय करके वह नगरसे बाहर चली गयी
কিন্তু কোন রাজাই বা আছে, যে যুদ্ধে ভীষ্মকে পরাজিত করতে সাহস করবে? এই সিদ্ধান্তে স্থির হয়ে সে নগরের বাইরে চলে গেল।
Verse 36
आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् | ततस्तामवसद् रात्रिं तापसै: परिवारिता,उसने पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमपर जाकर वहीं वह रात बितायी। उस आश्रममें तपस्वी-लोगोंने सब ओरसे घेरकर उसकी रक्षा की थी
তারপর সে পুণ্যশীল মহাত্মা তপস্বীদের আশ্রমে পৌঁছাল। সেখানে সে রাত্রি কাটাল; তপস্বীরা চারদিক থেকে ঘিরে তাকে রক্ষা করল।
Verse 37
आचख्यौ च यथावृत्तं सर्वमात्मनि भारत | विस्तरेण महाबाहो निखिलेन शुचिस्मिता । हरणं च विसर्ग च शाल्वेन च विसर्जनम्,महाबाहु भरतनन्दन! पवित्र मुसकानवाली अम्बाने अपने ऊपर बीता हुआ सारा वत्तान्त विस्तारपूर्वक उन महात्माओंसे बताया। किस प्रकार उसका अपहरण हुआ? कैसे भीष्मसे छुटकारा मिला? और फिर किस प्रकार शाल्वने उसे त्याग दिया, ये सारी बातें उसने कह सुनायीं
মহাবাহু ভরতনন্দন! পবিত্র হাস্যবদনা অম্বা সেই মহাত্মাদের কাছে নিজের উপর ঘটে যাওয়া সমস্ত ঘটনা বিস্তারে, সম্পূর্ণভাবে বলল—কেমন করে তাকে অপহরণ করা হয়েছিল, কেমন করে ভীষ্মের কাছ থেকে মুক্তি পেয়েছিল, এবং পরে শাল্ব কীভাবে তাকে পরিত্যাগ করেছিল।
Verse 38
ततस्तत्र महानासीद् ब्राह्मण: संशितव्रत:ः । शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरु: ३८ ।। उस आश्रममें कठोर व्रतका पालन करनेवाले शैखावत्य नामसे प्रसिद्ध एक तपोवृद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शास्त्र और आरण्यक आदिकी शिक्षा देनेवाले सदगुरु थे
তখন সেই আশ্রমে কঠোর ব্রতপালনকারী এক মহান ব্রাহ্মণ বাস করতেন। তিনি ‘শৈখাবত্য’ নামে প্রসিদ্ধ—তপস্যায় পরিপক্ব, এবং শাস্ত্র ও আরণ্যক-বিদ্যার গুরু।
Verse 39
आर्ता तामाह स मुनि: शैखावत्यो महातपा: । निःश्वसन्तीं सती बालां दुः:खशोकपरायणाम्,महातपस्वी शैखावत्य मुनिने वहाँ सिसकती हुई उस दुःखशोकपरायणा सती साध्वी आर्त अबलासे कहा--
ভীষ্ম বললেন—শৈখাবতীর সেই সৎ, কিশোরী নারীকে দুঃখ-শোকে নিমগ্ন ও দীর্ঘশ্বাস ফেলতে দেখে মহাতপস্বী মুনি করুণাবশে আর্তাকে সম্বোধন করলেন।
Verse 40
एवं गते तु कि भद्रे शक््यं कर्तु तपस्विभि: । आश्रमस्थैर्महा भागे तपोयुक्तैर्महात्मभि:,'भद्रे! महाभागे! ऐसी दशामें इस आश्रममें निवास करनेवाले तप:परायण तपोधन महात्मा तुम्हारा क्या सहयोग कर सकते हैं?”
ভদ্রে, মহাভাগে! বিষয় যখন এই অবস্থায় এসে দাঁড়িয়েছে, তখন এই আশ্রমবাসী তপস্যায় যুক্ত মহাত্মা তপস্বীরা তোমার জন্যই বা কী করতে পারেন?
