
नारदकथितं माधव्याः तपश्चर्या–ययातेः स्वर्गविचारः | Nārada on Mādhavī’s Asceticism and the Scrutiny of Yayāti in Heaven
Upa-parva: Nārada–Yayāti-Upākhyāna (Exemplum on Mādhavī and Yayāti)
Nārada narrates that the king, intending to arrange Mādhavī’s svayaṃvara, arrives at an āśrama region near the Gaṅgā–Yamunā confluence. Mādhavī, adorned with a garland, is placed on a chariot and brought to the hermitage, where a diverse assembly gathers—nāgas, yakṣas, humans, birds, animals, and sages—creating a panoramic ritual-social setting. When suitors are indicated, Mādhavī declines them and chooses the forest itself, dismounting, paying respects, and undertaking tapas as Yayāti’s daughter: fasting, vows, and disciplines transform her into a forest-dweller moving with deer, sustaining herself on tender grasses and pure waters, and practicing extensive dharma under brahmacarya. The narration then shifts to Yayāti: he is praised as a renowned king associated with long life and the establishment of the Pūru and Yadu lines, attaining heaven and enjoying eminent reward. Over a vast span of time, however, Yayāti becomes deluded by wonder and falls into contempt toward humans, gods, and sages. Indra recognizes the lapse; the assembled royal-sages express censure and initiate inquiry into Yayāti’s identity and the karmic basis of his heavenly status. Even heavenly attendants and gatekeepers profess ignorance. As recognition fails and the inquiry intensifies, Yayāti’s radiance and power diminish suddenly, marking a moral reversal that links status to sustained humility and merit.
Chapter Arc: नारद गालव-चरित का सूत्र उठाते हैं—गुरुदक्षिणा के असंभव-से लक्ष्य (श्यामकर्ण अश्व) के पीछे भटकते गालव को गरुड़ हँसते हुए देखता है और उसके प्रयत्न की सीमा बताता है। → गालव का संकल्प और विवशता बढ़ती है: श्यामकर्ण, चन्द्रवर्चस अश्वों की खोज में वह राजाओं-यज्ञों-तीर्थों तक भटकता है; माधवी का दान/विनिमय और विश्वामित्र की सेवा का प्रसंग इस तनाव को नैतिक भार देता है—लक्ष्य पूरा हो, पर किस कीमत पर? → माधवी के गर्भ से चार पुत्रों का भविष्य-वचन और फलश्रुति उद्घाटित होती है—एक दानपति, एक शूरवीर, एक सत्य-धर्मरत रक्षक, और एक यज्वा; इसी क्षण गालव को प्रतीत होता है कि उसका ‘ऋण’ केवल अश्वों से नहीं, नियति के विधान से भी चुक रहा है। → गालव गरुड़-सहित गुरुदक्षिणा अर्पित कर कृतकृत्य होता है; माधवी को आश्वस्त करता है कि उसके पुत्र महान गुणों से युक्त होंगे और पिता/कुल का उद्धार करेंगे—त्याग का फल कीर्ति और धर्म-प्रतिष्ठा बनकर लौटता है। → गालव-चरित का यह खंड समाप्त होते ही प्रश्न शेष रहता है—ऐसी ‘धर्म-सिद्धि’ जिसमें एक स्त्री का बार-बार दान हो, उसे धर्म कहें या युग-धर्म की कठोरता?
