
Bhīṣma’s Appraisal of Kaurava Champions (भीष्मकृतः रथिनां गुणनिरूपणम्)
Upa-parva: Udyoga Parva – Ratha/Mahāratha-guṇa-kathana (Warrior Appraisal Discourse)
Bhīṣma addresses Dhṛtarāṣṭra and enumerates prominent Kaurava-aligned fighters and their operational significance. The chapter opens with Śakuni identified as a single-ratha combatant committed to sustained hostility toward the Pāṇḍavas. It then highlights Droṇa’s son Aśvatthāmā as exceptionally formidable in archery and divine weaponry, while noting a critical limitation: strong attachment to life and self-preservation, making Bhīṣma reluctant to rank him as a fully committed ratha/atiratha in Bhīṣma’s evaluative scheme. Droṇa is praised as an elder teacher and battlefield actor, yet his affection and esteem for Arjuna are emphasized as an ethical constraint on lethal intent. The discourse proceeds to additional Kaurava assets: Paurava (as a mahāratha), Satyavrata as a prominent ratha, Vṛṣasena (Karna’s son), Jalasaṃdha of Magadha, Bāhlīka as an unretreating atiratha, the rākṣasa Alāyudha with fierce prior enmity, and Bhagadatta of Prāgjyotiṣa renowned for elephant warfare, likened to Indra upon Airāvata. Overall, the chapter functions as a strategic roster combining capability descriptions, temperamental qualifiers, and coalition breadth.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र के दरबार में युद्ध की गणना-भाषा गूंजती है—दुर्योधन जानना चाहता है कि उसके और शत्रु-पक्ष के रथी-अतिरथी कौन हैं, कितने हैं, और किस पर भरोसा रखा जाए। → भीष्म, अपनी कीर्ति का बखान किए बिना, कौरव-पक्ष के प्रमुख योद्धाओं का परिचय और उनकी श्रेणियाँ बताते हुए सेना के आत्मविश्वास को साधते हैं; साथ ही पाण्डव-पक्ष की शक्ति का संकेत भी देते हैं—विशेषतः अर्जुन का दृढ़ धनुष और वासुदेव-कृष्ण का साथ, जिसे सुनकर विजय की आशा के भीतर भय की लहर उठती है। → अर्जुन की प्रतिज्ञा और कृष्ण-सहायता का स्मरण युद्ध-गणना को अचानक ‘भाग्य-गणना’ बना देता है—भीष्म की वाणी में यह स्वीकार झलकता है कि जहाँ पार्थ के साथ वासुदेव हैं, वहाँ कौरवों के लिए ‘हतमेव’ का साया मंडराता है; फिर भी वे शास्त्र-विधि से सेना-रक्षा का व्रत लेते हैं। → भीष्म दुर्योधन के प्रश्न का उत्तर ‘व्यवस्था’ में बदल देते हैं—रथियों/अतिरथियों की पहचान, क्रम, और नियुक्ति का संकेत देकर मानसिक ज्वर शांत करने का आश्वासन देते हैं: वे तत्त्वतः युद्ध करेंगे और कौरव-वाहिनी की रक्षा करेंगे। → नियुक्ति और गणना पूरी होते ही प्रश्न शेष रह जाता है—क्या संख्या और श्रेणी, कृष्ण-युक्त पार्थ के सामने टिक पाएगी, और कौन-सा ‘पुराना वैर’ (जैसे जयद्रथ का) अगले अध्यायों में रक्त बनकर फूटेगा?
Verse 1
पम्प बछ। अर: (रथातिरथसंख्यानपर्व) पज्चषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: दुर्योधनके पूछनेपर भीष्मका कौरवपक्षके रथियों और अतिरथियोंका परिचय देना धृतराष्ट उवाच प्रतिज्ञाते फाल्गुनेन वधे भीष्मस्य संयुगे । किमकुर्वत मे मन्दा: पुत्रा दुर्योधनादय:,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब अर्जुनने युद्धभूमिमें भीष्मका वध करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब दुर्योधन आदि मेरे मूर्ख पुत्रोंने क्या किया?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“সঞ্জয়, যখন ফাল্গুন (অর্জুন) যুদ্ধে ভীষ্মবধের প্রতিজ্ঞা করল, তখন দুর্যোধন প্রভৃতি আমার মন্দবুদ্ধি পুত্রেরা কী করল?”
