Mahabharata Adhyaya 15
Stree ParvaAdhyaya 1547 Versesयुद्ध समाप्त; अब विजय नहीं, शोक और उत्तरदायित्व का लेखा-जोखा चल रहा है।

Adhyaya 15

स्त्रीपर्व — अध्याय १५: गान्धारी-युधिष्ठिर-संवादः (Gandhārī’s Confrontation and Consolation of Yudhiṣṭhira)

Upa-parva: Gāndhārī-Śoka–Yudhiṣṭhira-Sāntvana (episode within Strī Parva)

Vaiśaṃpāyana narrates Gandhārī’s charged inquiry—“Where is the king?”—as she is afflicted by the deaths of her descendants. Yudhiṣṭhira approaches trembling with folded hands and adopts a posture of radical self-blame, naming himself a ‘son-slayer’ and inviting condemnation, even a curse, while declaring disinterest in life, sovereignty, or wealth after killing his own relations. Gandhārī initially responds with silence and heavy sighing; as Yudhiṣṭhira bows toward her feet, she partially perceives him through the edge of her blindfold, noting his toes and nails, while Arjuna remains positioned behind Vāsudeva. The emotional field shifts: Gandhārī’s anger dissipates and she consoles the gathered men ‘like a mother.’ The narrative then pivots to Kuntī (Pṛthā) and the survivors approaching their mother; Kuntī weeps upon seeing her sons wounded by weapon strikes and grieves each in turn. Draupadī, bereft of her sons, laments the absence of the grandsons and questions the value of kingship without children. Kuntī comforts and raises Draupadī, and together they approach Gandhārī. Gandhārī addresses Draupadī as ‘daughter,’ urging her not to grieve alone and articulates a causal reading: the devastation appears driven by time’s cycle and inevitability, recalling Vidura’s earlier counsel, and asserting that those who died in battle are not to be mourned in the conventional sense—while also accepting personal fault for the destruction of her lineage.

Chapter Arc: रण-धूल अभी बैठी नहीं है; शोक की अग्नि में घिरी गान्धारी के सामने भीमसेन आता है—विजय का नहीं, अपराध-बोध का भार लेकर। → भीम अपने कर्म का उत्तरदायित्व स्वीकारते हुए कहता है कि भय, आत्म-रक्षा और दुर्योधन की असाधारण शक्ति ने उसे ‘विषम आचरण’ की ओर ढकेला; वह गान्धारी से क्षमा माँगता है और तर्क देता है कि धर्म्य युद्ध से दुर्योधन को कोई उठा नहीं सकता था। गान्धारी का मातृ-शोक, क्रोध और नैतिक प्रतिवाद भीतर-भीतर उफनता है; उधर द्रौपदी अपने हृतात्मजों के लिए विलाप करती हुई भूमि पर गिरती है, और स्त्रियों का करुण-कोलाहल सभा-सा बन जाता है। → गान्धारी का उत्तर—भीम की प्रशंसा-भरी सफाई को वह स्वीकार नहीं करती; वह संकेत देती है कि ‘तुमने जो कहा’ वह स्वयं एक प्रकार का अपराध-स्वीकार है। इसी करुण-उत्कर्ष में द्रौपदी का विलाप चरम पर पहुँचता है; कुन्ती स्वयं ‘आर्ततरा’ होकर आती है और द्रौपदी को उठाकर धैर्य देती है, मानो शोक का भार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर उतर रहा हो। → गान्धारी का क्रोध क्रमशः शान्त होता है; वह मातृवत् सान्त्वना देने लगती है। कृष्ण के समझाने/अनुनय का प्रभाव सीमित रहता है, फिर भी गान्धारी द्रौपदी और कुन्ती से कहती है कि शोक में डूबकर स्वयं को नष्ट न करें—यह काल-पर्याय से प्रेरित लोक-विनाश का चक्र है। → गान्धारी का क्रोध तो थमता है, पर उसके भीतर का न्याय-बोध और शाप-सम्भावना पूरी तरह बुझती नहीं—आगे यह देखना शेष है कि वह इस विनाश के लिए किसे उत्तरदायी ठहराती है और किस प्रकार का दैवी/नैतिक प्रतिकार उठता है।