Verse 1
ऑपन--माज छा जि: एकोनविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: गालवका छ: सौ घोड़ोंके साथ माधवीको विश्वामित्रजीकी सेवामें देना और उनके द्वारा उसके गर्भसे अष्टक नामक पुत्रकी उत्पत्ति होनेके बाद उस कन्याको ययातिके यहाँ लौटा देना नारद उवाच गालवं वैनतेयो5थ प्रहसन्निदमब्रवीत् । दिष्ट्या कृतार्थ पश्यामि भवन्तमिह वै द्विज
নারদ বললেন—তখন বৈনতেয় গরুড় হাসতে হাসতে গালবকে বলল—“দ্বিজ! সৌভাগ্যবশত আমি তোমাকে এখানে কৃতার্থ দেখছি।”
Verse 2
नारदजी कहते हैं--उस समय विनतानन्दन गरुड़ने गालव मुनिसे हँसते हुए कहा --“ब्रह्मन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मैं तुम्हें यहाँ कृतकृत्य देख रहा हूँ ।।
গরুড়ের কথা শুনে গালব বললেন—“গুরুদক্ষিণার এক চতুর্থাংশ এখনও অবশিষ্ট; তা শীঘ্রই সম্পন্ন করতে হবে।”
Verse 3
सुपर्णस्त्वब्रवीदेनं गालवं वदतां वर: । प्रयत्नस्ते न कर्तव्यो नैष सम्पत्स्यते तव
তখন বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সুপর্ণ গরুড় গালবকে বলল—“এ বিষয়ে আর তোমার চেষ্টা করা উচিত নয়; তোমার এই অভিপ্রায় সিদ্ধ হবে না।”
Verse 4
पुरा हि कान्यकुब्जे वै गाधे: सत्यवतीं सुताम् । भार्यार्थेडवरयत् कन्यामृचीकस्तेन भाषित:
প্রাচীন কালে কান্যকুব্জে রাজা গাধির কন্যা সত্যবতীকে পত্নীরূপে প্রার্থনা করে ঋচীক মুনি রাজাকে অনুরোধ করলেন। ঋচীকের সেই প্রার্থনা শুনে রাজা তাঁকে বললেন—
Verse 5
एकत: श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । भगवन् दीयतां महां सहस्रमिति गालव,ऋचीकस्तु तथेत्युक्त्वा वरुणस्यालयं गत: । अश्वतीर्थे हयॉल्लब्ध्वा दत्तवान् पार्थिवाय वै ६ ।।
গালব বললেন—“ভগবন্, কন্যাশুল্করূপে আমাকে এমন এক সহস্র উৎকৃষ্ট অশ্ব দিন, যাদের দীপ্তি চন্দ্রসম এবং যাদের এক পাশের কর্ণ শ্যামবর্ণ।” ঋচীক মুনি বললেন, “তথাস্তु,” এবং বরুণের ধামে গেলেন। সেখানে অশ্বতীর্থে সেইরূপ অশ্ব লাভ করে তিনি যথাবিধি রাজাকে প্রদান করলেন।
Verse 6
ऋचीकस्तु तथेत्युक्त्वा वरुणस्यालयं गत: । अश्वतीर्थे हयॉल्लब्ध्वा दत्तवान् पार्थिवाय वै ६ ।।
নারদ বললেন—ঋচীক মুনি “তথাস্তু” বলে বরুণের ধামে গেলেন। সেখানে অশ্বতীর্থে অশ্ব লাভ করে তিনি যথাবিধি রাজাকে প্রদান করলেন।
Verse 7
इष्ट्वा ते पुण्डरीकेण दत्ता राज्ञा द्विजातिषु । तेभ्योद्े द्वे शते क्रीत्वा प्राप्ते तैः पार्थिवैसतदा
নারদ বললেন—রাজা পুণ্ডরীক যজ্ঞ সম্পন্ন করে সেই অশ্বগুলি দ্বিজ ব্রাহ্মণদের দক্ষিণারূপে দান করলেন। পরে অন্যান্য রাজারা সেই ব্রাহ্মণদের কাছ থেকে দু’শো করে অশ্ব ক্রয় করে তা লাভ করল।
Verse 8
अपराण्यपि चत्वारि शतानि द्विजसत्तम | नीयमानानि संतारे हृतान्यासन् वितस्तया
নারদ বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, পথে এক স্থানে নদী পার হতে হয়েছিল। সেই ছয়শোর সঙ্গে আরও চারশো অশ্ব ছিল; পারাপারের সময় বিতস্তার প্রবল স্রোতে সেই চারশো অশ্ব ভেসে গেল।
Verse 9
एवं न शक्यमप्राप्य॑ प्राप्तुंगालव करहिचित् । इमामश्वशताभ्यां वै द्वाभ्यां तस्मै निवेदय
