Adhyaya 117
Udyoga ParvaAdhyaya 11722 Verses

Adhyaya 117

Gālava Completes the Horse-Gift: Garuḍa’s Counsel and Viśvāmitra’s Acceptance (गालव-विष्वामित्र-सम्बन्धः)

Upa-parva: Gālava–Mādhavī Episode (Embedded Exemplum within Udyoga-parva)

Nārada narrates Garuḍa (Vainateya/Suparṇa) addressing Gālava, acknowledging his near-completion of the demanded gift and disclosing that a quarter remains unresolved. Garuḍa cautions that further striving for the unattained ideal will not succeed, illustrating the point through an earlier precedent at Kānyakubja: Ṛcīka secures a requested set of distinctive horses via Varuṇa’s abode and Aśvatīrtha, yet even then additional horses are lost during transit—demonstrating practical limits in acquisition and custody. Garuḍa advises Gālava to present the remaining two hundred horses alongside the already obtained six hundred to Viśvāmitra, completing eight hundred in total. Gālava approaches Viśvāmitra with the horses and Mādhavī, requesting acceptance and proposing that Viśvāmitra also father a fourth son upon her (after three already born to royal sages). Viśvāmitra questions why she was not offered earlier, then accepts her for the single-son outcome; he fathers Aṣṭaka and integrates the settlement with dharmic and material arrangements, sending the child to a city described as Somapura. Viśvāmitra returns Mādhavī to Gālava; Gālava acknowledges the four sons produced through her, affirms that her father is ‘rescued’ by these lineal outcomes, and then releases Garuḍa and proceeds to the forest, marking closure of obligation and transition to ascetic pursuit.

Chapter Arc: गालव अपने अधूरे व्रत-कार्य की सिद्धि का भार मन में लिए, उपाय खोजते-खोजते भोजनगर में सत्यविक्रम राजा उशीनर के पास पहुँचते हैं—जहाँ एक कन्या का भविष्य और एक राजवंश का उत्तराधिकार एक साथ दाँव पर है। → गालव राजा से निवेदन करते हैं कि यह कन्या (माधवी) उनके लिए पुत्र उत्पन्न कर सकती है; पर राजा के सामने धर्म-संकट है—क्या वह एक ब्राह्मण के प्रयोजन हेतु कन्या को स्वीकार करे, और क्या पुत्र-प्राप्ति का लोभ उसे मर्यादा से विचलित करेगा? गालव पुत्र-धर्म, स्वर्ग-फल और वंश-रक्षा के तर्कों से राजा को समझाते हैं कि पुत्रहीनता पतन का कारण बनती है और पुत्र-फल का उपभोग करने वाला स्वर्ग से नहीं गिरता। → राजा उशीनर के दरबार में निर्णायक संवाद—गालव का धर्मयुक्त प्रतिपादन और राजा का अंतर्मंथन—यहीं चरम पर पहुँचता है, जब राजा कन्या-स्वीकार/पुत्र-प्राप्ति के प्रस्ताव को धर्मसम्मत मानकर स्वीकार करने की ओर झुकता है। → राजा उशीनर गालव की न्याययुक्त वाणी से संतुष्ट होते हैं; गालव उनका आदरपूर्वक पूजन करते हैं और कन्या को साथ लेकर आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे पर्वत-कंदराओं, नदी-तटों, झरनों, उद्यानों, वनों, अट्टालिकाओं और प्रासाद-शिखरों जैसे विविध रमणीय स्थलों का वर्णन/अनुभव करते हुए आगे बढ़ते हैं। → गालव कन्या को लेकर अगले राजा/अगले चरण की ओर बढ़ते हैं—यह संकेत छोड़ते हुए कि यह यात्रा अभी समाप्त नहीं, और व्रत-पूर्ति के लिए आगे और भी निर्णायक सौदे शेष हैं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११७ ॥। अपन क्रात बछ। >> 2 अष्टादशाधिकशततमोब<् ध्याय: उशीनरका ययातिकन्या माधवीके गर्भसे शिबि नामक पुत्र उत्पन्न करना, गालवका उस कन्याको साथ लेकर जाना और मार्गमें गरुड़का दर्शन करना नारद उवाच तथैव तां श्रियं त्यक्त्वा कन्या भूत्वा यशस्विनी । माधवी गालवं विप्रमभ्ययात्‌ सत्यसंगरा,नारदजी कहते हैं--तदनन्तर वह यशस्विनी राजकन्या माधवी सत्यके पालनमें तत्पर हो काशी-नरेशकी उस राजलक्ष्मीको त्यागकर विप्रवर गालवके साथ चली गयी