Shlokas

Verse 1

अपना छा | अफ्--#क+ पजञ्चदशो< ध्याय: भीमसेनका गान्धारीको अपनी सफाई देते हुए उनसे क्षमा माँगना

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! গান্ধারীর সেই বাক্য শুনে ভীমসেন ভীতপ্রায় হয়ে, বিনয় ও অনুনয়ে ভরা কথায় তখন তাঁকে এইভাবে উত্তর দিল।

Verse 2

अधर्मो यदि वा धर्मस्त्रासात्‌ तत्र मया कृत: । आत्मानं त्रातुकामेन तन्मे त्वं क्षन्तुमहसि

“মাতা! সেখানে আমি যা করেছি তা অধর্ম হোক বা ধর্ম—ভয়ে, কেবল নিজের প্রাণ বাঁচাতে চেয়ে আমি তা করেছি; অতএব আমার সেই অপরাধ আপনি ক্ষমা করুন।”

Verse 3

न हि युद्धेन पुत्रस्ते धर्म्येण स महाबल: । शक्‍य: केनचिदुद्यन्तुमतो विषममाचरम्‌,“आपके उस महाबली पुत्रको कोई भी धर्मानुकूल युद्ध करके मारनेका साहस नहीं कर सकता था; अतः मैंने विषमतापूर्ण बर्ताव किया

“আপনার সেই মহাবলী পুত্রকে ধর্মসম্মত নিয়মবদ্ধ যুদ্ধে কেউই পরাস্ত করতে পারত না; তাই আমি বিষম—অর্থাৎ অনুচিত—পথ অবলম্বন করেছি।”

Verse 4

अधर्मेण जित: पूर्व तेन चापि युधिष्ठिर: । निकृताश्न सदेव सम ततो विषममाचरम्‌

“আগে সে অধর্মের দ্বারা যুধিষ্ঠিরকে জয় করেছিল এবং আমাদের সঙ্গে সর্বদাই ছলনা করত; তাই আমিও তার প্রতি বিষম ও কঠোর আচরণ করেছি।”

Verse 5

सैन्यस्यैको5वशिष्टो5यं गदायुद्धेन वीर्यवान्‌ । मां हत्वा न हरेद्‌ राज्यमिति वै तत्‌ कृतं मया

বৈশম্পায়ন বললেন—সেনার মধ্যে এই একটিই বীর অবশিষ্ট ছিল, গদাযুদ্ধে অতি প্রবল। আমাকে বধ করে সে যেন আবার রাজ্য কেড়ে না নেয়—এই আশঙ্কায় আমি সেই কাজ করেছিলাম।

Verse 6

राजपुत्रीं च पाउ्चालीमेकवस्त्रां रजस्वलाम्‌ । भवत्या विदितं सर्वमुक्तवान्‌ यत्‌ सुतस्तव

বৈশম্পায়ন বললেন—আর পাঞ্চালরাজকন্যা দ্রৌপদী, যিনি একখানি বস্ত্র পরিহিতা ও ঋতুমতী অবস্থায় ছিলেন—তাঁকে উদ্দেশ করে তোমার পুত্র যা যা বলেছিল, সে সবই তোমার জানা।

Verse 7

सुयोधनमसंगृहा[ न शक्‍्या भू: ससागरा | केवला भोक्तुमस्माभिरतश्वैतत्‌ कृतं मया,“दुर्योधनका संहार किये बिना हमलोग निष्कण्टक पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकते थे, इसलिये मैंने यह अयोग्य कार्य किया

বৈশম্পায়ন বললেন—সুযোধন (দুর্যোধন)কে বিনাশ না করলে, সাগরবেষ্টিত এই পৃথিবীকে আমরা নির্বিঘ্নে ভোগ করতে পারতাম না। তাই আমি এই কাজ করেছি।

Verse 8

तथाप्यप्रियमस्माकं पुत्रस्ते समुपाचरत्‌ । द्रौपद्या यत्‌ सभामध्ये सव्यमूरुमदर्शयत्‌,“आपके पुत्रने तो हम सब लोगोंका इससे भी बढ़कर अप्रिय किया था कि उसने भरी सभामें द्रौपदीको अपनी बाँयीं जाँच दिखायी