নারদ বললেন—“হে গালব, যা অপ্রাপ্য তা কখনও প্রাপ্ত হয় না। এই দেশে এই ছয়শো অশ্ব ছাড়া আর অশ্ব মেলে না; অতএব অবশিষ্ট দুইশো অশ্ব কোথাও সংগ্রহ করা অসম্ভব। আমার পরামর্শ এই—ওই দুইশো অশ্বের পরিবর্তে এই কন্যাকেই বিশ্বামিত্রের কাছে সমর্পণ কর। ধর্মাত্মন, এই ছয়শো অশ্বের সঙ্গে তাকেও বিশ্বামিত্রের সেবায় দান কর। এতে তোমার সমস্ত উদ্বেগ দূর হবে এবং তুমি সম্পূর্ণ কৃতকৃত্য হবে।”
Verse 10
विश्वामित्राय धर्मात्मन् षड्भिरश्वशतै: सह । ततो5सि गतसम्मोहः कृतकृत्यो द्विजोत्तम
“ধর্মাত্মন, এই ছয়শো অশ্বসহ তা বিশ্বামিত্রকে দান কর। তখন, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, তোমার মোহ দূর হবে এবং তুমি কৃতকৃত্য হবে।”
Verse 11
गालवस्तं तथेत्युक्त्वा सुपर्णसहितस्तत: । आदायाश्षांश्व कन्यां च विश्वामित्रमुपागमत्,तब “बहुत अच्छा” कहकर गालव गरुड़के साथ वे (छ: सौ) घोड़े और वह कन्या लेकर विश्वामित्रजीके पास आये
তখন “তথাস্তু” বলে গালব সুপর্ণ (গরুড়)-সহ সেই অশ্বসমূহ ও কন্যাকে নিয়ে বিশ্বামিত্রের কাছে গেল।
Verse 12
अश्चानां काड्क्षितार्थानां पडिमानि शतानि वै | शतद्वयेन कन्येयं भवता प्रतिगृह्मताम्
তারা বলল—“গুরুদেব, আপনি যেমন চেয়েছিলেন তেমনই এই ছয়শো অশ্ব আপনার সেবায় উপস্থিত। আর অবশিষ্ট দুইশোর পরিবর্তে এই কন্যাকে গ্রহণ করুন।”
Verse 13
अस्यां राजर्षिश्रि: पुत्रा जाता वै धार्मिकास्त्रय: । चतुर्थ जनयत्वेक॑ भवानपि नरोत्तमम्
নারদ বললেন—“এই মহীয়সী নারীর গর্ভে রাজর্ষিদের তিনজন ধর্মপরায়ণ পুত্র জন্মেছে। এখন, হে নরোত্তম, আপনিও এক পুত্র উৎপন্ন করুন—যাতে সে চতুর্থ হয়।”
Verse 14
पूर्णान्यिवं शतान्यष्टौ तुरगाणां भवन्तु ते । भवतो हानृणो भूत्वा तप: कुर्या यथासुखम्,“इस प्रकार आपके आठ सौ घोड़ोंकी संख्या पूरी हो जाय और मैं आपसे उऋ्ण होकर सुखपूर्वक तपस्या करूँ, ऐसी कृपा कीजिये”
নারদ বললেন—“এইভাবে তোমার অশ্বের সংখ্যা পূর্ণ হোক—মোট আটশো। আমাকে এই অনুগ্রহ করো, যাতে তোমার ঋণমুক্ত হয়ে আমি স্বস্তিতে, যথাসুখ তপস্যা করতে পারি।”
Verse 15
विश्वामित्रस्तु तं दृष्टया गालवं सह पक्षिणा । कन्यां च तां वरारोहामिदमित्यब्रवीद् वच:,विश्वामित्रने गरुड़सहित गालवकी ओर देखकर इस परम सुन्दरी कन्यापर भी दृष्टिपात किया और इस प्रकार कहा--
নারদ বললেন—গালবকে গরুড়সহ দেখে বিশ্বামিত্র সেই অপরূপা, শ্রেষ্ঠারোহণা কন্যার দিকেও দৃষ্টি দিলেন এবং এইভাবে কথা বললেন।
Verse 16
किमियं पूर्वमेवेह न दत्ता मम गालव । पुत्रा ममैव चत्वारो भवेयु: कुलभावना:
নারদ বললেন—“গালব, এ কন্যাকে আগে এখানেই আমাকে কেন দেওয়া হলো না? দিলে আমারই চার পুত্র—কুলবর্ধক—জন্মাত।”
Verse 17
“गालव! तुमने पहले ही इसे यहीं क्यों नहीं दे दिया, जिससे मुझे ही वंशप्रवर्तक चार पुत्र प्राप्त हो जाते ।।
নারদ বললেন—“গালব! তুমি আগে এখানেই কেন তাকে দিলে না, যাতে আমারই বংশপ্রবর্তক চার পুত্র লাভ হতো? আচ্ছা, এখন এক পুত্ররূপ ফলের জন্য আমি তোমার কাছ থেকে এই কন্যাকে গ্রহণ করছি। আর এই ঘোড়াগুলি আমার আশ্রমে এসে সর্বত্র অবাধে চরে বেড়াক—এগুলি আমারই হোক।”
Verse 18
स तया रममाणो<थ विश्वामित्रो महाद्युति: । आत्मजं जनयामास माधवीपुत्रमष्टकम्
নারদ বললেন—তখন মহাতেজস্বী বিশ্বামিত্র তার সঙ্গে মিলিত হয়ে যথাকালে এক পুত্র উৎপন্ন করলেন। মাধবীর সেই পুত্রের নাম ছিল অষ্টক।