নারদ বললেন—এইভাবেই যশস্বিনী মাধবী সেই রাজলক্ষ্মী ত্যাগ করে, পুনরায় কন্যারূপ ধারণ করে, সত্যরক্ষায় দৃঢ় হয়ে ব্রাহ্মণ গালবের নিকট গমন করল।

Verse 2

गालवो विमृशन्नेव स्वकार्यगतमानस: । जगाम भोजनगरं द्रष्टमौशीनरं नृपम्‌,गालवका मन अपने कार्यकी सिद्धिके चिन्तनमें लगा था। उन्होंने मन-ही-मन कुछ सोचते हुए राजा उशीनरसे मिलनेके लिये भोजनगरकी यात्रा की

নারদ বললেন—গালব নিজের কার্যের সিদ্ধিতে মন নিবদ্ধ করে অন্তরে চিন্তা করতে করতে ঔশীনর রাজাকে দর্শন করতে ভোজননগরে গেল।

Verse 3

तमुवाचाथ गत्वा स नृपतिं सत्यविक्रमम्‌ । इयं कन्या सुतौ द्वौ ते जनयिष्यति पार्थिवौ,उन सत्यपराक्रमी नरेशके पास जाकर गालवने उनसे कहा--'राजन्‌! यह कन्या आपके लिये पृथ्वीका शासन करनेमें समर्थ दो पुत्र उत्पन्न करेगी

নারদ বললেন—তখন সে সত্যবিক্রমী নৃপতির নিকট গিয়ে বলল—‘হে রাজন, এই কন্যা আপনার জন্য পৃথিবী শাসনে যোগ্য দুই পুত্র প্রসব করবে।’

Verse 4

अस्यां भवानवाप्तार्थों भविता प्रेत्य चेह च । सोमार्कप्रतिसंकाशौ जनयित्वा सुतौ नूप,“नरेश्वर! इसके गर्भसे सूर्य और चन्द्रमाके समान दो तेजस्वी पुत्र पैदा करके आप लोक और परलोकमें भी पूर्णकाम होंगे

নারদ বললেন—‘হে নৃপ! এই কন্যার দ্বারা আপনি ইহলোকেও পরলোকেও অভীষ্ট লাভ করবেন। চন্দ্র-সূর্যসম দীপ্তিমান দুই পুত্র উৎপন্ন করে আপনি পরিপূর্ণ হবেন।’

Verse 5

शुल्कं तु सर्वधर्मज्ञ हयानां चन्द्रवर्चसाम्‌ । एकत: श्यामकर्णानां देयं महां चतुःशतम्‌,“समस्त धर्मोके ज्ञाता भूपाल! आप इस कन्याके शुल्कके रूपमें मुझे ऐसे चार सौ अश्व प्रदान करें, जो चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित तथा एक ओरसे श्यामवर्णके कानोंवाले हों

নারদ বললেন—‘হে সর্বধর্মজ্ঞ ভূপাল! এই কন্যার শুল্করূপে আমাকে চার শত উৎকৃষ্ট অশ্ব দিতে হবে—চন্দ্রসম উজ্জ্বল কান্তিযুক্ত, আর যাদের কান এক পাশে শ্যামবর্ণ।’