বৈশম্পায়ন বললেন—তবু তোমার পুত্র আমাদের প্রতি আরও গুরুতর অপমান করেছিল: ভরা সভার মধ্যে সে দ্রৌপদীকে নিজের বাঁ দিকের উরু প্রদর্শন করেছিল।

Verse 9

तदैव वध्य: सोअस्माकं दुराचारश्न ते सुतः । धर्मराजाज्ञया चैव स्थिता: सम समये तदा

বৈশম্পায়ন বললেন—সেই সময়েই তোমার দুশ্চরিত্র পুত্রকে আমাদের বধ করা উচিত ছিল। কিন্তু ধর্মরাজের আদেশে আমরা তখন নির্ধারিত সময়ের নিয়মে আবদ্ধ থেকে সংযত ছিলাম।

Verse 10

वैरमुद्दीपितं राज्ञि पुत्रेण तव तन्‍्महत्‌ । क्लेशिताश्न वने नित्यं तत एतत्‌ कृतं मया

বৈশম্পায়ন বললেন—রানি! তোমার পুত্র সেই মহাবৈরকে আরও উসকে দিয়ে অগ্নির মতো প্রজ্বলিত করেছে। আমাদের বনবাসে পাঠিয়ে সে নিত্য ক্লেশ দিয়েছে; তাই আমি এভাবে কাজ করেছি।

Verse 11

वैरस्यास्य गताः पार हत्वा दुर्योधन रणे । राज्यं युधिष्िर: प्राप्तो वयं च गतमन्यव:

বৈশম্পায়ন বললেন—রণক্ষেত্রে দুর্যোধনকে বধ করে আমরা এই বৈর পার হয়ে গেছি। যুধিষ্ঠির রাজ্য লাভ করেছেন, আর আমাদের ক্রোধও প্রশমিত হয়েছে।

Verse 12

गान्धायुवाच न तस्यैष वधस्तात यत्‌ प्रशंससि मे सुतम्‌ । कृतवांश्षापि तत्‌ सर्व यदिदं भाषसे मयि

গান্ধারী বললেন—বৎস! তুমি আমার পুত্রের এত প্রশংসা করছ, তাই একে তোমার কথামতো ‘মৃত্যু’ বলা যায় না; যশের দ্বারা সে যেন স্থায়ী। আর তুমি আমার সামনে যা বলছ, সে সমস্ত অপরাধই নিঃসন্দেহে দুর্যোধনই করেছে।

Verse 13

हताश्वे नकुले यत्तु वृषसेनेन भारत । अपिब: शोणितं संख्ये द:ःशासनशरीरजम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! আর সেই কর্ম—যখন নকুলের অশ্বগুলি নিহত হয়েছিল, তখন রণমধ্যে বৃষসেন দুঃশাসনের দেহ থেকে নির্গত রক্ত পান করেছিল।

Verse 14

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें गान्धारीकी सान्त्वनगाविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ,सद्धिविरगर्हितं घोरमनार्यजनसेवितम्‌ । क्रूर कर्माकृथास्तस्मात्तदयुक्तं वृकोदर

সে কর্ম ছিল ভয়ংকর—বুদ্ধিমান ও বৈরাগ্যবানদের নিন্দিত, আর অনার্যদের সঙ্গেরই যোগ্য। অতএব, হে বৃকোদর! তোমার এমন নিষ্ঠুর কাজ করা উচিত ছিল না; তা অনুচিত।

Verse 15

भारत! परंतु वृषसेनने जब नकुलके घोड़ोंको मारकर उसे रथहीन कर दिया था, उस समय तुमने युद्धमें दःशासनको मारकर जो उसका खून पी लिया, वह सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित और नीच पुरुषोंद्वारा सेवित घोर क्रूरतापूर्ण कर्म है। वृकोदर! तुमने वही क्रूर कार्य किया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा अत्यन्त अयोग्य कर्म बन गया है ।।

ভীমসেন বললেন—মা! অন্যের রক্তও পান করা উচিত নয়; তবে নিজের রক্ত কে পান করতে পারে? যেমন নিজের আত্মা, তেমনই ভ্রাতা; নিজের ও ভ্রাতার মধ্যে কোনো প্রকৃত ভেদ নেই।