Verse 19
जातमात्र सुतं तं च विश्वामित्रो महामुनि: । संयोज्यार्थस्तथा धर्मरश्वैस्त: समयोजयत्,पुत्रके उत्पन्न होते ही महामुनि विश्वामित्रने उसे धर्म, अर्थ तथा उन अश्वोंसे सम्पन्न कर दिया
পুত্র জন্মামাত্রই মহামুনি বিশ্বামিত্র তৎক্ষণাৎ তাকে অর্থ ও ধর্মের সঙ্গে যুক্ত করলেন এবং উৎকৃষ্ট অশ্বে সমৃদ্ধ করলেন—যাতে সে কর্তব্যপথে ও কার্যসিদ্ধিতে সক্ষম হয়।
Verse 20
अथाष्टक: पुरं प्रायात् तदा सोमपुरप्रभम् | निर्यात्य कनन््यां शिष्याय कौशिको5पि वनं ययौ
তখন অষ্টক সোমপুরের ন্যায় দীপ্তিমান নগরের দিকে যাত্রা করল। কন্যাকে শিষ্যের কাছে পাঠিয়ে কৌশিক (বিশ্বামিত্র) নিজেও বনে প্রস্থান করলেন।
Verse 21
तदनन्तर अष्टक चन्द्रपुरीके समान प्रकाशित होनेवाली विश्वामित्रजीकी राजधानीमें गया और विश्वामित्र भी अपने शिष्य गालवको वह कन्या लौटाकर वनमें चले गये ।।
এরপর অষ্টক চন্দ্রপুরীর ন্যায় দীপ্তিমান বিশ্বামিত্রের রাজধানীতে গেল। বিশ্বামিত্রও কন্যাকে শিষ্য গালবের হাতে ফিরিয়ে দিয়ে বনে প্রস্থান করলেন। গালবও সুপর্ণের সঙ্গে গুরুদক্ষিণা অর্পণ করতে বেরোল; এবং অন্তরে গভীর তৃপ্তি নিয়ে কন্যাকে এই কথা বলল।
Verse 22
जातो दानपति: पुत्रस्त्वया शूरस्तथापर: । सत्यधर्मरतक्षान्यो यज्वा चापि तथापर:
তোমার গর্ভ থেকে এক পুত্র জন্মেছে দানের অধিপতি, আরেকজন বীর। আরেকজন সত্য ও ধর্মে নিবিষ্ট, এবং আরেকজন যজ্ঞকারীও বটে।
Verse 23
तदागच्छ वरारोहे तारितस्ते पिता सुतैः । चत्वारश्चैव राजानस्तथा चाहं सुमध्यमे
এখন এসো, হে বরারোহে। তোমার পিতা পুত্রদের দ্বারা উদ্ধার পেয়েছেন; আর চারজন রাজাও—এবং আমিও, হে সুমধ্যমে।
Verse 24
गरुड़सहित गालव भी गुरुदक्षिणा देकर मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हो राजकन्या माधवीसे इस प्रकार बोले--'सुन्दरी! तुम्हारा पहला पुत्र दानपति
এই কথা বলে সাপভোজী সুপর্ণ গরুড়ের অনুমতি নিয়ে গালব রাজকন্যাটিকে তার পিতা যযাতির নিকট পৌঁছে দিয়ে পুনরায় অরণ্যের পথ ধরলেন।
Verse 119
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते एकोनविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিত-প্রসঙ্গে একশো উনিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
The chapter juxtaposes two ethical choices: Mādhavī’s rejection of socially validated options (suitors) in favor of self-discipline, and Yayāti’s lapse into contempt despite attained reward—posing the dilemma of whether status should be treated as entitlement or as a responsibility requiring continued restraint.
Merit is portrayed as dynamic rather than static: tapas, humility, and disciplined conduct stabilize honor, while pride and disparagement corrode it, even in exalted settings; recognition and legitimacy depend on demonstrable ethical grounding.
No explicit phalaśruti formula appears in the provided verses; instead, the narrative itself functions as meta-commentary by dramatizing the conditionality of heavenly prestige upon continued dharmic disposition.