Verse 2
हतमेव हि पश्यामि गाड़ेयं पितरं रणे । वासुदेवसहायेन पार्थेन दृढ्धन्वना,अर्जुन सुदृढ़ धनुष धारण करते हैं। इसके सिवा भगवान् श्रीकृष्ण उनके सहायक हैं; अतः मैं रणभूमिमें अपने पिता गंगानन्दन भीष्मको उनके द्वारा मारा गया ही मानता हूँ
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—আমি যুদ্ধক্ষেত্রে গঙ্গানন্দন পিতামহ ভীষ্মকে নিহতই দেখছি; কারণ অচঞ্চল দৃঢ়ধন্বা পার্থ (অর্জুন)-এর সহায় স্বয়ং বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)। এমন সহায়তা ও এমন বীর্যে ভীষ্মের পতন অনিবার্য বলেই মনে হয়।
Verse 3
स चापरिमितप्रज्ञस्तच्छुत्वा पार्थभाषितम् । किमुक्तवान् महेष्वासो भीष्म: प्रहरतां वर:,अर्जुनकी उस प्रतिज्ञाको सुनकर अमित बुद्धिमान् योद्धाओंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर भीष्मने क्या कहा?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—পার্থ (অর্জুন)-এর উক্তি শুনে অপরিমেয় প্রজ্ঞাসম্পন্ন, মহাধনুর্ধর এবং আঘাতকারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভীষ্ম কী বলেছিলেন?
Verse 4
सैनापत्यं च सम्प्राप्प कौरवाणां धुरन्धर: । किमचेष्टत गाड़ेयो महाबुद्धिपराक्रम:,कौरवकुलका भार वहन करनेवाले परम बुद्धिमान् और पराक्रमी गंगापुत्र भीष्मने सेनापतिका पद प्राप्त करनेके पश्चात् युद्धँके लिये कौन-सी चेष्टा की?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—কৌরবদের ভার বহনকারী, মহাবুদ্ধি ও পরাক্রমশালী গঙ্গাপুত্র ভীষ্ম সেনাপতির পদ লাভ করে যুদ্ধের প্রস্তুতিতে কী কী উদ্যোগ নিলেন?
Verse 5
वैशम्पायन उवाच ततस्तत् संजयस्तस्मै सर्वमेव न्यवेदयत् । यथोक्तं कुरुवृद्धेन भीष्मेणामिततेजसा,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर संजयने अमिततेजस्वी कुरुवृद्ध भीष्मने जैसा कहा था, वह सब कुछ राजा धृतराष्ट्रको बताया
বৈশম্পায়ন বললেন—এরপর সংজয় কুরুবৃদ্ধ, অমিততেজস্বী ভীষ্ম যেমন বলেছিলেন, তেমনই সব কথা ধৃতরাষ্ট্রকে সম্পূর্ণভাবে জানালেন।
Verse 6
संजय उवाच सैनापत्यमनुप्राप्य भीष्म: शान्तनवो नूप । दुर्योधनमुवाचेदं वचन हर्षयन्निव,संजय बोले--नरेश्वर! सेनापतिका पद प्राप्त करके शान्तनुनन्दन भीष्मने दुर्योधनका हर्ष बढ़ाते हुए-से उससे यह बात कही--
সঞ্জয় বললেন—হে নরেশ্বর! সেনাপতির পদ লাভ করে শান্তনুনন্দন ভীষ্ম, যেন দুর্যোধনের হর্ষ বাড়িয়ে তাকে প্রীত করতে চান, এমনভাবে তাকে এই কথা বললেন।
Verse 7
नमस्कृत्य कुमाराय सेनानये शक्तिपाणये । अहं सेनापतिस्ते5द्य भविष्यामि न संशय:,“राजन! मैं हाथमें शक्ति धारण करनेवाले देवसेनापति कुमार कार्तिकेयको नमस्कार करके अब तुम्हारी सेनाका अधिपति होऊँगा, इसमें संशय नहीं है
শক্তিধারী দেবসেনাপতি কুমার কার্ত্তিকেয়কে প্রণাম করে আমি আজ তোমার সেনাপতি হব—এতে কোনো সংশয় নেই।