Verse 16

रुधिरं न व्यतिक्रामद्‌ दन्तोष्ठं मे5म्ब मा शुचः । वैवस्वतस्तु तद्‌ वेद हस्तौ मे रुधिरोक्षिती

মা! শোক কোরো না। সেই রক্ত আমার দাঁত ও ঠোঁট অতিক্রম করে এগোয়নি। সূর্যপুত্র বৈবস্বত যম জানেন—শুধু আমার দুই হাতই রক্তে রঞ্জিত ছিল।

Verse 17

हताश्चं नकुलं दृष्टवा वृषसेनेन संयुगे । 8 | सम्प्रह्ष्टानां त्रास: संजनितो मया

যুদ্ধে বৃষসেনের হাতে নকুলকে বিপন্ন দেখে যে শত্রুরা আনন্দে উল্লসিত হয়েছিল, তাদের মনে আমি পাল্টা সেইভাবেই কেবল ভয় সঞ্চার করেছিলাম—তাদেরকে আতঙ্কের স্বাদ চাখিয়েছিলাম।

Verse 18

केशपक्षपरामर्शे द्रौपद्या द्यूतकारिते | क्रोधाद्‌ यदब्रवं चाहं तच्च मे हृदि वर्तते

দ্যূতসভায় দ্রৌপদীর কেশ টেনে ধরার সেই অপমানে ক্রোধে আমি যে প্রতিজ্ঞা উচ্চারণ করেছিলাম, সেই বাক্যই আমার হৃদয়ে চিরকাল স্থির হয়ে ছিল।

Verse 19

क्षत्रधर्माच्च्युतो राज्ञि भवेयं शाश्वती: समा: । प्रतिज्ञां तामनिस्तीर्य ततस्तत्‌ कृतवानहम्‌

রানী! যদি আমি সেই প্রতিজ্ঞা পূর্ণ না করতাম, তবে অনন্তকাল ক্ষত্রিয়ধর্ম থেকে বিচ্যুত হতাম। তাই আমি সেই কর্ম করেছি।

Verse 20

न मामहसि गान्धारि दोषेण परिशड्कितुम्‌ । अनिगृहा पुरा पुत्रानस्मास्वनपकारिषु । अधुना कि नु दोषेण परिशड्कितुमरहसि

ভীমসেন বললেন—মাতা গান্ধারী! আমার মধ্যে দোষের সন্দেহ করা আপনার উচিত নয়। পূর্বে আমরা কোনো অপকার করিনি, তবু আপনার পুত্ররা আমাদের উপর যে অত্যাচার করেছিল, আপনি তাদের নিবৃত্ত করেননি। তবে এখন কোন দোষে আমাকে সন্দেহ করা ন্যায়সঙ্গত মনে করছেন?

Verse 21

गान्धायुवाच वृद्धस्यास्य शतं पुत्रान्‌ निध्नंस्त्वमपराजित: । कस्मान्नाशेषय: कंचिद्‌ येनाल्पमराधितम्‌

গান্ধারী বললেন—বৎস! তুমি অপরাজিত বীর। এই বৃদ্ধ রাজার শত পুত্রকে বধ করতে গিয়ে, যার অপরাধ অতি সামান্য ছিল, এমন একজনকেও কেন তুমি বাঁচিয়ে রাখলে না?

Verse 22

संतानमावयोस्तात वृद्धयोहतराज्ययो: । कथमन्धद्वयस्यास्य यष्टिरेका न वर्जिता

গান্ধারী বললেন—বৎস! আমরা দুজনেই বৃদ্ধ হয়েছি, আমাদের রাজ্যও হরণ হয়েছে। এমন অবস্থায় আমাদের একমাত্র সন্তানকে—দুই অন্ধের একটিমাত্র লাঠির মতো আশ্রয়কে—তুমি কেন বাঁচালে না?

Verse 23

शेषे हवस्थिते तात पुत्राणामन्तके त्वयि । न मे दुःखं भवेदेतद्‌ यदि त्वं धर्ममाचरे:

গান্ধারী বললেন—বৎস! তুমি আমার পুত্রদের জন্য যেন যমরাজ হয়ে উঠেছ। তুমি যদি ধর্ম অনুসারে আচরণ করতে এবং আমার এক পুত্রও যদি বেঁচে থাকত, তবে এই শোক আমার কাছে এত অসহনীয় হতো না।

Verse 24

वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍्त्वा तु गान्धारी युधिष्ठिरमपृच्छत । क्व स राजेति सक्रोधा पुत्रपौत्रवधार्दिता

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! ভীমসেনকে এ কথা বলে, পুত্র-পৌত্রবধের শোকে দগ্ধ ও ক্রোধে উত্তপ্ত গান্ধারী যুধিষ্ঠিরকে জিজ্ঞাসা করলেন—“সেই রাজা যুধিষ্ঠির কোথায়?”