Verse 6

गुर्वर्थोडयं समारम्भो न हयै: कृत्यमस्ति मे । यदि शक्‍्यं महाराज क्रियतामविचारितम्‌,“मैंने गुरुदक्षिणा देनेके लिये यह उद्योग आरम्भ किया है अन्यथा मुझे इन घोड़ोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। महाराज! यदि आपके लिये यह शुल्क देना सम्भव हो तो कोई अन्यथा विचार न करके यह कार्य सम्पन्न कीजिये

নারদ বললেন—“গুরুদক্ষিণার উপায় করতেই এই উদ্যোগ; নচেৎ এই অশ্বগুলির আমার কোনো প্রয়োজন নেই। হে মহারাজ, যদি আপনার পক্ষে এই দেনা পরিশোধ করা সম্ভব হয়, তবে কোনো দ্বিধা না করে অবিলম্বে তা সম্পন্ন করুন।”

Verse 7

अनपत्योऊसि राजर्षे पुत्रो जनय पार्थिव । पितृन्‌ पुत्र॒प्लवेन त्वमात्मानं चैव तारय,'राजर्षे! पृथ्वीपते! आप संतानहीन हैं। अतः इससे दो पुत्र उत्पन्न कीजिये और पुत्ररूपी नौकाद्वारा पितरोंका तथा अपना भी उद्धार कीजिये

নারদ বললেন—“হে রাজর্ষি, হে পার্থিব! আপনি নিঃসন্তান। অতএব পুত্র উৎপন্ন করুন; পুত্ররূপ নৌকায় পিতৃগণকে এবং নিজেকেও উদ্ধার করুন।”

Verse 8

न पुत्रफलभोक्ता हि राजर्षे पात्यते दिव: । न याति नरकं घोर यथा गच्छन्त्यनात्मजा:,*राजर्षे! पुत्रजनित पुण्यफलका उपभोग करनेवाला मनुष्य कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिराया जाता और संतानहीन मनुष्य जिस प्रकार घोर नरकमें पड़ते हैं, उस प्रकार वह नहीं पड़ता”

নারদ বললেন—“হে রাজর্ষি! পুত্রজনিত পুণ্যফল ভোগকারী কখনো স্বর্গ থেকে পতিত হয় না। আর নিঃসন্তানরা যেমন ভয়ংকর নরকে পতিত হয় বলে শোনা যায়, সে তেমন নরকে যায় না।”

Verse 9

एतच्चान्यच्च विविध श्रुत्वा गालवभाषितम्‌ | उशीनर: प्रतिवचो ददौ तस्य नराधिप:,गालवकी कही हुई ये तथा और भी बहुत-सी बातें सुनकर राजा उशीनरने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया--

গালবের বলা এইসব এবং আরও নানা কথা শুনে, মানুষের অধিপতি রাজা উশীনর তাকে এইভাবে প্রত্যুত্তর দিলেন।

Verse 10

श्रुतवानस्मि ते वाक्यं यथा वदसि गालव । विधिस्तु बलवान ब्रद्मन्‌ प्रवणं हि मनो मम,“विप्रवर गालव! आप जैसा कहते हैं, वे सब बातें मैंने सुन लीं। परंतु विधाता प्रबल है। मेरा मन इससे संतान उत्पन्न करनेके लिये उत्सुक हो रहा है

উশীনর বললেন—“হে বিপ্রশ্রেষ্ঠ গালব, তুমি যেমন বলেছ, তোমার সব কথা আমি শুনেছি। কিন্তু বিধি প্রবল, হে ব্রাহ্মণ; আমার মন সত্যই সন্তানের জন্মদানের দিকে ঝুঁকে পড়েছে।”

Verse 11

शते द्वे तु ममाश्वानामीदृशानां द्विजोत्तम | इतरेषां सहस्राणि सुबहूनि चरन्ति मे,द्विजश्रेष्ठ आपको जिनकी आवश्यकता है, ऐसे अश्व तो मेरे पास दो ही सौ हैं। दूसरी जातिके तो कई सहस्र घोड़े मेरे यहाँ विचरते हैं

নারদ বললেন—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! তুমি যে ধরনের অশ্ব চাইছ, তেমন আমার কাছে মাত্র দুই শত আছে। অন্য জাতের অশ্ব তো বহু সহস্র আমার অধিকারে বিচরণ করে।

