
Udyoga Parva, Adhyāya 106: Pūrva-Diśa Praśaṃsā (Praise and Primacy of the Eastern Quarter)
Upa-parva: Gālava–Suparṇa Saṃvāda (Directional Discourse within Udyoga Parva)
Suparṇa states he has been instructed by a deity of unknown origin and asks Gālava to indicate which direction he should first pursue (east, south, west, or north). The response centers on the eastern quarter as ritually and cosmologically primary: it is where the sun rises, where sandhyā-related austerities are situated, and where dharma’s ‘eyes’ and establishment are poetically located. The chapter frames the east as the ‘doorway’ of day and the path along which offerings are understood to spread. It associates the east with primordial events and authoritative transmissions—Vedic chanting, the Sāvitrī, yajus-gifts attributed to the sun, divine ritual consumption (soma), and mythic attainments (e.g., Varuṇa’s prosperity). Additional cataloging links the region to origins and destinies of revered lineages (e.g., Vasiṣṭha) and to a broader metaphysics of auspicious beginnings. The discourse culminates by naming the east as a gateway to the three worlds and to heaven’s felicity, after which Suparṇa reiterates his duty to comply and requests further instruction about other directions.
Chapter Arc: नारद गालव की दारुण दशा का चित्र खींचते हैं—प्रतिज्ञा के बोझ से दबा वह न बैठ पाता है, न सो पाता; चिंता-शोक में गलता हुआ मानो त्वचा और अस्थि मात्र रह गया है। → गालव अपने ही मन से प्रश्न करता है: ‘ऐसे मित्र कहाँ जो धन से पुष्ट हों? आठ सौ चन्द्र-शुभ्र घोड़े कहाँ से आएँ? भोजन में रुचि, सुख में श्रद्धा—सब कट गई; ऐसे जीवन का क्या अर्थ?’ प्रतिज्ञा-भंग का भय उसे भीतर ही भीतर जलाता है, क्योंकि ‘करूँगा’ कहकर न करने वाले की इष्ट-पूर्त नष्ट होती है—यह स्मृति उसे और कठोर बनाती है। → गालव की आत्मग्लानि अपने चरम पर पहुँचती है—निर्धनता और पाप का संबंध, मिथ्यावचन का दाह, और प्रतिज्ञा-पालन की अनिवार्यता एक साथ उसे घेर लेती है; वह विलाप करता है कि प्रतिज्ञा पूरी किए बिना उसका जीवन ही व्यर्थ है। → उसी संकट में गरुड़ का आगमन होता है। वह गालव को ‘सुहृद’ कहकर आश्वस्त करता है और सहायता का वचन देता है—साथ चलने को कहता है, ताकि उसे ऐसे देश तक पहुँचा दे जो पृथ्वी के भीतर/समुद्र के पार है, जहाँ समाधान का मार्ग खुल सकता है। → गरुड़ का प्रस्ताव—‘चलो, विलम्ब न करो; मैं तुम्हें उस पार ले चलूँगा’—यात्रा के रहस्य और आगे मिलने वाले उपाय को अगले अध्याय के लिए छोड़ देता है।
Verse 1
भीकम (2 अमान सप्ताधिकशततमोड< ध्याय: गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना नारद उवाच एवमुक्तस्तदा तेन विश्वामित्रेण धीमता । नास्ते न शेते नाहारं कुरुते गालवस्तदा
নারদ বললেন—হে রাজন! সেই সময় পরম বুদ্ধিমান বিশ্বামিত্র এ কথা বলার পর গালব মুনি তারপর থেকে না বসতেন, না শুতেন, আর না আহার করতেন।
Verse 2
त्वगस्थिभूतो हरिणश्विन्ताशोकपरायण: । शोचमानो>तिमात्र॑ स दहामानश्व मन्युना । गालवो दु:ःखितो दुःखादू विललाप सुयोधन
Nārada said: Absorbed in anxiety and grief, Galava had become as though only skin and bone remained. Overwhelmed by excessive sorrow and burning inwardly with anger, the afflicted sage Galava began to lament in his distress before Suyodhana.
Verse 3
कुत: पुष्टानि मित्राणि कुतोर्डर्था: संचय: कुतः । हयानां चन्द्रशु भ्राणां शतान्यष्टौ कुतो मम
Nārada said: “From where will I obtain friends strengthened by wealth? From where will resources come to me, and from where will there be any store of accumulated riches? And from where, for my sake, will I obtain eight hundred horses, white and radiant like the moon?”