Verse 25

तमभ्यगच्छद्‌ राजेन्द्रो वेपमान: कृताज्जलि: । युधिष्ठिरस्त्विदं तत्र मधुरं वाक्यमब्रवीत्‌

তখন রাজাধিরাজ যুধিষ্ঠির কাঁপতে কাঁপতে, করজোড় করে তাঁর কাছে এগিয়ে গেলেন। সেখানে তিনি মধুর ও বিনীত কণ্ঠে বললেন—“দেবি! আপনার পুত্রবধের নিষ্ঠুর কর্মী যুধিষ্ঠির আমি। পৃথিবীর রাজাদের বিনাশের কারণও আমি; অতএব আমি শাপযোগ্য। আপনি আমাকে শাপ দিন।”

Verse 26

पुत्रहन्ता नृशंसो5हं तव देवि युधिष्ठिर: । शापा्ह: पृथिवीनाशे हेतुभूत: शपस्व माम्‌

“দেবি! আপনার পুত্রদের হত্যাকারী, নিষ্ঠুর যুধিষ্ঠির আমি। পৃথিবীর বিনাশে কারণ হয়ে আমি শাপযোগ্য হয়েছি; আমাকে শাপ দিন।”

Verse 27

नहि मे जीवितेनार्थो न राज्येन धनेन वा । तादृशान्‌ सुहृदो हत्वा मूढस्यास्य सुहृदद्गुह:

“এখন আমার কাছে জীবনেরও মূল্য নেই, রাজ্যেরও নয়, ধনেরও নয়। এমন মহৎ সুহৃদদের বধ করে আমি মূঢ়, নিজেরই সুহৃদদের প্রতি বিশ্বাসঘাতক হয়ে দাঁড়িয়েছি।”

Verse 28

तमेवंवादिनं भीतं संनिकर्षगतं तदा । नोवाच किंचिद्‌ गान्धारी निःश्वासपरमा भूशम्‌

ভীত যুধিষ্ঠির কাছে এসে এভাবে বললে, গন্ধারী দেবী গভীর দীর্ঘশ্বাস ফেলতে লাগলেন; শোকে তিনি সোব করতে লাগলেন, কিন্তু মুখে কোনো কথা উঠল না।

Verse 29

तस्यावनतदेहस्य पादयोर्निपतिष्यत: । युधिष्ठिरस्य नृपतेर्धर्मज्ञा दीर्घदर्शिनी

রাজা যুধিষ্ঠির দেহ নত করে গন্ধারীর চরণে লুটিয়ে পড়তে উদ্যত হলেন। তখন ধর্মজ্ঞা, দূরদর্শিনী গন্ধারী চোখের বাঁধনের আড়াল দিয়েই তাঁর পায়ের আঙুলের অগ্রভাগ দেখে ফেললেন। সেই মাত্র দৃষ্টিতেই রাজার নখ কালো হয়ে গেল—যা আগে ছিল অত্যন্ত সুন্দর ও মনোহর।

Verse 30

अंगुल्यग्राणि ददृशे देवी पट्टान्तरेण सा । ततः स कुनखी भूतो दर्शनीयनखो नृप:

বৈশম্পায়ন বললেন—অন্ধপট্টির ফাঁক দিয়ে দেবী গান্ধারী তাঁর পায়ের আঙুলের অগ্রভাগ দেখে ফেললেন। সেই মুহূর্তেই রাজা যুধিষ্ঠির—যাঁর নখ আগে ছিল মনোহর ও দর্শনীয়—বিবর্ণ ও কলুষিত নখবিশিষ্ট হয়ে উঠলেন।

Verse 31

त॑ दृष्टवा चार्जुनोडगच्छद्‌ वासुदेवस्य पृष्ठत: । एवं संचेष्टमानांस्तानितश्षैतक्ष भारत

