Gandhārī’s Lament for Bhūriśravas and Śakuni
Book 11, Chapter 24
पहले सोनेके डंडोंसे विभूषित दो-दो व्यजनोंद्वारा जिसको हवा की जाती थी, वही शकुनि आज धरतीपर सो रहा है और पक्षी अपनी पाँखोंसे इसको हवा करते हैं ।। यः स्वरूपाणि कुरुते शतशो5थ सहस्रश: । तस्य मायाविनो माया दग्धा: पाण्डवतेजसा,जो अपने सैकड़ों और हजारों रूप बना लिया करता था, उस मायावीकी सारी मायाएँ पाण्डुपुत्र सहदेवके तेजसे दग्ध हो गयीं
pūrvam suvarṇa-daṇḍaiḥ vibhūṣitaiḥ dvi-dvi-vyajanaiḥ yasya vāyur dīyate sma, sa eva śakuniḥ adya pṛthivyāṃ suptaḥ; pakṣiṇaś ca asya pakṣaiḥ enam vāyayanti. yaḥ svarūpāṇi kurute śataśo 'tha sahasraśaḥ, tasya māyāvinaḥ māyāḥ dagdhāḥ pāṇḍava-tejasā (sahadevena).
যাকে আগে সোনার দণ্ডে শোভিত জোড়া জোড়া চামর দিয়ে বাতাস করা হতো, সেই শকুনি আজ মাটিতে পড়ে আছে, আর পাখিরা তাদের ডানায় তাকে হাওয়া দিচ্ছে। যে শত শত, সহস্র সহস্র রূপ ধারণ করত, সেই মায়াবীর সব মায়াই পাণ্ডব সহদেবের তেজে দগ্ধ হয়ে গেল।
वैशम्पायन उवाच