Verse 12

अहमप्येकमेवास्यां जनयिष्यामि गालव । पुत्रं द्विज गतं मार्ग गमिष्यामि परैरहम्‌,“अतः ब्रह्मर्षि गालव! मैं भी इस कन्याके गर्भसे एक ही पुत्र उत्पन्न करूँगा। दूसरे लोग जिस मार्गपर चले हैं, उसीपर मैं भी चलूँगा

নারদ বললেন—হে ব্রহ্মর্ষি গালব! আমিও এই কন্যার গর্ভ থেকে কেবল একটিমাত্র পুত্রই উৎপন্ন করব। হে দ্বিজ! অন্যেরা যে পথে গিয়েছে, আমিও সেই পথেই চলব।

Verse 13

मूल्येनापि सम॑ कुर्या तवाहं द्विजसत्तम । पौरजानपदार्थ तु ममार्थो नात्मभोगत:,द्विजप्रवर! मैं घोड़ोंका मूल्य देकर आपका सारा शुल्क चुका दूँ, यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि मेरा धन पुरवासियों तथा जनपदनिवासियोंके लिये है, अपने उपभोगमें लानेके लिये नहीं

নারদ বললেন—হে দ্বিজপ্রবর! ঘোড়ার মূল্য দিয়েও আমি তোমার সম্পূর্ণ প্রাপ্য শোধ করতে পারব না। কারণ আমার ধন নগরবাসী ও জনপদবাসীদের কল্যাণার্থে, নিজের ভোগের জন্য নয়।

Verse 14

कामतो हि धनं राजा पारक्‍्यं य: प्रयच्छति । न स धर्मेण धर्मात्मन्‌ युज्यते यशसा न च,“धर्मात्मन! जो राजा पराये धनका अपनी इच्छाके अनुसार दान करता है, उसे धर्म और यशकी प्राप्ति नहीं होती है

নারদ বললেন—হে ধর্মাত্মন! যে রাজা নিজের ইচ্ছামতো অন্যের ধন দান করে, সে না ধর্মে যুক্ত হয়, না সত্য যশ লাভ করে।

Verse 15

सोऊहं प्रतिग्रहीष्यामि ददात्वेतां भवान्‌ मम | कुमारी देवगर्भाभामेकपुत्रभवाय मे,“अत: आप देवकन्याके समान सुन्दरी इस राजकुमारीको केवल एक पुत्र उत्पन्न करनेके लिये मुझे दें। मैं इसे ग्रहण करूँगा”

নারদ বললেন—আমি একে গ্রহণ করব। মহারাজ, দেবকন্যার ন্যায় দীপ্তিমতী এই কুমারীকে আমাকে দিন, যাতে সে আমার জন্য কেবল এক পুত্র প্রসব করে।

Verse 16

तथा तु बहुधा कन्यामुक्तवन्तं नराधिपम्‌ । उशीनरं द्विजश्रेष्ठो गालव: प्रत्यपूजयत्‌,इस प्रकार भाँति-भाँतिकी न्याययुक्त बातें कहनेवाले राजा उशीनरकी विप्रवर गालवने भूरि-भूरि प्रशंसा की

এইভাবে কন্যা-সম্বন্ধে নানাবিধ ন্যায়সঙ্গত বাক্য উচ্চারণকারী নরাধিপ উশীনরকে দ্বিজশ্রেষ্ঠ গালব যথাবিধি সম্মান করলেন এবং বহুল প্রশংসা করলেন।

Verse 17

उशीनरं प्रतिग्राह्म गालव: प्रययौ वनम्‌ । रेमे स तां समासाद्य कृतपुण्य इव श्रियम्‌,उशीनरको वह कन्या सौंपकर गालव मुनि वनको चले गये। जैसे पुण्यात्मा पुरुष राज्यलक्ष्मीको प्राप्त करे, उसी प्रकार उस राजकन्याको पाकर राजा उशीनर उसके साथ रमण करने लगे