তাঁকে এভাবে দেখে অর্জুন উঠে বাসুদেব (কৃষ্ণ)-এর পেছনে গিয়ে দাঁড়াল। হে ভারত, তারা এভাবে নড়াচড়া ও অবস্থান বদল করতে থাকলে, ওদিক থেকে শৌনক (শৈতক্ষ) তাদের লক্ষ্য করে দেখছিল।

Verse 32

तया ते समनुज्ञाता मातरं वीरमातरम्‌

তাঁর (গান্ধারীর) অনুমতিতে তারা বীরজননী মাতার কাছে যাওয়ার অনুমোদন পেল।

Verse 33

अभ्यगच्छन्त सहिता: पृथां पृथुलवक्षस: । फिर उनकी आज्ञा ले चौड़ी छातीवाले सभी पाण्डव एक साथ वीरजननी माता कुन्तीके पास गये ।। चिरस्य दृष्टवा पुत्रान्‌ सा पुत्राधिभिरभिप्लुता

তার অনুমতি নিয়ে প্রশস্তবক্ষ সকল পাণ্ডব একসঙ্গে পৃথা (কুন্তী)-র কাছে গেল। বহুদিন পরে পুত্রদের দেখে তিনি মাতৃস্নেহে আপ্লুত হয়ে উঠলেন।

Verse 34

बाष्पमाहारयद्‌ देवी वस्त्रेणावृत्य वै मुखम्‌ । कुन्तीदेवी दीर्घकालके बाद अपने पुत्रोंकी देखकर उनके कष्टोंका स्मरण करके करुणामें डूब गयीं और अंचलसे मुँह ढककर आँसू बहाने लगीं ।।

দেবী বস্ত্র দিয়ে মুখ ঢেকে অশ্রু ঝরালেন। তারপর অশ্রু বিসর্জন দিয়ে পৃথা (কুন্তী) সেই সময় পুত্রদের সঙ্গে এগিয়ে গেলেন।

Verse 35

अपश्यदेतान्‌ शस्त्रौचैर्बहुधा क्षतविक्षतान्‌ | पुत्रोंसहित आँसू बहाकर उन्होंने उनके शरीरोंपर बारंबार दृष्टिपात किया। वे सभी अस्त्र-शस्त्रोंकी चोटसे घायल हो रहे थे ।।

বৈশম্পায়ন বললেন—সে তার পুত্রদের দেখল, যারা অস্ত্রশস্ত্রের আঘাতে নানাভাবে ক্ষতবিক্ষত ও আহত। অশ্রু ঝরাতে ঝরাতে সে তাদের দেহের উপর বারবার দৃষ্টি ফেলল; সকলেই অস্ত্রশস্ত্রের আঘাতে কাতর হয়ে পড়েছিল। সে একে একে পুত্রদের বারবার স্পর্শ করছিল।

Verse 36

अन्वशोचत दुःखार्ता द्रौपदी च हृतात्मजाम्‌ | रुदतीमथ पाज्चालीं ददर्श पतितां भुवि

দুঃখে আচ্ছন্ন দ্রৌপদী সেই জননীর জন্য শোক করতে লাগল, যার পুত্ররা নিঃশেষ হয়েছে। তারপর সে পাঞ্চালীকে দেখল—কাঁদতে কাঁদতে সে ভূমিতে লুটিয়ে পড়েছিল।

Verse 37

बारी-बारीसे पुत्रोंके शरीरपर बारंबार हाथ फेरती हुई कुन्ती दुःखसे आतुर हो उस द्रौपदीके लिये शोक करने लगीं, जिसके सभी पुत्र मारे गये थे। इतनेमें ही उन्होंने देखा कि द्रौपदी पास ही पृथ्वीपर गिरकर रो रही है ।।

কুন্তী বারবার পুত্রদের দেহে হাত বুলিয়ে দুঃখে ব্যাকুল হয়ে, যার সকল পুত্র নিহত হয়েছে সেই দ্রৌপদীর জন্য শোক করতে লাগলেন। তখনই তিনি দেখলেন, দ্রৌপদী কাছে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ে কাঁদছে। দ্রৌপদী বলল—“আর্যে! সৌভদ্রসহ আপনার সকল পৌত্র কোথায় গেল? এতদিন পরে আজ আপনাকে—তপস্বিনী দেবীকে—দেখেও তারা কেন আপনার কাছে আসে না?”