Verse 4
कुतो मे भोज ने श्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे । श्रद्धा मे जीवितस्यापि छिन्ना कि जीवितेन मे
Verse 5
अहं पारे समुद्रस्य पृथिव्या वा परम्परात् गत्वा55त्मानं विमुज्चामि कि फलं जीवितेन मे,“मैं समुद्रके उस पार अथवा पृथ्वीसे बहुत दूर जाकर इस शरीरको त्याग दूँगा। अब मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ है?
Nārada said: “Crossing to the far shore of the ocean—or going far away beyond the bounds of the earth—I will cast off this body. What benefit is there in my continuing to live?”
Verse 6
अधनस्याकृतार्थस्य त्यक्तस्य विविधै: फलै: । ऋणं धारयमाणस्य कुत: सुखमनीहया
Nārada said: “For one who is poor, whose aims have not been fulfilled, who has been deprived of the many fruits of meritorious deeds, and who is merely carrying the burden of debt—how could there be any happiness in sustaining life without effort?”
Verse 7
सुह्ृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणयमीप्सितम् । प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम्
যে ব্যক্তি ইচ্ছামতো স্নেহবন্ধন স্থাপন করে সুহৃদদের ধন ভোগ করেও তাদের উপকারের প্রতিদান দিতে অক্ষম, তার পক্ষে এমন জীবনের চেয়ে মৃত্যু শ্রেয়।
Verse 8
प्रतिश्रुत्य करिष्येति कर्तव्यं तदकुर्वत: । मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्त प्रणश्यति
যে ব্যক্তি ‘করব’ বলে কোনো কর্তব্য সম্পন্ন করার প্রতিশ্রুতি দিয়ে পরে তা পালন করে না, মিথ্যাবচনে দগ্ধ সেই মানুষের ইষ্ট ও আপূর্ত—উভয়ই বিনষ্ট হয়।
Verse 9
न रूपमनृतस्यास्ति नानृतस्यास्ति संतति: । नानृतस्याधिपत्यं च कुत एव गति: शुभा
অসত্যের কোনো সত্য রূপ বা প্রতিষ্ঠা নেই; অসত্য থেকে সন্ততি জন্মায় না। মিথ্যাবাদীর অধিপত্যও স্থায়ী হয় না—তবে তার শুভ গতি কোথা থেকে আসবে?
Verse 10
कुतः कृतघ्नस्य यश: कुतः स्थान कुत: सुखम् | अश्रद्धेय: कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृति:
কৃতঘ্ন মানুষের সুযশ কোথায়, মর্যাদা-প্রতিষ্ঠা কোথায়, আর সুখই বা কোথায়? কৃতঘ্ন তো অবিশ্বাস্য; কৃতঘ্নের জন্য কোনো নিষ্কৃতি—কোনো সত্য মুক্তি—নেই।
Verse 11
न जीवत्यधन: पाप: कुतः पापस्य तन्त्रणम् | पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशयन् कृतम्
ধনহীন পাপী সত্যার্থে বাঁচে না; পাপী মানুষ পরিবার-পরিজনকে কীভাবে পালন করবে? যে পাপী নিজের অর্জিত পুণ্য নষ্ট করে, সে অবশ্যম্ভাবীভাবে নিজেও বিনাশ লাভ করে।
Verse 12
सो<हं पाप: कृतघ्नश्न कृपणश्चानृतोडपि च | गुरोर्य: कृतकार्य: संस्तत् करोमि न भाषितम्
নারদ বললেন—“আমি পাপী—কৃতঘ্ন, কৃপণ, এবং মিথ্যাভাষীও। গুরুর দ্বারা নিজের কাজ সিদ্ধ করালাম, তবু তাঁকে যে প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলাম, তা পালন করতে পারছি না।”
Verse 13
सो हं प्राणान् विमोक्ष्यामि कृत्वा यत्नमनुत्तमम् | अर्थिता न मया काचित् कृतपूर्वा दिवौकसाम् | मानयन्ति च मां सर्वे त्रिदशा यज्ञसंस्तरे
নারদ বললেন—“অতএব আমি সর্বোত্তম চেষ্টা করে প্রাণত্যাগ করব। আজ পর্যন্ত দেবতাদের কাছে আমি কখনও কোনো প্রার্থনা করিনি; তবু যজ্ঞভূমিতে সকল ত্রিদশ আমাকে সম্মান করে।”