Verse 41
सा त्वेनमब्रवीद् राजन् क्रियतां मदनुग्रह: । प्राव्राज्यमहमिच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम्,राजन! तब अम्बाने उनसे कहा--'भगवन्! मुझपर अनुग्रह कीजिये। मैं संन्यासियोंका-सा धर्म पालन करना चाहती हूँ। यहाँ रहकर दुष्कर तपस्या करूँगी
তখন সে বলল—রাজন, আমার প্রতি অনুগ্রহ করুন। আমি প্রব্রজ্যা (সন্ন্যাসধর্ম) গ্রহণ করতে চাই; আমি কঠোর তপস্যা করব।
Verse 42
मयैव यानि कर्माणि पूर्वदेहे तु मूढया । कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत् फल ध्रुवम्,“मुझ मूढ़ नारीने अपने पूर्वजन्मके शरीरसे जो पापकर्म किये थे, अवश्य ही उन्हींका यह दुःखदायक फल प्राप्त हुआ है
আমি মূঢ়া পূর্বদেহে যে পাপকর্ম করেছিলাম, নিঃসন্দেহে এ তারই নিশ্চিত ফল।
Verse 43
नोत्सहे तु पुनर्गन्तुं स््वजनं प्रति तापसा: । प्रत्याख्याता निरानन्दा शाल्वेन च निराकृता,“तपस्वी महात्माओ! अब मैं अपने स्वजनोंके यहाँ फिर नहीं लौट सकती; क्योंकि राजा शाल्वने मुझे कोरा उत्तर देकर त्याग दिया है, उससे मेरा सारा जीवन आनन्दशून्य (दुःखमय) हो गया है
হে তাপস মহাত্মাগণ! আমি আর স্বজনদের কাছে ফিরে যেতে সাহস করি না; শাল্ব আমাকে প্রত্যাখ্যান করেছে, আমি নিরানন্দ হয়ে পরিত্যক্তা হয়েছি।
Verse 44
उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषा: । युष्माभिवदेवसंकाशै: कृपा भवतु वो मयि,“निष्पाप तापसगण! मैं चाहती हूँ कि आप देवोपम साधुपुरुष मुझे तपस्याका उपदेश दें, मुझपर आपलोगोंकी कृपा हो”
হে নিষ্পাপ তপস্বীগণ! আমি এখানেই তপস্যার উপদেশ পেতে চাই। আপনারা দেবসম দীপ্তিমান—আমার প্রতি কৃপা করে তপের বিধান শিক্ষা দিন।
Verse 45
स तामाश्वचासयत् कनन््यां दृष्टान्तागमहेतुभि: । सान्त्वयामास कार्य च प्रतिजज्ञे द्विजै:ः सह,तब शैखावत्य मुनिने लौकिक दृष्टान्तों, शास्त्रीय वचनों तथा युक्तियोंद्वारा उस कन्याको आश्वासन देकर धैर्य बँधाया और ब्राह्मणोंक साथ मिलकर उसके कार्य-साधनके लिये प्रयत्न करनेकी प्रतिज्ञा की
তখন সেই মুনি লোকদৃষ্টান্ত, শাস্ত্রবচন ও যুক্তির দ্বারা কন্যাটিকে আশ্বস্ত করলেন, সান্ত্বনা দিলেন; এবং ব্রাহ্মণদের সঙ্গে মিলিত হয়ে তার ন্যায্য উদ্দেশ্য সিদ্ধির জন্য চেষ্টা করার প্রতিজ্ঞা করলেন।
Verse 175
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शैखावत्याम्बासंवादे पजञ्चसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें शैखावत्य तथा अग्बाका संवादविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত অম্বোপাখ্যানপর্বে শৈখাবতী ও অম্বার সংলাপবিষয়ক একশো পঁচাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 296
प्रवृत्ते दारुणे युद्धे शाल्वार्थ नापतं पुरा । “अथवा अपने मूढ़ पिताको दोष दूँ, जिन्होंने मेरा स्वयंवर किया। मेरे द्वारा सबसे बड़ा दोष यह हुआ है कि पूर्वकालमें जिस समय वह भयंकर युद्ध चल रहा था, उसी समय मैं शाल्वके लिये भीष्मके रथसे कूद नहीं पड़ी
পূর্বকালে যখন সেই ভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হয়ে গিয়েছিল, তখন শাল্বের জন্য আমি ভীষ্মের রথ থেকে লাফিয়ে নামতে পারিনি—এটাই আমার অপরাধ।
Ambā’s dilemma is between socially sanctioned protection (returning to paternal guardianship) and self-directed austerity as a response to reputational injury and rejection, with each option carrying distinct ethical and practical risks.
The chapter teaches that dharma is often conditional: norms like ‘husband or father as refuge’ function as protective institutions, yet individual agency may seek alternative remedies when social reintegration is expected to produce further harm.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; its meta-significance lies in positioning personal grievance within institutional pathways of redress (ascetic counsel, kin-protection, and appeal to Paraśurāma), informing later causal developments.