Verse 38

कि नु राज्येन वै कार्य विहीनाया: सुतैर्मम । द्रौपदी बोली--आर्ये! अभिमन्युसहित वे आपके सभी पौत्र कहाँ चले गये? वे दीर्घकालके बाद आयी हुई आज आप तपस्विनी देवीको देखकर आपके निकट क्‍यों नहीं आ रहे हैं? अपने पुत्रोंसे हीन होकर अब इस राज्यसे हमें क्या कार्य है? || ३७ ई ।।

দ্রৌপদী বলল—“পুত্রহীন হয়ে আমাদের এই রাজ্য দিয়ে আর কী কাজ? আর্যে! অভিমন্যুসহ আপনার সকল পৌত্র কোথায় গেল? বহুদিন পরে আজ আপনাকে—তপস্বিনী দেবীকে—দেখেও তারা কেন আপনার কাছে আসে না?” তখন প্রশস্তনয়না পৃথা (কুন্তী) কাঁদতে থাকা, শোকে ক্ষীণ দ্রৌপদীকে তুলে সান্ত্বনা দিলেন; এবং নিজেও অতিশয় আর্ত হয়ে শোকাকুল গান্ধারীর কাছে গেলেন।

Verse 39

उत्थाप्य याज्ञसेनीं तु रुदतीं शोककर्शिताम्‌ । तयैव सहिता चापि पुत्रैरनुगता नृप

বৈশম্পায়ন বললেন—কাঁদতে থাকা ও শোকে ক্ষীণ যাজ্ঞসেনীকে (দ্রৌপদীকে) তুলে রাজা তার সঙ্গেই অগ্রসর হলেন; আর তার পুত্ররাও পেছনে পেছনে চলল।

Verse 40

वैशम्पायन उवाच तामुवाचाथ गान्धारी सह वध्वा यशस्विनीम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন গান্ধারী পুত্রবধূসহ সেই যশস্বিনী নারীকে বললেন—“মা, এভাবে শোকে ভেঙে পড়ো না। দেখো, আমিও তো দুঃখে নিমজ্জিত। আমি মনে করি, কালের চক্রের উলট-পালটে প্ররোচিত হয়ে এই সমগ্র জগতের বিনাশ ঘটেছে—স্বভাবতই তা রোমহর্ষক। এ বিপর্যয় অবশ্যম্ভাবী ছিল, তাই ঘটেছে। সন্ধি স্থাপনের জন্য শ্রীকৃষ্ণের অনুনয়-বিনয় যখন সফল হল না, তখন পরম জ্ঞানী বিদুর যে গুরুগম্ভীর কথা বলেছিলেন, ঠিক সেই অনুসারেই সবকিছু প্রকাশ পেল।”

Verse 41

मैवं पुत्रीति शोकार्ता पश्य मामपि दु:खिताम्‌ । मन्ये लोकविनाशो<यं कालपर्यायनोदित:

“মা, ‘পুত্র!’ বলে শোকে কাতর হয়ো না। আমাকেও দেখো—আমিও দুঃখিত। আমি মনে করি, এই লোকবিনাশ কালের চক্রের পরিবর্তন থেকেই উদ্ভূত।”

Verse 42

अवश्यभावी सम्प्राप्त: स्वभावाल्लोमहर्षण: । इदं तत्‌ समनुप्राप्तं विदुरस्य वचो महत्‌

“যা অনিবার্য ছিল, তাই এসে পৌঁছেছে; স্বভাবতই তা রোমহর্ষক। বিদুরের মহৎ বচন অনুসারেই এই পরিণতি উপস্থিত হয়েছে।”

Verse 43

तस्मिन्नपरिहार्येर्थे व्यतीते च विशेषत:

“যখন সেই অনিবার্য বিপর্যয় কোনোভাবেই এড়ানো যায়নি—আর বিশেষত এখন, যখন সবই ঘটে শেষ হয়ে গেছে—তখন তোমার আর শোক করা উচিত নয়।”