Verse 8
सेनाकर्मण्यभिज्ञो5स्मि व्यूहेषु विविधेषु च । कर्म कारयितुं चैव भृतानप्यभृतांस्तथा,“मुझे सेनासम्बन्धी प्रत्येक कर्मका ज्ञान है। मैं नाना प्रकारके व्यूहोंके निर्माणमें भी कुशल हूँ। तुम्हारी सेनामें जो वेतनभोगी अथवा वेतन न लेनेवाले मित्रसेनाके सैनिक हैं, उन सबसे यथायोग्य काम करा लेनेकी भी कला मुझे ज्ञात है
সেনাসংক্রান্ত সকল কর্মে আমি অভিজ্ঞ, এবং নানা প্রকার ব্যূহ রচনায়ও দক্ষ। বেতনভোগী সৈন্য হোক বা বেতন না নেওয়া মিত্র-সহায়—সবার দ্বারা যথোচিত কাজ করিয়ে নিতে আমি জানি।
Verse 9
यात्रायाने च युद्धे च तथा प्रशमनेषु च | भृशं वेद महाराज यथा वेद बृहस्पति:,“महाराज! मैं युद्धके लिये यात्रा करने, युद्ध करने तथा विपक्षीके चलाये हुए अस्त्रोंका प्रतीकार करनेके विषयमें जैसा बृहस्पति जानते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण आवश्यक बातोंकी विशेष जानकारी रखता हूँ
মহারাজ! যুদ্ধযাত্রা, যুদ্ধকর্ম এবং শমন-উপায়সম্বন্ধে আমি ততটাই গভীরভাবে জানি, যতটা বৃহস্পতিও জানেন।
Verse 10
व्यूहानां च समारम्भान् दैवगान्धर्वमानुषान् | तैरहं मोहयिष्यामि पाण्डवान् व्येतु ते ज्वर:,“मुझे देवता, गन्धर्व और मनुष्य--तीनोंकी ही व्यूहरचनाका ज्ञान है। उनके द्वारा मैं पाण्डवोंको मोहित कर दूँगा। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये
দেব, গন্ধর্ব ও মানব—তিনেরই ব্যূহ-সমারম্ভ আমি জানি। সেগুলির দ্বারাই আমি পাণ্ডবদের বিভ্রান্ত করব; অতএব তোমার জ্বরতুল্য উদ্বেগ দূর হোক।
Verse 11
सोऊहं योत्स्यामि तत्त्वेन पालयंस्तव वाहिनीम् | यथावच्छास्त्रतो राजन व्येतु ते मानसो ज्वर:,“राजन! मैं तुम्हारी सेनाकी रक्षा करता हुआ शास्त्रीय विधानके अनुसार यथार्थरूपसे पाण्डवोंके साथ युद्ध करूँगा। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जाय”
রাজন! তোমার বাহিনী রক্ষা করতে করতে আমি শাস্ত্রবিধি অনুসারে যথার্থভাবে যুদ্ধ করব; অতএব তোমার মনের জ্বর দূর হোক।
Verse 12
दुर्योधन उवाच विद्यते मे न गाड़ेय भयं देवासुरेष्वपि । समस्तेषु महाबाहो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,दुर्योधन बोला--महाबाहु गंगानन्दन! मैं आपसे सत्य कहता हूँ, मुझे सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंसे भी कभी भय नहीं होता है
দুর্যোধন বলল—হে মহাবাহু গঙ্গানন্দন! আমি তোমাকে সত্যই বলছি; সমস্ত দেবতা ও অসুর একত্র হলেও আমার অন্তরে গভীর ভয় জন্মায় না।
Verse 13
कि पुनस्त्वयि दुर्धर्षे सैनापत्ये व्यवस्थिते । द्रोणे च पुरुषव्याप्रे स्थिते युद्धाभिनन्दिनि,फिर जब आपज-जैसे दुर्धर्ष वीर हमारे सेनापतिके पदपर स्थित हैं तथा युद्धका अभिनन्दन करनेवाले पुरुष-सिंह द्रोणाचार्य-जैसे योद्धा मेरे लिये युद्धभूमिमें उपस्थित हैं, तब तो मुझे भय हो ही कैसे सकता है?