Verse 14
अहं तु विबुधश्रेष्ठं देवं त्रिभुवनेश्वरम् । विष्णुं गच्छाम्यहं कृष्णं गतिं गतिमतां वरम्
নারদ বললেন—“এখন আমি দেবশ্রেষ্ঠ, ত্রিভুবনেশ্বর, এবং সাধকদের পরম গতি—ভগবান বিষ্ণু, শ্রীকৃষ্ণের শরণে যাই।”
Verse 15
भोगा यस्मात् प्रतिष्ठन्ते व्याप्य सर्वान् सुरासुरान् । प्रणतो द्रष्टमिच्छामि कृष्णं योगिनमव्ययम्
নারদ বললেন—“যাঁর থেকে দেব ও অসুর—সকলের মধ্যে ব্যাপ্ত হয়ে ভোগসমূহের প্রাপ্তি হয়, সেই অবিনশ্বর যোগী শ্রীকৃষ্ণকে আমি প্রণত হয়ে দর্শন করতে চাই।”
Verse 16
एवमुक्ते सखा तस्य गरुडो विनतात्मज: । दर्शयामास त॑ प्राह संदहृष्ट: प्रियकाम्यया
এ কথা বলতেই তাঁর সখা—বিনতার নন্দন গরুড়—অত্যন্ত আনন্দিত হয়ে, তাঁর প্রিয় সাধনের ইচ্ছায়, প্রকাশিত হলেন এবং বললেন—
Verse 17
सुहृद् भवान् मम मतः सुहृदां च मत: सुहृत् । ईप्सितेनाभिलाषेण योक्तव्यो विभवे सति
নারদ বললেন— “গালব! তুমি আমার প্রিয় সুহৃদ, আর আমার সুহৃদদের কাছেও তুমি প্রিয় সুহৃদ। সুহৃদদের এটাই ধর্ম—যখন কারও কাছে ঐশ্বর্য ও সামর্থ্য থাকে, তখন তা দিয়ে বন্ধুজনের অভীষ্ট কামনা ও অভিপ্রায় পূর্ণ করা উচিত।”
Verse 18
विभवश्चास्ति मे विप्र वासवावरजो द्विज । पूर्वमुक्तस्त्वदर्थ च कृत: कामश्न तेन मे
“ব্রাহ্মণ! আমার কাছে বৈভবও আছে। ইন্দ্রের কনিষ্ঠ ভ্রাতা ভগবান বিষ্ণুই আমার সর্বশ্রেষ্ঠ বৈভব। পূর্বে তোমার জন্য আমি তাঁর কাছে প্রার্থনা করেছিলাম; তিনি আমার প্রার্থনা গ্রহণ করে আমার মনোরথ পূর্ণ করেছিলেন।”
Verse 19
स भवानेतु गच्छाव नयिष्ये त्वां यथासुखम् । देशं पारं पृथिव्या वा गच्छ गालव मा चिरम्
নারদ বললেন— “তবে এসো, চলি। তোমার ইচ্ছামতো আমি তোমাকে সুখে নিয়ে যাব—যে দেশই তুমি চাও, পৃথিবীর শেষ প্রান্ত পর্যন্তও। গালব! চলো, বিলম্ব কোরো না।”
Verse 106
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে গালব-চরিত বিষয়ক একশো ছয় নম্বর অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 107
“अत: आओ' हम दोनों चलें। गालव! मैं तुम्हें सुखपूर्वक ऐसे देशमें पहुँचा दूँगा, जो पृथ्वीके अन्तर्गत तथा समुद्रके उस पार है। चलो, विलम्ब न करो” ।।
নারদ বললেন— “অতএব এসো, আমরা দু’জনেই চলি। গালব! আমি তোমাকে সুখে এমন এক দেশে পৌঁছে দেব, যা পৃথিবীর অন্তর্গত এবং সমুদ্রের ওপারেও। চলো, বিলম্ব কোরো না।” এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে গালবচরিতের একশো সাত নম্বর অধ্যায়।
The dilemma is one of right action under instruction: Suparṇa must choose a direction to travel, but seeks a dharma-aligned criterion for priority rather than relying on personal preference.
The chapter teaches that correct action is coordinated with cosmic and ritual order—beginnings are ideally aligned with the east as a symbol of emergence, clarity, and normative precedence.
No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; instead, the text implies benefit through symbolic claims that the east functions as a ‘gateway’ to well-being (svarga/sukha) and orderly conduct.