Verse 44

मा शुचो न हि शोच्यास्ते संग्रामे निधनं गता: । यथैवाहं तथैव त्वं को नावाश्वासयिष्यति । ममैव हापराधेन कुलमग्रयं विनाशितम्‌

“শোক কোরো না। তারা শোকের যোগ্য নয়, কারণ তারা যুদ্ধে প্রাণ দিয়েছে। আজ আমি যেমন, তুমিও তেমন—তবে কে আমাদের সান্ত্বনা দেবে? হায়, আমারই অপরাধে এই শ্রেষ্ঠ বংশ ধ্বংস হয়েছে।”

Verse 313

गान्धारी विगतक्रोधा सान्त्वयामास मातृवत्‌ | उनकी यह अवस्था देख अर्जुन भगवान्‌ श्रीकृष्ण-के पीछे जाकर छिप गये। भारत! उन्हें इस प्रकार इधर-उधर छिपनेकी चेष्टा करते देख गान्धारीका क्रोध उतर गया और उन्होंने उन सबको स्नेहमयी माताके समान सान्त्वना दी

বৈশম্পায়ন বললেন—গান্ধারীর ক্রোধ প্রশমিত হল; তিনি মাতৃস্নেহে সকলকে সান্ত্বনা দিলেন। অর্জুনকে ভগবান শ্রীকৃষ্ণের আড়ালে গিয়ে লুকোতে এবং অন্যদেরও তাঁর দৃষ্টি এড়াতে ব্যাকুল হয়ে এদিক-ওদিক করতে দেখে তাঁর রোষ গলে গেল; তিনি স্নেহময়ী জননীর মতো সকলকে আশ্বাস দিলেন।

Verse 393

अभ्यगच्छत गान्धारीमार्तामार्ततरा स्वयम्‌ । नरेश्वर! विशाल नेत्रोंवाली कुन्तीने शोकसे कातर हो रोती हुई द्रपदकुमारीको उठाकर धीरज बँधाया और उसके साथ ही वे स्वयं भी अत्यन्त आर्त होकर शोकाकुल गान्धारीके पास गयीं। उस समय उनके पुत्र पाण्डव भी उनके पीछे-पीछे गये

বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরেশ্বর! বিশালনয়না কুন্তী নিজেই অতিশয় আর্ত ছিলেন। শোকে কাতর হয়ে কাঁদতে থাকা দ্রুপদকন্যাকে তুলে ধরে তিনি তাকে সান্ত্বনা দিলেন; তারপর নিজেও গভীর শোকে নিমগ্ন হয়ে শোকাকুলা গান্ধারীর কাছে গেলেন। তাঁর পেছনে পাণ্ডবপুত্ররাও অনুসরণ করল।

Verse 426

असिद्धानुनये कृष्णे यदुवाच महामति: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! गान्धारीने बहू द्रौपदी और यशस्विनी कुन्तीसे कहा--“बेटी! इस प्रकार शोकसे व्याकुल न होओ। देखो

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! গান্ধারী পুত্রবধূ দ্রৌপদী ও যশস্বিনী কুন্তীকে বললেন—“বৎসে, এভাবে শোকে ভেঙে পড়ো না। দেখো, আমিও তো দুঃখসাগরে নিমজ্জিত। আমি বুঝি, কালের উলট-পালটের প্রেরণায় এই সমগ্র জগতের বিনাশ ঘটেছে—যা স্বভাবতই শিহরণ জাগায়। এ বিপর্যয় অনিবার্য ছিল, তাই এসে পড়েছে। যখন সন্ধি স্থাপনে শ্রীকৃষ্ণের অনুনয়-বিনয় সফল হল না, তখন পরম প্রজ্ঞাবান বিদুর যে গম্ভীর কথা বলেছিলেন, তারই অনুসারে সবকিছু প্রকাশ পেল।”

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to assign responsibility after collective catastrophe: Yudhiṣṭhira claims maximal culpability, while Gandhārī frames the outcome through inevitability (kāla) yet also acknowledges personal fault, creating a layered model of accountability.

The chapter advances a controlled ethics of mourning: anger is permitted as an initial response, but resolution requires restraint, shared consolation, and a reflective causal analysis that prevents grief from converting into further destructive action.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical documentation, preparing the ground for later systematic teachings by demonstrating grief, responsibility, and reconciliation in practice.

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