আর যখন আপনি—অদম্য—সেনাপতি-পদে দৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত, এবং যুদ্ধপ্রিয় পুরুষসিংহ দ্রোণও এখানে অবস্থান করছেন, তখন আমার ভয়ই বা কীভাবে হতে পারে?
Verse 14
भवद्धयां पुरुषाग्र्या भ्यां स्थिताभ्यां विजये मम । नदुर्लभं कुरुश्रेष्ठ देवराज्यमपि ध्रुवम्,कुरुश्रेष्ठ! जब आप दोनों पुरुषप्रवर वीर मेरी विजयके लिये यहाँ खड़े हैं, तब तो अवश्य ही मेरे लिये देवताओंका राज्य भी दुर्लभ नहीं है
হে কুরুশ্রেষ্ঠ! আপনারা দুইজন—পুরুষশ্রেষ্ঠ—আমার বিজয়ের জন্য এখানে স্থিত থাকলে, তবে দেবরাজ্যও নিশ্চয়ই আমার পক্ষে দুর্লভ নয়।
Verse 15
रथसंख्यां तु कार्त्स्न्येन परेषामात्मनस्तथा । तथैवातिरथानां च वेत्तुमिच्छामि कौरव,कुरुनन्दन! आप शत्रुओंके तथा अपने पक्षके रथियों और अतिरथियोंकी संख्याको पूर्णरूपसे जानते हैं, अतः मैं भी आपसे इस विषयकी जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ; क्योंकि पितामह शत्रुपक्ष तथा अपने पक्षकी सभी बातोंके ज्ञानमें निपुण हैं, अत: मैं इन सब राजाओंके साथ आपके मुहसे इस विषयको सुनना चाहता हूँ
হে কৌরব, কুরুদের আনন্দ! শত্রুপক্ষ ও আমাদের পক্ষের রথীসংখ্যা, এবং অতিরথীদের সংখ্যাও আপনি সম্পূর্ণ জানেন; তাই আমি এ বিষয়ে আপনার কাছ থেকে জানতে চাই।
Verse 16
पितामहो हि कुशल: परेषामात्मनस्तथा | श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वे: सहैभिर्वसुधाधिपै:,कुरुनन्दन! आप शत्रुओंके तथा अपने पक्षके रथियों और अतिरथियोंकी संख्याको पूर्णरूपसे जानते हैं, अतः मैं भी आपसे इस विषयकी जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ; क्योंकि पितामह शत्रुपक्ष तथा अपने पक्षकी सभी बातोंके ज्ञानमें निपुण हैं, अत: मैं इन सब राजाओंके साथ आपके मुहसे इस विषयको सुनना चाहता हूँ
পিতামহ ভীষ্ম শত্রুপক্ষ ও আমাদের পক্ষ—উভয়েরই শক্তি-সামর্থ্য জানাতে সম্পূর্ণ দক্ষ; তাই এই সকল রাজাদের উপস্থিতিতে আমি আপনার মুখ থেকেই সেই বিবরণ শুনতে চাই।
Verse 17
भीष्म उवाच गान्धारे शृणु राजेन्द्र रथसंख्यां स्वके बले । ये रथा: पृथिवीपाल तथैवातिरथाश्न ये,भीष्म बोले--राजेन्द्र गान्धारीनन्दन! तुम अपनी सेनाके रथियोंकी संख्या श्रवण करो। भूपाल! तुम्हारी सेनामें जो रथी और अतिरथी हैं, उन सबका वर्णन करता हूँ
ভীষ্ম বললেন—গান্ধারীপুত্র রাজেন্দ্র! তোমার নিজ সেনায় রথযোদ্ধাদের সংখ্যা শোনো। হে পৃথিবীপাল! তোমার বাহিনীতে যারা রথী এবং যারা অতিরথী, তাদের আমি যথাযথ বর্ণনা করব।
Verse 18
बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । रथानां तव सेनायां यथामुख्यं तु मे शूणु,तुम्हारी सेनामें रथियोंकी संख्या अनेक सहस्र, लक्ष और अर्बुदों (करोड़ों)-तक पहुँच जाती है; तथापि उनमें जो प्रधान-प्रधान हैं, उनके नाम मुझसे सुनो
তোমার সেনায় রথযোদ্ধার সংখ্যা এখানে বহু সহস্র, বহু দশ-সহস্র, এমনকি অর্বুদ অর্বুদও; তবু তাদের মধ্যে যারা প্রধান, তাদের নাম আমার কাছ থেকে শোনো।
Verse 19
भवानग्रे रथोदार: सह सर्व: सहोदरै: । दुःशासनप्रभृतिभिभर्श्नातृभि: शतसम्मितै:,सबसे पहले अपने दुःशासन आदि सौ सहोदर भाइयोंके साथ तुम्हीं बहुत बड़े उदार रथी हो