উশীনরকে সেই কন্যা সমর্পণ করে গালব মুনি বনে প্রস্থান করলেন। আর রাজা উশীনর তাকে লাভ করে তার সঙ্গে তেমনই রমণ করলেন, যেমন পুণ্যবান পুরুষ রাজলক্ষ্মী লাভ করে আনন্দিত হয়।

Verse 18

कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्डरिषु च । उद्यानेषु विचित्रेषु वनेषूपवनेषु च

পর্বতের গুহায়, নদীর ঝরনার ধারে, বিচিত্র উদ্যানসমূহে, এবং বন ও উপবনে।

Verse 19

हम्येंषु रमणीयेषु प्रासादशिखरेषु च । वातायनविमानेषु तथा गर्भगृहेषु च

মনোরম প্রাসাদসমূহে, প্রাসাদের শিখরে, জানালাযুক্ত উঁচু মণ্ডপে, এবং অন্তঃপুরের গর্ভগৃহসম কক্ষে।

Verse 20

उन्होंने पर्वतोंकी कन्दराओंमें, नदियोंके सुरम्य तटोंपर, झरनोंके आस-पास, विचित्र उद्यानोंमें, वनों और उपवनोंमें, रमणीय अट्टालिकाओंमें, प्रासादशिखरोंपर, वायु-के मार्गसे उड़नेवाले विमानोंपर तथा पृथ्वीके भीतर बने हुए गर्भगृहोंमें माधवीके साथ विहार किया ।। ततो<स्य समये जज्ञे पुत्रो बालरविप्रभ: । शिबिनाम्नाभिविख्यातो य: स पार्थिवसत्तम:,तदनन्तर यथासमय उसके गर्भसे राजाको एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो बालसूर्यके समान तेजस्वी था। वही बड़ा होनेपर नृपश्रेष्ठ महाराज शिबिके नामसे विख्यात हुआ

তিনি পর্বতের গুহায়, নদীর মনোরম তটে, ঝরনার আশেপাশে, বিচিত্র উদ্যানে, বন ও উপবনে, মনোরম অট্টালিকায়, প্রাসাদের শিখরে, জানালাযুক্ত উঁচু মণ্ডপে এবং ভূগর্ভস্থ গর্ভগৃহসম কক্ষে—মাধবীর সঙ্গে বিহার করলেন। তারপর যথাসময়ে তার গর্ভে রাজার এক পুত্র জন্মাল, যে নবোদিত সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান; সেই সন্তানই পরে নৃপশ্রেষ্ঠ ‘শিবি’ নামে প্রসিদ্ধ হল।

Verse 21

उपस्थाय स तं विप्रो गालव: प्रतिगृह्म॒ च कनन्‍्यां प्रयातस्तां राजन्‌ दृष्टवान्‌ विनतात्मजम्‌,राजन! तत्पश्चात्‌ विप्रवर गालव राजाके दरबारमें उपस्थित हुए और उस कन्याको वापस लेकर वहाँसे चल दिये। मार्ममें उन्हें विनतानन्दन गरुड़ दिखायी दिये

রাজন! তারপর ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ গালব রাজার সভায় উপস্থিত হয়ে কন্যাটিকে পুনরায় গ্রহণ করে সেখান থেকে যাত্রা করলেন। পথে অগ্রসর হতে হতে তিনি বিনতার পুত্র গরুড়কে দর্শন করলেন।

Verse 118

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते अष्टादशाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিত-বিষয়ক একশো আঠারোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Gālava faces a dharma-sankat between uncompromising pursuit of an idealized requirement (the remaining horses) and an ethically acceptable settlement that fulfills intent, closes the debt, and avoids endless escalation.

The chapter teaches dharmic pragmatism: when constraints make perfect fulfillment unattainable, one should complete obligations through transparent, proportionate means under legitimate authority, prioritizing closure, non-excess, and moral intelligibility.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in the exemplum’s closure—debt resolution enables spiritual pursuit (tapas), presenting ethical completion as a prerequisite for disciplined life.