সবার আগে, দুঃশাসন প্রমুখ শত সহোদর ভ্রাতাদের সঙ্গে তুমিই মহান ও উদার রথযোদ্ধা।
Verse 20
सर्वे कृतप्रहरणाश्छेद भेदविशारदा: । रथोपस्थे गजस्कन्धे गदाप्रासासिचर्मणि,तुम सब लोग अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा छेदन-भेदनमें कुशल हो। रथपर और हाथीकी पीठपर बैठकर भी युद्ध कर सकते हो। गदा, प्रास तथा ढाल-तलवारके प्रयोगमें भी कुशल हो
তোমরা সকলেই অস্ত্রশস্ত্রে সজ্জিত এবং ছেদন-ভেদনে পারদর্শী। রথের মঞ্চে ও হাতির পিঠে বসেও যুদ্ধ করতে পার; গদা, প্রাস এবং খড়্গ-ঢাল ব্যবহারে তোমরা দক্ষ।
Verse 21
संयन्तार: प्रहर्तार: कृतास्त्रा भारसाधना: । इष्वस्त्रे द्रोणशिष्याश्व॒ कृपस्य च शरद्वतः,तुमलोग रथके संचालन और अस्त्रोंके प्रहारमें भी निपुण हो। अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा भार उठानेमें भी समर्थ हो। धनुष-बाणकी विद्यामें तो तुमलोग द्रोणाचार्य और कृपाचार्यके सुयोग्य शिष्य हो
তোমরা রথ চালনায় ও আঘাত হানায় নিপুণ; অস্ত্রবিদ্যায় প্রশিক্ষিত এবং ভার বহনে সক্ষম। ধনুর্বিদ্যায় তোমরা দ্রোণ এবং শরদ্বান কৃপ—উভয়েরই যোগ্য শিষ্য।
Verse 22
एते हनिष्यन्ति रणे पञ्चालान् युद्धदुर्मदान् । कृतकिल्बिषा: पाण्डवेयैर्धार्तराष्ट्रा ममनस्विन:,धृतराष्ट्रके ये सभी मनस्वी पुत्र पाण्डवोंके साथ वैर बाँधे हुए हैं; अतः युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले पांचाल योद्धाओंको ये समरभूमिमें मार डालेंगे
ধৃতরাষ্ট্রের এই সকল মনস্বী পুত্র পাণ্ডবদের সঙ্গে বৈর বেঁধেছে; অতএব যুদ্ধে উন্মত্ত হয়ে লড়াই করা পাঞ্চাল যোদ্ধাদের এরা রণভূমিতে নিধন করবে।
Verse 23
तथाहं भरतश्रेष्ठ सर्वसेनापतिस्तव । शत्रून् विध्वंसयिष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान्,भरतश्रेष्ठ! मैं तो तुम्हारी सम्पूर्ण सेनाका प्रधान सेनापति ही हूँ; अतः पाण्डवोंको कष्ट देकर शत्रुसेनाके सैनिकोंका संहार करूँगा
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আমি তো তোমার সমগ্র সেনার প্রধান সেনাপতি; অতএব পাণ্ডবদের কষ্ট দিয়ে শত্রুসেনার যোদ্ধাদের ধ্বংস করব।
Verse 24
न त्वात्मनो गुणान् वक्तुमहामि विदितोडस्मि ते । कृतवर्मा त्वतिरथो भोज: शस्त्रभृतां वर:,मैं अपने मुँहसे अपने ही गुणोंका बखान करना उचित नहीं समझता। तुम तो मुझे जानते ही हो। शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भोजवंशी कृतवर्मा तुम्हारे दलमें अतिरथी वीर हैं
নিজ মুখে নিজের গুণগান করা আমার পক্ষে শোভন নয়; তুমি তো আমাকে জানই। অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভোজবংশীয় কৃতবর্মা তোমার দলে অতিরথ বীর।
Verse 25
अर्थसिद्धि तव रणे करिष्यति न संशय: । शस्त्रविद्धिरनाधृष्यो दूरपाती दृढायुध:,हनिष्यति चमूं तेषां महेन्द्रो दानवानिव । ये युद्धमें तुम्हारे अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करेंगे। इसमें संशय नहीं है। बड़े-बड़े शस्त्रवेत्ता भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। इनके आयुध अत्यन्त दृढ़ हैं और ये दूरके लक्ष्यको भी मार गिरानेमें समर्थ हैं। जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार ये भी पाण्डवोंकी सेनाका विनाश करेंगे
যুদ্ধে সে তোমার অভীষ্ট উদ্দেশ্য সিদ্ধ করবে—এতে সন্দেহ নেই। অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী, মহা শস্ত্রজ্ঞদেরও অদম্য; দৃঢ় অস্ত্রে সজ্জিত, দূর থেকে লক্ষ্যভেদে সক্ষম। দেবরাজ মহেন্দ্র যেমন দানবদের নিধন করেছিলেন, তেমনি সে তাদের সেনাকে ধ্বংস করবে।
Verse 26
मद्रराजो हेष्वास: शल्यो मेडतिरथो मतः,स्पर्थते वासुदेवेन नित्यं यो वै रणे रणे । महाधनुर्धर मद्रराज शल्यको भी मैं अतिरथी मानता हूँ, जो प्रत्येक युद्धमें सदा भगवान् श्रीकृष्णके साथ स्पर्धा रखते हैं
মহাধনুর্ধর মদ্ররাজ শল্যকেও আমি অতিরথ মনে করি—যিনি প্রতি যুদ্ধে সর্বদা বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের সঙ্গে প্রতিযোগিতা করেন।
Verse 27
भागिनेयान् निजांस्त्यक्त्वा शल्यस्तेडतिरथो मतः । एष योत्स्यति संग्रामे पाण्डवांश्व महारथान्,सागरोर्मिंसमैर्बाणै: प्लावयन्निव शात्रवान् | ये अपने सगे भानजों नकुल-सहदेवको छोड़कर अन्य सभी पाण्डव महारथियोंसे समरभूमिमें युद्ध करेंगे। तुम्हारी सेनाके इन वीरशिरोमणि शल्यको मैं अतिरथी ही समझता हूँ। ये समुद्रकी लहरोंके समान अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके सैनिकोंको डुबाते हुए-से युद्ध करेंगे
নিজের ভগ্নীপুত্রদের (নকুল–সহদেবকে) ত্যাগ করে শল্য তোমার পক্ষে আমার মতে অতিরথ। তিনি যুদ্ধে পাণ্ডব—সেই মহারথীদের—বিরুদ্ধে লড়বেন এবং সমুদ্রতরঙ্গসম বাণবৃষ্টিতে শত্রুসেনাকে যেন প্লাবিত করে দেবেন।
Verse 28
भीष्म-दुर्योधन-संवाद भूरिश्रवा: कृतास्त्रश्न तव चापि हित: सुहृत्,सोमदत्तके पुत्र महाधनुर्धर भूरिश्रवा भी अस्त्र-विद्याके पण्डित और तुम्हारे हितैषी सुहृद् हैं। ये रथियोंके यूथपतियोंके भी यूथपति हैं, अतः तुम्हारे शत्रुओंकी सेनाका महान् संहार करेंगे
ভীষ্ম বললেন—সোমদত্তের পুত্র ভুরিশ্রবা সম্পূর্ণ প্রশিক্ষিত যোদ্ধা, মহাধনুর্ধর এবং তোমার কল্যাণকামী সুহৃদ। তিনি অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী এবং রথী-দলের নেতাদেরও নেতা; অতএব তিনি তোমার শত্রুসেনায় মহাবিনাশ ঘটাবেন।
Verse 29
सौमदत्तिर्महेष्वासो रथयूथपयूथप: । बलक्षयममित्राणां सुमहान्तं करिष्यति,सोमदत्तके पुत्र महाधनुर्धर भूरिश्रवा भी अस्त्र-विद्याके पण्डित और तुम्हारे हितैषी सुहृद् हैं। ये रथियोंके यूथपतियोंके भी यूथपति हैं, अतः तुम्हारे शत्रुओंकी सेनाका महान् संहार करेंगे
সোমদত্তের পুত্র (ভুরিশ্রবা) মহাধনুর্ধর এবং রথী-দলের নেতাদেরও নেতা; তিনি শত্রুদের সেনাবলকে অতিশয় মহাভাবে ক্ষয় করবেন।
Verse 30
सिन्धुराजो महाराज मतो मे द्विगुणो रथ: । योत्स्यते समरे राजन् विक्रान्तो रथसत्तम:,महाराज! सिन्धुराज जयद्रथको मैं दो रथियोंके बराबर समझता हूँ। ये बड़े पराक्रमी तथा रथी योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं। राजन! ये भी समरांगणमें पाण्डवोंके साथ युद्ध करेंगे
মহারাজ! সিন্ধুরাজ জয়দ্রথকে আমি দুই রথীর সমান গণ্য করি। হে রাজন, এই পরম বিক্রান্ত ও রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাও সমরে পাণ্ডবদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করবে।
Verse 31
द्रौोपदीहरणे राजन् परिक्लिष्टश्न॒ पाण्डवै: । संस्मरंस्तं परिक्लेशं योत्स्यते परवीरहा,नरेश्वर! द्रौपदीहरणके समय पाण्डवोंने इन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था। उस महान् क्लेशको याद करके शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले जयद्रथ अवश्य युद्ध करेंगे
হে নরেশ্বর! দ্রৌপদী-হরণের সময় পাণ্ডবরা তাকে ভীষণ কষ্ট দিয়েছিল। সেই মহা অপমান ও যন্ত্রণা স্মরণ করে শত্রুবীর-সংহারক জয়দ্রথ নিশ্চয়ই যুদ্ধ করবে।
Verse 32
एतेन हि तदा राजंस्तप आस्थाय दारुणम् | सुदुर्लभो वरो लब्ध: पाण्डवान् योद्धुमाहवे,राजन्! उस समय इन्होंने कठोर तपस्या करके युद्धमें पाण्डवोंसे मुठभेड़ कर सकनेका अत्यन्त दुर्लभ वर प्राप्त किया था
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! এই উপায়েই সে একদা ভয়ংকর তপস্যা অবলম্বন করে এক অতি দুর্লভ বর লাভ করেছিল—যুদ্ধক্ষেত্রে পাণ্ডবদের সঙ্গে সম্মুখসমরে অবতীর্ণ হতে পারার বর।
Verse 33
स एष रथशार्दूलस्तद् वैरं संस्मरन् रणे । योत्स्यते पाण्डवैस्तात प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान्,तात! ये रथियोंमें श्रेष्ठ जयद्रथ युद्धमें उस पुराने वैरको याद करके अपने दुस्त्यज प्राणोंकी भी बाजी लगाकर पाण्डवोंके साथ संग्राम करेंगे
ভীষ্ম বললেন—হে তাত! রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এই জয়দ্রথ যুদ্ধক্ষেত্রে সেই পুরোনো বৈর স্মরণ করে পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধ করবে, এবং ত্যাগ করা কঠিন প্রাণকেও পণ করবে।
Verse 164
इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वरें सेनापतिके द्वारा सैनिकोंकी युद्धर्ें नियुक्तिविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত উলূকদূতাগমনপর্বে সেনাপতির দ্বারা সৈন্যদের যুদ্ধনিয়োগ-বিষয়ক একশো চৌষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 165
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि पज्चषष्टयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ‘রথাতিরথসংখ্যানপর্ব’-এ একশো পঁয়ষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Bhīṣma differentiates between raw capability and dependable commitment: a warrior may possess extraordinary weapons and skill, yet be strategically less certain if self-preservation or personal bonds constrain decisive action.
Effective governance requires integrating moral psychology into strategy—assessing allies and commanders by motives, loyalties, and restraints, not merely by titles, lineage, or weaponry.
No explicit phalaśruti appears in the supplied passage; the chapter’s meta-function is archival and strategic, serving as a roster-based interpretive lens for understanding later campaign dynamics.